
भारत की कॉफी उद्योग ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड निर्यात किया था. उस साल 4.07 लाख टन से ज्यादा कॉफी विदेशों में भेजी गई और इसका मूल्य 2.136 बिलियन डॉलर से ज्यादा था. लेकिन अब नई फसल थोड़ी कम होने की वजह से निर्यात में धीमी गति आ सकती है. इस साल यानी कॉफी वर्ष 2025-26 (अक्टूबर 2025 से सितंबर 2026) में अरबीका और रोबस्टा दोनों किस्मों की फसल पर असर पड़ा है. अरबीका की फसल थोड़ी बढ़कर लगभग 90,000 टन होने की संभावना है, जो पिछले साल से 10,000 टन ज्यादा है. वहीं, रोबस्टा की फसल कम होने की उम्मीद है, लगभग 2.5 से 2.6 लाख टन तक.
इस साल फसल कम होने के कई कारण हैं. मई से अक्टूबर तक देर से और लगातार बारिश हुई, खासकर कर्नाटक और केरल के बड़े कॉफी उगाने वाले इलाकों में. ज्यादा बारिश और नमी के कारण कुछ पेड़ों की फसल खराब हुई. इसके अलावा कुछ जगहों पर फूलों का ठीक से लगना नहीं हुआ, जिससे फल कम आए.
भारत की लगभग दो-तिहाई कॉफी विदेशों में निर्यात होती है. घरेलू उपयोग सिर्फ एक तिहाई होता है. फसल कम होने की वजह से निर्यात की मात्रा भी कम हो सकती है. इसके अलावा, भारतीय कॉफी की कीमत विदेशों में थोड़ी ज्यादा होने लगी है, जिससे कुछ देशों में खरीददार दूसरे देशों की सस्ती कॉफी लेने लगे हैं.
अफ्रीका के देश जैसे युगांडा की कॉफी की कीमत बढ़ रही है. यूरोप, खासकर इटली, में भारतीय रोबस्टा कॉफी की प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है. हालांकि भारतीय कॉफी का स्वाद और गुणवत्ता अच्छा है, फिर भी कीमत थोड़ी ज्यादा होने से निर्यातकों को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि अरबीका की फसल थोड़ी बेहतर है, लेकिन रोबस्टा की कमी निर्यात पर असर डाल सकती है. किसानों और निर्यातकों को अब फसल की देखभाल और मार्केट की स्थिति दोनों पर ध्यान देना होगा. यदि मौसम अनुकूल रहे और कीमत संतुलित रहे, तो भारत फिर से अपनी कॉफी का निर्यात बढ़ा सकता है.
इस साल की कॉफी फसल पिछले साल से थोड़ी कम होने की वजह से निर्यात की गति धीमी हो सकती है. बारिश और खराब मौसम ने उत्पादन को प्रभावित किया है. इसके बावजूद, भारत की कॉफी की गुणवत्ता और स्वाद दुनिया में पसंद की जाती है. अगर किसान और निर्यातक मिलकर सही रणनीति अपनाएँ, तो भारत अपनी कॉफी की बाजार हिस्सेदारी बनाए रख सकता है.
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