
झारखंड के गुमला जिले की आदिवासी महिला किसान फूल कुमारी ने मुर्गी पालन और हैचरी के जरिए अपनी आमदनी में बड़ा बदलाव किया है। कभी उनका परिवार बारिश पर निर्भर खेती से सालाना करीब 50 से 60 हजार रुपये ही कमा पाता था। अब खेती के साथ मुर्गी पालन और हैचरी जोड़ने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। वर्ष 2025-26 में फूल कुमारी ने अपने पोल्ट्री कारोबार से करीब 2,23,400 रुपये की शुद्ध सालाना कमाई की।
खास बात यह है कि उनकी कामयाबी केवल उनके परिवार तक सीमित नहीं रही। फूल कुमारी से प्रेरणा लेकर उनके गांव की करीब 30 आदिवासी महिलाओं ने भी बेहतर नस्ल के मुर्गे-मुर्गियों का पालन शुरू कर दिया है। इन महिलाओं को इससे सालाना करीब 35 से 45 हजार रुपये की अतिरिक्त आमदनी हो रही है।
फूल कुमारी झारखंड के गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड स्थित बोरांग गांव की रहने वाली हैं. उनके परिवार में पति जगदीश उरांव और दो बच्चे हैं. परिवार के पास करीब 5 एकड़ जमीन है, जिसमें 2 एकड़ निचली और करीब 3 एकड़ ऊपरी जमीन शामिल है.
लंबे समय तक परिवार परंपरागत तरीके से वर्षा आधारित खेती करता रहा. खेती की उत्पादकता कम होने के कारण इससे पर्याप्त आमदनी नहीं हो पाती थी. कृषि से होने वाली सालाना 50-60 हजार रुपये की कमाई में घर का खर्च चलाने और बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने में परिवार को मुश्किल होती थी.
ऐसे में परिवार को खेती के अलावा कमाई के एक दूसरे और भरोसेमंद साधन की जरूरत थी.
फूल कुमारी के जीवन में बदलाव की शुरुआत वर्ष 2016 में हुई, जब वह कृषि विज्ञान केंद्र यानी KVK गुमला के संपर्क में आईं. कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के साथ लगातार बातचीत से उन्हें खेती की बेहतर तकनीकों के साथ आय बढ़ाने के दूसरे विकल्पों की भी जानकारी मिली.
वर्ष 2018 में KVK के वैज्ञानिकों ने उनकी रुचि और परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए मुर्गी पालन शुरू करने की सलाह दी. फूल कुमारी को इसके लिए प्रशिक्षण दिया गया.
इसके बाद ट्राइबल सब-प्लान (TSP) के तहत उन्हें दिव्यायन रेड नस्ल के 100 चूजे उपलब्ध कराए गए. इस नस्ल को अंडे और मांस दोनों के लिए पाला जा सकता है.
प्रशिक्षण लेने के बाद फूल कुमारी ने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों की मदद से अपनी पोल्ट्री यूनिट तैयार की. उन्होंने मुर्गियों के लिए बेहतर शेड, संतुलित आहार, साफ पीने का पानी और बीमारियों से बचाव जैसी बातों पर ध्यान दिया.
इसका फायदा जल्द दिखाई देने लगा. उनके यहां पाले गए पक्षियों का वजन करीब तीन महीने में औसतन 1.5 किलो तक पहुंचने लगा और लगभग 22 सप्ताह की उम्र से अंडे मिलने शुरू हो गए.
मुर्गी पालन से अच्छे नतीजे मिलने के बाद फूल कुमारी को एहसास हुआ कि यह केवल घर की अतिरिक्त कमाई का जरिया नहीं, बल्कि एक छोटे कारोबार में भी बदला जा सकता है.
फूल कुमारी की प्रगति देखते हुए KVK गुमला ने उनके स्वयं सहायता समूह यानी SHG को TSP परियोजना के तहत आगे भी सहयोग दिया. समूह को एक हैचरी मशीन के साथ 112 अंडे उपलब्ध कराए गए.
