
भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते के तहत सेब आयात को लेकर नई व्यवस्था लागू होने की तैयारी है. सरकार अमेरिकी सेब के लिए सीमित कोटा तय कर सकती है, जिसके तहत हर साल अधिकतम 50 हजार से 1 लाख टन तक सेब 25 फीसदी रियायती आयात शुल्क पर आने की अनुमति मिल सकती है. माना जा रहा है कि यह व्यवस्था घरेलू उत्पादकों को बड़ा झटका दिए बिना आयात का संतुलन बनाए रखने के मकसद से तैयार की जा रही है.
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार अमेरिकी सेब के लिए 10 साल की अवधि में चरणबद्ध कोटा प्रणाली लागू कर सकती है. इसके तहत आयात पर न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) 80 रुपये प्रति किलो तय करने की भी तैयारी है. मौजूदा समय में दूसरे देशों से आने वाले सेब पर करीब 50 फीसदी आयात शुल्क लगता है, जबकि अमेरिकी सेब पर यह शुल्क घटाकर 25 फीसदी किया जा सकता है. अधिकारियों का कहना है कि इससे कुल आयात स्तर लगभग 5.5 लाख टन के आसपास ही रखा जाएगा और घरेलू कीमतों पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा.
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी कहा है कि सरकार ने घरेलू सेब उत्पादकों के हितों की रक्षा को प्राथमिकता दी है. उन्होंने बताया कि न्यूनतम आयात मूल्य और आयात शुल्क तय करके ऐसा संतुलन बनाया जा रहा है, जिससे विदेशी सेब की अनियंत्रित एंट्री न हो और भारतीय किसानों को नुकसान न पहुंचे. केंद्रीय मंत्री ने कहा है कि अमेरिकी सेब का आयात मौजूदा कुल आयात से कम स्तर पर ही सीमित रखा जाएगा.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2024-25 में भारत ने अमेरिका से 34,303 टन ताजा सेब आयात किया, जिसकी कीमत करीब 33.69 मिलियन डॉलर रही. इससे पहले 2023-24 में यह आयात 20,541 टन था. इस बढ़ोतरी के बावजूद सरकार का कहना है कि कोटा प्रणाली लागू होने पर आयात का ढांचा नियंत्रित रहेगा.
हिमाचल प्रदेश मार्केटिंग एंड प्रोसेसिंग कॉरपोरेशन के पूर्व अध्यक्ष और सेब उत्पादक प्रकाश ठाकुर ने कहा कि अगर आयातित सेब की लैंडेड कीमत 100 रुपये प्रति किलो के आसपास रहती है और दिल्ली जैसे बड़े बाजार में इसे 150 रुपये प्रति किलो तक बेचा जाता है तो अमेरिकी वॉशिंगटन सेब खुदरा बाजार में 250 रुपये प्रति किलो तक पहुंच सकता है. ऐसे में किन्नौर जैसे प्रीमियम भारतीय सेबों को कीमत में प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है.
उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका में सेब की पैदावार प्रति हेक्टेयर 60-70 टन तक होती है, जबकि हिमाचल प्रदेश में यह औसतन 6-7 टन और जम्मू-कश्मीर में 10-12 टन के आसपास है. अमेरिकी उत्पादकों को कई तरह की अप्रत्यक्ष सब्सिडी और मार्केटिंग समर्थन मिलता है, जबकि भारतीय किसानों को ऐसा संस्थागत सहारा नहीं मिल पाता.
उधर, कश्मीर घाटी के सेब उत्पादकों और व्यापारियों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अमेरिकी और यूरोपीय सेब पर 100 फीसदी से ज्यादा आयात शुल्क लगाने की मांग की है. उन्होंने कहा कि घाटी की अर्थव्यवस्था में सेब उद्योग की अहम भूमिका है और करीब 7 लाख परिवार इससे सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े हैं. आयात शुल्क में कटौती से इस सेक्टर पर दबाव बढ़ सकता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों का यह भी कहना है कि न्यूनतम आयात मूल्य को सभी देशों के लिए 80 रुपये प्रति किलो करने की तैयारी है. इससे दूसरे देशों से आने वाले सेब महंगे पड़ेंगे, क्योंकि उन पर 50 फीसदी शुल्क जारी रहेगा, जबकि अमेरिकी सेब 25 फीसदी शुल्क के साथ आएंगे. इससे आयात का कुछ हिस्सा ईरान और तुर्की जैसे देशों से हटकर अमेरिका की ओर शिफ्ट हो सकता है.