Food Forest मॉडल बना खेती का भविष्य, किसान की कमाई 30 हजार से 3 लाख प्रति एकड़

Food Forest मॉडल बना खेती का भविष्य, किसान की कमाई 30 हजार से 3 लाख प्रति एकड़

विश्व पर्यावरण दिवस पर ‘सेव सॉइल–कावेरी कॉलिंग’ परियोजना के निदेशक आनंद एथिराजालू ने कहा कि पेड़ आधारित खेती पर्यावरण संकट का एक आर्थिक समाधान है. इस मॉडल से न केवल मिट्टी और नदियों की सेहत सुधरती है, बल्कि किसानों की आय में 300 से 800% तक वृद्धि देखी गई है.

Soil-Cauvery Calling FarmerSoil-Cauvery Calling Farmer
क‍िसान तक
  • New Delhi,
  • Jun 05, 2026,
  • Updated Jun 05, 2026, 6:46 PM IST

विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर 'सेव सॉइल–कावेरी कॉलिंग' के प्रोजेक्ट डायरेक्टर आनंद एथिराजालू ने कहा, "पेड़ों पर आधारित खेती, पर्यावरण की समस्या का एक आर्थिक समाधान है." उन्होंने सरकार से किसानों के लिए अनुकूल नीतियां और प्रोत्साहन योजनाएं बनाने की अपील की ताकि इसे अपनाने की गति बढ़ाई जा सके. UNCCD (मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन) और UNEP (संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम) से मान्यता प्राप्त यह अभियान दर्शाता है कि पेड़-आधारित खेती से पर्यावरण बहाली और किसानों की समृद्धि, दोनों एक साथ कैसे की जा सकती हैं. इससे नदियों का बहाव बहाल होता है, मिट्टी की सेहत सुधरती है, उपज की गुणवत्ता बढ़ती है और किसानों की आय में 300 से 800% तक की बढ़ोतरी होती है.

इस तरीके की कामयाबी कावेरी नदी के किनारे खेती करने वाले किसानों को मिले नतीजों से स्पष्ट है. इसका एक उदाहरण वल्लुवन हैं, जो 'सेव सॉइल–कावेरी कॉलिंग' से जुड़े UN अवॉर्ड जीतने वाले किसान हैं. उन्होंने पेड़ों पर आधारित खेती और पुनरुत्पादक (रीजेनरेटिव) खेती के जरिए अपने नुकसान वाले नारियल के मोनोकल्चर (एक ही फसल उगाने वाले) खेत को एक फलते-फूलते 'फ़ूड फ़ॉरेस्ट' में बदल दिया.

पेड़ आधारित खेती से फायदा

किसान ने 2009 में मोनोकल्चर खेती छोड़कर पेड़ों पर आधारित खेती और मल्टी-क्रॉपिंग (एक साथ कई फ़सलें उगाना) शुरू की. नारियल के अलावा, अब वे जायफल, केले की सात किस्में, फल देने वाले पेड़, सुपारी, करी पत्ता, हल्दी और जिमीकंद समेत 13 तरह की फसलें उगाते हैं.

उन्होंने कहा, "पहले मोनोकल्चर तरीके से सिर्फ नारियल के पेड़ लगाने से मुझे हर नारियल के पेड़ पर 200 रुपये का नुकसान होता था और प्रति एकड़ सालाना 30,000 रुपये की कमाई होती थी. अब पेड़ों पर आधारित खेती और रीजेनरेटिव कृषि से मैं सालाना प्रति एकड़ 2.5 लाख से 3 लाख रुपये कमाता हूं."

वल्लुवन 2017 के भयंकर सूखे का सामना भी कर पाए. उन्होंने मल्चिंग और कवर-क्रॉपिंग जैसे तरीके अपनाए, जिनसे मिट्टी में नमी बनी रही. जहां आस-पास के खेतों में सूखे से निपटने के लिए पेड़ काटने पड़े थे, वहीं उनका खेत सुरक्षित रहा. बारिश का पानी जमा करने के उनके गड्ढों ने भी भारी बारिश का सामना करने और मिट्टी के कटाव को रोकने में मदद की.

उनके खेत की मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा लगभग 0.52% से बढ़कर 3.36% हो गई है, जबकि नारियल की पैदावार प्रति पेड़ लगभग 100 नारियल से बढ़कर लगभग 160 हो गई है और नारियल का औसत वजन भी लगभग 400 ग्राम से बढ़कर लगभग 550 ग्राम हो गया है.

ग्लोबल वॉर्मिंग को मात देगी पेड़ आधारित खेती

पोलाची में 11 हेक्टेयर का खेत रखने वाले वल्लुवन ने कहा, "ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु संकट का एकमात्र समाधान पेड़-आधारित खेती है." आज, वह इस मॉडल को अपनाने में रुचि रखने वाले दूसरे किसानों को ट्रेनिंग और मदद देते हैं. उनके खेत में की गई सुधार की प्रक्रिया UNCCD-WOCAT के ग्लोबल डेटाबेस में दर्ज है और इसे तमिलनाडु ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन डिपार्टमेंट से नियमित रूप से प्रमाणित किया जाता है.

'सेव सॉइल-कावेरी कॉलिंग' का मकसद कावेरी बेसिन में खेतों पर 242 करोड़ पेड़ लगाने में मदद करना है. अब तक, इसने 13.4 करोड़ पेड़ लगाने में मदद की है और 2.6 लाख किसानों को पेड़-आधारित खेती अपनाने में सहयोग दिया है.

पेड़-आधारित खेती के मॉडल को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए, किसानों को अच्छी गुणवत्ता के पौधे उपलब्ध कराना और पेड़ लगाने से लेकर फसल काटने तक लगातार मदद करना 'सेव सॉइल-कावेरी कॉलिंग' का एक अहम हिस्सा है. यह तमिलनाडु के कुड्डालोर में एशिया की सबसे बड़ी सिंगल-साइट नर्सरी चलाता है, जिसे 200 से ज्यादा महिलाएं पूरी तरह संभालती हैं और जिसकी क्षमता 85 लाख पौधे तैयार करने की है. तिरुवन्नामलाई में एक दूसरी नर्सरी भी है, जहां 15 लाख और पौधे तैयार किए जाते हैं.

MORE NEWS

Read more!