
आधे से ज्यादा महाराष्ट्र सूखे की चपेट में है. क्या अनाज और क्या फल-सब्जी, सब सूखे की चपेट में आ चुके हैं. सूखे से निपटने के लिए राज्य सरकार दिल्ली तक भागदौड़ कर रही है. किसान की बात करें तो उसने आपने आपको ऊपर वाले के भरोसे छोड़ दिया है. फलों की फसल को नुकसान कितना हुआ है, इस सवाल के जवाब में किसान पेड़ बचाने की कोशिश पर बात करने लगते हैं. उनका कहना है कि आम-अंगूर, अनार-केले की फसल तो हमारे हाथ से निकल चुकी है, अब हम ये सोच रहे हैं कि फलों के पेड़ कैसे बचेंगे.
क्योंकि जमीन में इतनी नमी भी नहीं बची है कि पेड़ों को जिंदा रख सकें. पेड़ों के लायक पानी दूर-दराज से लाना होगा, और उसे लाने के लिए किसान के पास कोई सिस्टम नहीं है. ये काम सिर्फ सरकार ही कर सकती है, जैसे पहले पानी की ट्रेन चलाई गई थी. क्योंकि आज हालात 1972 में पड़े सूखे से भी ज्यादा खराब हैं. अगर सरकार ने कुछ जरूरी कदम नहीं उठाए तो आने वाले सीजन में आम, अनार, अंगूर और केला ठेलों पर दिखाई नहीं देगा.
अंगूर किसान संगठन, महाराष्ट्र के अध्यक्ष कैलास भोसले ने किसान तक को बताया कि ये वो वक्त है जब अंगूर के बाग में काम करना था, लेकिन उस काम के लिए पानी चाहिए और पानी है नहीं. दो महीने से तो बारिश ही नहीं हुई है. अगर वॉटर रिज़र्वायर की बात करें तो वहां से खेती और बागवानी के लिए पानी रोक दिया गया है. सरकार को चाहिए कि टैंकर की मदद से हमे कम से कम पेड़-पौधे बचाने के लिए तो पानी दे ही दे. क्योंकि, अगर ये पेड़ सूख गए तो फिर नए पौधे लगाने होंगे और उनसे फल लेने में कम से कम 4 साल लगेंगे.
केवीके नरायण गांव के अध्यक्ष अनिल मेहेर ने किसान तक से बातचीत में बताया कि अगर फलों के उत्पादन की बात करें तो किसान के हाथ में 30 फीसद से ज्यादा फल आने वाले नहीं हैं. ये भी तब बचेंगे जब कुछ जरूरी उपाय किए जाएंगे. पेड़ों और जमीन को सीधी धूप से बचाने के लिए ऊपर नेट का शेड लगाना होगा. और इसके लिए सरकार को ज्यादा रेट पर सब्सिलडी देनी चाहिए. नुकसान का ये आंकड़ा अभी का है. अगर आगे जाकर ये आंकड़ा बड़ा भी हो जाए तो उसमे चौंकने वाली बात नहीं होगी.
मराठवाड़ा से एग्रीकल्चर एक्सपर्ट विजय बोराडे ने किसान तक को बताया कि आज महाराष्ट्र में जो सूखा पड़ रहा है वो साल 1972 में पड़े सूखे से भी ज्यादा बड़ा है. आज हमारे पास अनाज है, लेकिन पानी और पशुओं के लिए चारा नहीं है. और दूसरी बात ये कि आम, अनार और केले के उत्पादन की बात तो छोड़ ही दिजिए कि कितना होगा और कितना नहीं. अब लड़ाई उनके पेड़ों को बचाने पर आ गई है. जमीन सूख चुकी है. पशुओं को हरा चारा और पीने का पानी नहीं मिलेगा तो मराठवाड़ा का किसान क्या करेगा. अब तो सरकार को ही कुछ इंतजाम करने होंगे.
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