
केंद्र सरकार ने चीनी को लेकर बुधवार को एक बड़ा फैसला लिया. सरकार ने एक आदेश जारी करते हुए चीनी की रिकॉर्ड कीमतों को काबू में करने के लिए चीनी की स्टॉक लिमिट तय कर दी. इसमें कहा गया कि जो डीलर हर महीने 10 मीट्रिक टन से ज्यादा चीनी का इस्तेमाल करते हैं, वे 15 दिनों से अधिक समय तक स्टॉक नहीं रख सकते. सरकारी नोटिफिकेशन के मुताबिक, यह आदेश 1 सितंबर से लागू होगा और 30 नवंबर तक प्रभावी रहेगा.
इस आदेश से पहले मंगलवार को 'रॉयटर्स' ने खबर दी थी कि भारत चीनी की सप्लाई बढ़ाने और रिकॉर्ड कीमतों को काबू में करने के उपायों पर विचार कर रहा है. इन उपायों में सीमित मात्रा में बिना ड्यूटी के आयात और थोक व्यापारियों के लिए स्टॉक रखने की सख्त लिमिट शामिल हैं. इससे लगभग एक दशक में पहली बार विदेशी आयात की इजाजत मिल सकती है.
भारत दुनिया में चीनी का दूसरा सबसे बड़ा प्रोड्यूसर और सबसे बड़ा कंज्यूमर है, जो दुनिया के कुल उत्पादन में लगभग 19% का योगदान देता है. सालाना चीनी उत्पादन औसतन 320 से 350 लाख टन के बीच होता है, जिसमें 5 करोड़ से अधिक किसानों और बड़े सहकारी नेटवर्क का बहुत बड़ा सपोर्ट होता है. उत्पादन के मामले में उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र देश में सबसे आगे हैं. इन सभी विशेषताओं के बावजूद ऐसा क्या हुआ जो भारत को स्टॉक लिमिट लगानी पड़ी और कच्ची चीनी के आयात पर विचार हो रहा है?
भारत में अगस्त से नवंबर का समय त्योहारों और चीनी की खपत के लिए बेहद अहम माना जाता है. इन चार महीनों में गणेशोत्सव, नवरात्रि, दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहारों के चलते मिठाइयों, बेकरी प्रोडक्ट और कन्फेक्शनरी आइटम्स की खपत तेजी से बढ़ जाती है. बढ़ती मांग को देखते हुए बिस्किट, चॉकलेट और अन्य खाने-पीने के सामान बनाने वाली कंपनियां पहले से ही बड़ी मात्रा में चीनी की खरीद कर स्टोरेज शुरू कर देती हैं. इससे चीनी की सप्लाई घटने और महंगाई बढ़ने की स्थिति पैदा हो जाती है. इस बार भी ऐसा ही देखा जा रहा है. अभी त्योहार शुरू भी नहीं हुए, लेकिन रेट में भारी तेजी देखी जा रही है.
इस तेजी को थामने और उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सरकार ने व्यापारियों और डीलरों को निर्देश दिया था कि वे अपनी जरूरत से अधिक चीनी का स्टॉक न रखें और 30 दिनों से ज्यादा का स्टॉक करने से बचें. हालांकि इन कदमों के बावजूद घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों में लगातार तेजी बनी हुई है. पिछले एक महीने के दौरान दाम करीब 10 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं और कई जगहों पर रिकॉर्ड स्तर को छू चुके हैं. विशेषज्ञों के हवाले से 'रॉयटर्स' ने बताया है कि आने वाले कुछ महीनों तक चीनी के भाव ऊंचे बने रह सकते हैं.
चीनी की महंगाई बढ़ने के पीछे असली वजह उत्पादन से अधिक खपत है. 2025-2026 सीजन के लिए भारत में चीनी का वास्तविक नेट उत्पादन (इथेनॉल के लिए इस्तेमाल के बाद) 27.9 मिलियन टन रहने का अनुमान है; वहीं, 28 मिलियन टन की अनुमानित खपत के मुकाबले कुल उपलब्धता 32.6 मिलियन टन होगी. उत्पादन और खपत का समीकरण गड़बड़ होने के बाद सरकार ने कच्ची चीनी के आयात पर विचार करना शुरू कर दिया है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि 10 साल के अंतराल के बाद भारत 10 लाख टन कच्ची चीनी का आयात कर सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी के दाम बढ़ने के पीछे चीनी का निर्यात भी एक वजह है. पिछले साल नवंबर में सरकार ने पहले डेढ़ मिलियन टन और बाद में इसे बढ़ाकर दो मिलियन टन कर दिया. निर्यात का फैसला उस मुश्किल समय में लिया गया जब चीनी की उपलब्धता कम बनी हुई थी. जानकारों के मुताबिक, अगर उस समय निर्यात को रोककर देश में ही चीनी का स्टॉक बनाए रखा जाता तो आज शायद सप्लाई का इतना बड़ा संकट नहीं होता.