जालौन के अशोक सिंह ने तोड़ा ‘कम उत्पादन’ का मिथक, 25 क्विंटल/एकड़ गेहूं से बनाई नई पहचान

जालौन के अशोक सिंह ने तोड़ा ‘कम उत्पादन’ का मिथक, 25 क्विंटल/एकड़ गेहूं से बनाई नई पहचान

जालौन की मंडोरी गांव के रहने वाले अशोक सिंह ने ये साबित कर दिया है कि जैविक विधि से न सिर्फ उत्पादन रासायनिक उर्वरक के मुकाबले ज्यादा होता है बल्कि मिट्टी की सेहत भी अच्छी बनी रहती है.

धर्मेंद्र सिंह
  • जालौन ,
  • Feb 27, 2026,
  • Updated Feb 27, 2026, 1:13 PM IST

प्राकृतिक और जैविक खेती करने वाले किसानों में फसल के बेहतर उत्पादन को लेकर गलत धारणा फैली है. ज्यादातर किसानों का मानना है जैविक और प्राकृतिक विधि से खेती करने से उत्पादन घटता है और मेहनत बढ़ जाती है. लेकिन जालौन जिले के मंडोरी गांव के प्रगतिशील किसान अशोक सिंह ने अपने अनुभव और परिणामों से इस भ्रम को पूरी तरह तोड़ दिया है.

वर्ष 2006 से वे 22 एकड़ क्षेत्र में पूरी तरह जैविक विधि से खेती कर रहे हैं. कुल मिलाकर उनके पास 100 एकड़ से अधिक कृषि भूमि है, जिसमें शेष हिस्से में वे रासायनिक पद्धति से भी खेती करते हैं. जैविक विधि से न सिर्फ उन्हें उत्पादन बेहतर मिल रहा है बल्कि अनाज भी सेहतमंद पैदा हो रहा है.

गेहूं में 25 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन

इन दिनों उनके जैविक फार्म पर गेहूं की फसल लहलहा रही है. खेत की फसल को देखकर किसी भी कृषि वैज्ञानिक या अधिकारी के लिए यह पहचानना मुश्किल है कि यह फसल बिना रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों के तैयार की गई है.

अशोक सिंह बताते हैं कि सामान्यतः रासायनिक उर्वरकों के सहारे किसान 20–22 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन लेते हैं, जबकि वे जैविक पद्धति से 25 क्विंटल प्रति एकड़ तक उत्पादन हासिल कर रहे हैं.

उनका कहना है कि जैविक खेती में शुरुआत के 2–3 साल चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं, क्योंकि मिट्टी को रासायनिक निर्भरता से बाहर लाना पड़ता है. लेकिन एक बार मिट्टी की जैविक सक्रियता बढ़ने के बाद उत्पादन स्थिर और बेहतर होने लगता है.

मिट्टी की सेहत बनी सबसे बड़ी ताकत

अशोक सिंह के खेत की मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन 1.2 प्रतिशत है, जबकि पूरे जालौन जिले में औसतन यह लगभग 0.4 प्रतिशत ही है.

विशेषज्ञों के अनुसार, 1 प्रतिशत से अधिक ऑर्गेनिक कार्बन वाली मिट्टी जल संरक्षण, पोषक तत्वों की उपलब्धता और सूक्ष्मजीव गतिविधियों के लिहाज से बेहद उपजाऊ मानी जाती है. यही कारण है कि उनकी फसलें कम सिंचाई और कम बाहरी इनपुट में भी बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं.

वे खेत में गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट, जीवामृत और फसल अवशेषों को री-साइकल करते हैं. इससे मिट्टी की संरचना मजबूत हुई है और रासायनिक लागत शून्य के करीब पहुंच गई है.

कम लागत, ज्यादा मुनाफा

जैविक खेती का सबसे बड़ा फायदा लागत में कमी और बाजार में बेहतर दाम है. सामान्य गेहूं का बाजार भाव: लगभग 2500 रुपये प्रति क्विंटल है. जबकि अशोक सिंह का जैविक गेहूं 3000 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक दाम पर बिक रहा है. यानी प्रति क्विंटल लगभग 500 रुपये का अतिरिक्त लाभ मिलता है.

इसके अलावा रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च भी बच जाता है, जिससे शुद्ध मुनाफा और बढ़ जाता है. उनका कहना है कि जैविक गेहूं पोषण से भरपूर होता है और स्वाद में भी बेहतर होता है, जिसके कारण उपभोक्ता प्रीमियम कीमत देने को तैयार रहते हैं.

साल में तीन फसलें, बेहतर फसल चक्र

अशोक सिंह वर्षभर संतुलित फसल चक्र अपनाते हैं—

  • रबी सीजन: गेहूं और मटर
  • जायद सीजन: उड़द
  • खरीफ सीजन: मूंग

दलहनी फसलों को शामिल करने से मिट्टी में नाइट्रोजन की प्राकृतिक पूर्ति होती है और उर्वरता बनी रहती है. इस वैज्ञानिक फसल चक्र ने उनकी जमीन की उत्पादकता को लगातार बेहतर किया है.

किसानों के लिए संदेश

जालौन जनपद के प्रगतिशील किसान अशोक सिंह का कहना है कि जैविक खेती कोई जादू नहीं, बल्कि धैर्य और समझदारी का परिणाम है.

“किसानों को सबसे पहले मिट्टी की सेहत सुधारने पर ध्यान देना चाहिए. जैविक खेती से उत्पादन कम नहीं होता, बल्कि सही प्रबंधन से बेहतर होता है. लागत घटती है, मिट्टी सुधरती है और बाजार में अच्छा दाम मिलता है.”

उनकी 22 एकड़ की जैविक खेती आज जिले के लिए मॉडल बन चुकी है. कई किसान उनके खेत पर आकर प्रशिक्षण लेते हैं और जैविक पद्धति को अपनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं.

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