इथेनॉल, गन्ना और महंगाई: आखिर चीनी के बाजार में क्या चल रहा है?

इथेनॉल, गन्ना और महंगाई: आखिर चीनी के बाजार में क्या चल रहा है?

देश में चीनी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि गन्ने के रस का बड़ा हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में जाने से चीनी की सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे बाजार में दाम तेजी से बढ़े हैं. त्योहारों के मौसम से पहले बढ़ती महंगाई ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है. आयात, स्टॉक लिमिट और जल्द पेराई जैसे उपायों पर विचार किया जा रहा है, जबकि विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इथेनॉल के लिए गन्ना, मक्का और चावल का बढ़ता उपयोग भविष्य में खाद्य महंगाई को और बढ़ा सकता है.

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रवि कांत सिंह
  • New Delhi,
  • Aug 18, 2026,
  • Updated Aug 18, 2026, 7:11 PM IST

क्या इथेनॉल ने झटका देना शुरू कर दिया है? जानकारों के मुताबिक इसका जवाब हां है. यह बात इसलिए उठी है क्योंकि चीनी के दाम में रॉकेट जैसी तेजी है. कभी 40 रुपये किलो बिकने वाली चीनी अभी 55-60 रुपये किलो तक पहुंच गई है. वजह की बात करें तो इथेनॉल बड़ा कारण माना जा रहा है. विशेषज्ञ बताते हैं कि इथेनॉल बनाने में गन्ने के रस का इस्तेमाल जिस तेजी से बढ़ा है, उसी तेजी से खुले बाजार में चीनी का भाव भी बढ़ रहा है. यानी चीनी के रेट का सीधा संबंध इथेनॉल से है.

बात सबसे पहले चीनी के बढ़ते भाव की. इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) ने बताया है कि देश के सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में इसकी एक्स-मिल कीमतें हाल ही में लगभग 46 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गईं, जो अब तक का सबसे ऊंचा रिकॉर्ड है.

यह समय इसलिए भी खास है क्योंकि अगस्त के आखिर से जनवरी के बीच चीनी की खपत सबसे ज़्यादा होती है, क्योंकि इस दौरान त्योहारों के मौसम में लोग अपने घरों में पारंपरिक मिठाइयां और पकवान बनाते हैं. इसके साथ ही, लोगों में प्रोसेस्ड फूड और ड्रिंक्स की मांग बढ़ जाती है. ऐसे नाजुक समय में चीनी का दाम बढ़ना न तो आम लोगों के लिए, और न ही सरकार के लिए शुभ संकेत है.

क्यों बढ़े चीनी के दाम?

सवाल है कि ऐसा क्या हुआ जो देश में चीनी के दाम रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ गए? इसके जवाब में कमॉडिटी एक्सपर्ट शंकर ठक्कर कहते हैं, इथेनॉल डायवर्जन की वजह से चीनी के रेट बढ़े हैं क्योंकि जिस गन्ने के रस का इस्तेमाल चीनी बनाने में होना चाहिए था, वह इथेनॉल बनाने में होने लगा. दूसरी ओर गन्ना पेराई कम हुई है जिसका सीधा असर चीनी के दाम पर दिख रहा है.

ठक्कर ने बताया कि दो साल पहले उन्होंने सार्वजनिक तौर पर आगाह किया था कि गन्ने का प्रयोग चीनी बनाने में जारी रहा तो आगे चलकर महंगाई विकराल रूप ले लेगी. आज वैसा ही हो रहा है. आने वाले समय में मक्का और अनाज के दाम भी बढ़ेंगे क्योंकि इथेनॉल में इसका चलन बढ़ रहा है.

इथेनॉल से किसे फायदा?

