
जम्मू और कश्मीर के राजौरी के मेहरा गांव में पिछले कुछ वर्षों में खेती का पूरा परिदृश्य बदल गया है. मेहरा गांव, जो कभी सीमित पैदावार और संसाधनों की कमी के कारण संघर्ष करता था, आज जम्मू-कश्मीर में ऑर्गेनिक खेती का एक उभरता हुआ मॉडल बन चुका है. यहां के 50 से ज्यादा परिवार अब पूरी तरह से जैविक सब्जी उगा रहे हैं और अपनी मेहनत से न सिर्फ खुद को आत्मनिर्भर बना रहे हैं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों के लिए स्वस्थ और रसायनमुक्त सब्जियां भी उपलब्ध करा रहे हैं. इस बदलाव के पीछे स्थानीय किसानों की इच्छाशक्ति के साथ-साथ सरकारी सहयोग भी एक प्रमुख कारण है.
राजौरी के मुख्य कृषि अधिकारी राजेश वर्मा ने बताया कि विभाग इस समय सतत खेती और प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देने पर जोर दे रहा है. सरकार ने विशेष क्लस्टर चिन्हित किए हैं, जहां ऑर्गेनिक खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है और किसानों को संबंधित प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है. वर्मा ने कहा कि जैसे-जैसे लोग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो रहे हैं, वैसे-वैसे जैविक सब्जियों की मांग बढ़ रही है और इसी मांग को देखते हुए किसानों को मार्केटिंग, ब्रांडिंग और वैल्यू एडिशन जैसी गतिविधियों के लिए भी तैयारी कराई जा रही है.
उन्होंने आगे कहा कि प्राकृतिक और जैविक खेती को आगे बढ़ाने के लिए HADP सहित कई योजनाओं के तहत कम्पोनेंट निर्धारित किए गए हैं. किसानों को प्रशिक्षण देकर उन्हें इस दिशा में सक्षम बनाया जा रहा है. विभाग की कोशिश है कि गांवों में ऐसा माहौल तैयार हो जहां किसान जैविक उत्पादन को बड़े पैमाने पर अपनाएं और उसे अपनी कमाई का स्थायी स्रोत बना सकें. गांव के युवा भी इस परिवर्तन में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. मेहरा गांव के किसान अबिद हुसैन बताते हैं कि रोजगार के अवसरों की कमी के बीच खेती ही उनके लिए मुख्य विकल्प बन गई है.
वे बताते हैं कि गांव के लगभग 50 घर अब ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं और सब्जियों की बिक्री से वे अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करते हैं. उनके अनुसार, जैविक खेती ने गांव की आर्थिक स्थिति सुधारने में अहम योगदान दिया है. नगरोटा की सफीना कौसर भी इस सफलता की कहानी का हिस्सा हैं. वे कहती हैं कि जब भी वे घर में देसी तरीके से उगाई गई सब्जियां तैयार करती हैं, तो खरीददार दूर-दूर से पहुंचते हैं. उनके अनुसार, प्रतिदिन तीन से चार हजार रुपये की सब्जियां बिक जाती हैं, जिससे घर का खर्च आराम से चल जाता है. जैविक सब्जियों की बढ़ती लोकप्रियता ने उन्हें लगातार बेहतर बाजार उपलब्ध कराया है.
राजौरी के ही किसान रमीज अहमद बताते हैं कि कभी यह गांव बेहद गरीब था, लेकिन अब धीरे-धीरे विकास दिखाई देने लगा है. हालांकि, वे यह भी बताते हैं कि पानी की कमी और गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता अभी भी चुनौतियां हैं. बीज उन्हें जम्मू से खरीदकर लाने पड़ते हैं, जिससे लागत बढ़ जाती है. इसके बावजूद किसानों का उत्साह कम नहीं हुआ है और वे तरह-तरह की सब्जियां उगाकर बाजार में भेज रहे हैं.
राजौरी के सुन्दरबनी और नौशेरा जैसे सीमांत इलाकों में भी ऑर्गेनिक खेती तेजी से विकसित हो रही है. यहां कृषि विभाग किसानों को आधुनिक और पर्यावरणीय अनुकूल संसाधन उपलब्ध करा रहा है. सुन्दरबनी क्षेत्र में किसानों को हाइटेक वर्मी कम्पोस्ट यूनिट दिए गए हैं, जबकि पॉलीहाउस की सहायता से वे सालभर सब्जियों की खेती करने में सक्षम हुए हैं. इन पॉलीहाउसों से सर्दियों में भी सब्जियां उगाना आसान हो गया है.
केंद्र प्रायोजित योजनाओं की मदद से इन क्षेत्रों में हाइटेक पॉलीहाउस, कम्पोस्ट यूनिट और जागरूकता कार्यक्रम लगातार बढ़ाए जा रहे हैं. सरकार का लक्ष्य है कि इन पहाड़ी और सीमावर्ती इलाकों को जैविक खेती के मॉडल क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाए.
मेहरा और आसपास के गांवों में जैविक खेती केवल एक खेती पद्धति नहीं, बल्कि ग्रामीण बदलाव की एक नई कहानी बन चुकी है. यहां के किसान आज साबित कर रहे हैं कि सीमित संसाधनों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद, यदि नीयत और प्रयास मजबूत हों तो खेती भी समृद्धि का बड़ा जरिया बन सकती है. (एएनआई)