
केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी (MSP) पर रकम खर्च करने का नया रिकॉर्ड बना दिया है. पहली बार फसलों की सरकारी खरीद पर 3 लाख 47 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. इससे पहले साल 2020-21 में एमएसपी पर खरीद के लिए सबसे ज्यादा 2 लाख 80 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे. लेकिन, यहां सवाल यह है कि क्या मोदी सरकार ने वाकई एमएसपी पर खर्च बढ़ा दिया है या फिर यह सिर्फ महंगाई के साथ बढ़ती रकम का खेल है? असल में एमएसपी पर खर्च होने वाली कुल रकम में सिर्फ इसलिए इजाफा नहीं हुआ है क्योंकि एमएसपी बढ़ गई है, बल्कि लाभार्थी और फसलों की मात्रा में भी जबरदस्त वृद्धि की वजह से ऐसा हुआ है.
सरकार की इस 'सफलता' के बावजूद किसान संगठनों के लिए एमएसपी सबसे बड़ा कीवर्ड बना हुआ है. पिछले कुछ वर्षों से एग्री पॉलिटिक्स एमएसपी की गारंटी का कानून बनवाने की मांग के इर्द-गिर्द घूम रही है. इस समय भी संयुक्त किसान मोर्चा-गैर-राजनीतिक के नेता इसी मांग को लेकर किसान जागृति यात्रा पर हैं. लेकिन सरकार गारंटी जैसा कोई प्रावधान करने से बच रही है. किसान नेता और पिपक्षी दल इसी मुद्दे पर सरकार को घेर रहे हैं. उनका कहना है कि जो दाम सरकार खुद तय करती है उसी की गारंटी देने में हर्ज क्या है?
बहरहाल, एमएसपी पर खर्च होने वाली रकम, लाभार्थी किसानों की संख्या और फसलों की मात्रा देखते हैं. केंद्रीय कृषि मंत्रालय के मुताबिक साल 2024-25 में सरकार ने एमएसपी पर रिकॉर्ड 3.47 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि 2023-24 में यह 2.63 लाख करोड़ रुपये ही था. इसी तरह एमएसपी के तहत खरीदी गई कृषि उपज की मात्रा में भी तगड़ा इजाफा हुआ है. साल 2024-25 में एमएसपी पर 1,223 लाख मीट्रिक टन कृषि उपज की खरीद की गई, जबकि 2023-24 में यह मात्र 1,089 लाख मीट्रिक टन था. एमएसपी का लाभ लेने वाले किसानों की संख्या में भी भारी उछाल दर्ज किया गया है. साल 2024-25 में रिकॉर्ड 196.35 लाख किसानों को एमएसपी का फायदा मिला, जबकि 2023-24 में मात्र 152.35 किसान ही एमएसपी से लाभान्वित हुए थे.
भारतीय खाद्य निगम के पुनर्गठन के मुद्दे पर बनाई गई शांता कुमार कमेटी ने 2015 में आई अपनी रिपोर्ट में बताया था कि भारत में केवल 6 फीसदी किसानों को ही एमएसपी का सीधा फायदा मिलता है. अक्सर किसान नेता इसे ही कोट करते हैं. लेकिन, यह खरीद के पुराने आंकड़ों पर आधारित है. अब न सिर्फ धान, गेहूं की खरीद काफी बढ़ चुकी है बल्कि दलहन, तिलहन भी पहले से अधिक खरीदा जा रहा है. इसलिए अब इस आंकड़े को अपडेट करने की जरूरत है, क्योंकि देश के 14 प्रतिशत किसान परिवारों को एमएसपी का लाभ मिल रहा है. देश में करीब 14 करोड़ किसान परिवार हैं, जिसमें से 1.96 करोड़ ने एमएसपी का लाभ लिया है.
अब कुछ लोग यह सवाल कर सकते हैं कि जब केंद्र सरकार ने एमएसपी पर खरीद बढ़ा दी है तो फिर किसान आंदोलन क्यों कर रहे हैं? दरअसल, एक सच यह है कि एमएसपी पर खर्च होने वाली रकम, लाभार्थी किसानों और फसलों की मात्र में जबरदस्त इजाफा हुआ है. लेकिन, एक कड़वा सच यह भी है कि गारंटी न मिलने की वजह से किसानों को बाजार में उनकी फसलों का उचित दाम नहीं मिल रहा है.
सरकार द्वारा घोषित एमएसपी और मंडियों में मिलने वाले वास्तविक दाम के बीच एक गहरी खाई है. वजह यह है कि एमएसपी सिर्फ सरकार के लिए लागू है, निजी क्षेत्र पर नहीं. इसलिए निजी क्षेत्र एमएसपी पर खरीद करने के लिए बाध्य नहीं है. इसी का वह फायदा उठाता है. किसान संगठन एमएसपी की लीगल गारंटी इसीलिए मांग रहे हैं ताकि निजी क्षेत्र भी एमएसपी से कम कीमत पर कृषि उपज की खरीद न कर पाए.
एमएसपी के मुद्दे पर किसान संगठनों की सरकार के साथ गारंटी के अलावा एक और लड़ाई भी है. दरअसल, इस समय सरकार ए2+एफएल (Actual paid out cost plus imputed value of family labour) फार्मूले के आधार पर एमएसपी तय कर रही है. जबकि किसान सी-2 (Comprehensive Cost) फार्मूले के आधार पर एमएसपी तय करने की मांग कर रहे हैं. सी-2 फार्मूले की ही वकालत स्वामीनाथन कमीशन भी करता है. दोनों में क्या अंतर है इसे भी समझ लेते हैं.
खरीफ मार्केटिंग सीजन 2025-26 में धान की एमएसपी 2369 रुपये प्रति क्विंटल है. यह A2+FL फार्मूले के आधार पर तय हुई है. जबकि C-2 वाली एमएसपी 3135 रुपये प्रति क्विंटल होगी. यानी धान किसानों को प्रति क्विंटल 766 रुपये का नुकसान हो रहा है. इसी तरह अरहर का वर्तमान एमएसपी 8000 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि सी-2 फार्मूले वाली एमएसपी 10258.5 रुपये प्रति क्विंटल होगी. इस तरह किसानों को अरहर के मामले में 2258.5 रुपये प्रति क्विंटल की आर्थिक चोट लग रही है.
सरकार, किसानों को मूल्य समर्थन देने के लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) और अन्य राज्य एजेंसियों के जरिए अनाज और मोटे अनाज की खरीद करती है. जब दलहन, तिलहन और कोपरा का बाजार मूल्य एमएसपी से कम हो जाता है तब संबंधित राज्य सरकारों की सलाह से प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) के तहत मूल्य समर्थन योजना के तहत इन उत्पादों की खरीद की जाती है.
नेफेड (नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) और एनसीसीएफ (नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) पीएम-आशा योजना के तहत खरीद एजेंसियां हैं. इसी तरह सीसीआई (कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया) एमएसपी पर कपास और जेसीआई (जूट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया) पटसन की खरीद करती है.
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों के आधार पर सरकार 22 नोटिफाइड कृषि फसलों के लिए एमएसपी तय करती है. इनमें धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, अरहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल, रामतिल और कपास जैसी 14 खरीफ फसलें और गेहूं, जौ, चना, मसूर, सरसों व कुसुम जैसी 6 रबी फसलें जबकि जूट और कोपरा जैसी कॉमर्शियल फसलें शामिल हैं.
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