विशेषज्ञों ने चीनी के साथ-साथ इथेनॉल के दाम पर भी सवाल उठाए हैं. तेल कंपनियां इथेनॉल प्लांटों से 60-65 रुपये लीटर इसे खरीदती हैं और पेट्रोल में मिलाकर E20 बनाती हैं. लेकिन ग्राहकों को इसका कोई फायदा नहीं मिलता क्योंकि पेट्रोल के दाम जस के तस हैं. दूसरी ओर, गन्ने से इथेनॉल बनाया जा रहा है जिससे चीनी के रेट बढ़ रहे हैं. यानी जिस फायदे के लिए इथेनॉल बन रहा है, वह फायदा न पेट्रोल के ग्राहकों को, न ही चीनी के खरीदारों को मिल रहा है.

क्या इथेनॉल बनाम महंगाई की चर्चा केवल आम लोगों में है? ऐसा नहीं है. अब सरकारी स्तर पर भी इथेनॉल को लेकर सवाल उठने लगे हैं. सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वीए नागेश्वरन ने इशारे में बता दिया कि इथेनॉल बनाने में खाद्य पदार्थों का जितना इस्तेमाल बढ़ेगा, खाद्य महंगाई उतनी बढ़ेगी. उन्होंने एक और चिंता जताई है- अगर मक्के का ज्यादा इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में किया जाता है, तो मवेशियों के चारे के लिए मक्का कम पड़ सकता है, जब तक कि इसका उत्पादन न बढ़ाया जाए.

जाहिर सी बात है कि इससे चारे की महंगाई बढ़ेगी और दूध के दाम बढ़ेंगे. गन्ने पर भी इस बदलाव का असर दिख रहा है क्योंकि इस सीजन में सालाना उत्पादन का लगभग 10% हिस्सा इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल किया गया जिसे साफ तौर पर चीनी की महंगाई से जोड़ा जा सकता है.

कैसे रुकेगी चीनी की महंगाई?

सरकारी हलकों में ऐसी चर्चा है कि विदेश से कच्ची चीनी आयात करने पर विचार जारी है ताकि त्योहारी सीजन में दबाव कुछ कम किया जा सके. कृषि मंत्रालय का आंकड़ा बताता है कि 14 अगस्त तक 58 लाख हेक्टेयर जमीन पर गन्ने की बुवाई हो चुकी थी, जो पिछले साल इसी समय के रकबे से थोड़ा कम है.

इसलिए, चीनी की इंपोर्ट ड्यूटी में कटौती एक बड़ा पॉलिसी बदलाव होगा. इससे देश में चीनी की सबसे ज्यादा मांग वाले सीजन के दौरान घरेलू सप्लाई को पूरा करने के लिए विदेशों से चीनी मंगाई जा सकेगी.  

घरेलू बाजारों में सप्लाई को बेहतर बनाने के लिए, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की फैक्ट्रियां खाद्य मंत्रालय से बातचीत के बाद गन्ने की पेराई (क्रशिंग) का काम सामान्य समय यानी नवंबर की शुरुआत से 10-15 दिन पहले ही शुरू करने की योजना बना रही हैं. सरकार ने जमाखोरी रोकने और महंगाई के दबाव को काबू में रखने के लिए व्यापारियों पर स्टॉक लिमिट भी लगाई है.

महंगाई का कैसा रहेगा हाल?

क्या महंगाई के मोर्चे पर चीनी की चिंता अकेली है? ऐसा नहीं है, क्योंकि इस लाइन में और भी कई कृषि जींस शामिल हैं. शंकर ठक्कर ने कहा, सरकार को इथेनॉल में गन्ने के इस्तेमाल को रोकना होगा तब जाकर अगले साल तक इसकी महंगाई काबू में आएगी, वरना रेट 70 रुपये किलो तक जा सकते हैं. उन्होंने आगाह किया, अगले महीने से गर्मी बढ़ने वाली है, अल नीनो का असर व्यापक होगा जिसकी सबसे अधिक मार फसलों पर होगी. इसे देखते हुए सरकार को इथेनॉल में मक्का और चावल का प्रयोग भी रोकना होगा, अन्यथा भविष्य में इसकी महंगाई बड़ा संकट पैदा कर सकती है.

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