हैचरी मिलने से फूल कुमारी के लिए कमाई का एक नया रास्ता खुल गया. अब वह केवल मुर्गियां पालकर उन्हें बेचने तक सीमित नहीं थीं, बल्कि चूजों का उत्पादन भी कर सकती थीं.
इससे स्थानीय स्तर पर बेहतर नस्ल के चूजों की मांग पूरी करने के साथ उनकी कमाई के साधन भी बढ़ गए.
वर्ष 2025-26 में फूल कुमारी ने करीब 1,000 बड़े पक्षियों को 400 रुपये प्रति पक्षी के हिसाब से बेचा. इससे करीब 4 लाख रुपये की कुल आय हुई. इस दौरान करीब 2.25 लाख रुपये लागत आई और पक्षियों की बिक्री से लगभग 1.75 लाख रुपये की शुद्ध आय हुई.
इसके अलावा उन्होंने करीब 960 चूजे 40 रुपये प्रति चूजे के हिसाब से बेचकर 38,400 रुपये कमाए. करीब 1,000 अंडों की 10 रुपये प्रति अंडा की दर से बिक्री करके उन्हें 10 हजार रुपये की अतिरिक्त कमाई हुई.
इस तरह 2025-26 में मुर्गी पालन और हैचरी से उनकी कुल शुद्ध सालाना आय करीब 2,23,400 रुपये रही.
मुर्गी पालन से बढ़ी कमाई ने परिवार को दूसरे रोजगार में निवेश करने का मौका भी दिया. परिवार ने अतिरिक्त आमदनी से एक ऑटो-रिक्शा खरीदा, जिसे अब फूल कुमारी के पति जगदीश उरांव चलाते हैं. इससे परिवार के लिए आमदनी का एक और जरिया तैयार हो गया है.
आर्थिक स्थिति बेहतर होने के बाद बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना भी पहले की तुलना में आसान हुआ है. फूल कुमारी का कहना है कि पोल्ट्री हैचरी और KVK से मिली तकनीकी मदद ने उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में सकारात्मक बदलाव किया है.
फूल कुमारी की सफलता का असर अब पूरे गांव में दिखाई दे रहा है. उनकी पोल्ट्री यूनिट दूसरे परिवारों, खासकर आदिवासी महिलाओं के लिए एक उदाहरण बन गई है.
उनसे प्रेरित होकर बोरांग गांव की करीब 30 आदिवासी महिलाएं बेहतर तरीके से बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग करने लगी हैं. ये महिलाएं फूल कुमारी की यूनिट से अंडे भी खरीद रही हैं और सोनाली और दिव्यायन रेड जैसी उन्नत नस्लों को अपना रही हैं.
इन महिलाओं को पोल्ट्री से करीब 35 से 45 हजार रुपये की अतिरिक्त सालाना आमदनी होने की बात कही गई है.
इस तरह 100 चूजों से शुरू हुआ फूल कुमारी का सफर अब गांव की दूसरी महिलाओं के लिए भी रोजगार का रास्ता तैयार कर रहा है. उनकी पोल्ट्री यूनिट स्थानीय स्तर पर अंडों और बेहतर नस्ल के चूजों का स्रोत बनने के साथ दूसरी महिलाओं के लिए सीखने का केंद्र भी बन रही है.
फूल कुमारी की कहानी बताती है कि खेती पर निर्भर छोटे और आदिवासी परिवार आय के दूसरे साधन जोड़कर अपनी आर्थिक स्थिति बेहतर कर सकते हैं. छोटे स्तर से शुरू हुआ मुर्गी पालन प्रशिक्षण, बेहतर नस्ल, वैज्ञानिक प्रबंधन और हैचरी तकनीक मिलने के बाद व्यवसाय का रूप ले सकता है.
फूल कुमारी के मामले में इसका असर परिवार की आमदनी से आगे बढ़कर गांव की दूसरी महिलाओं तक पहुंचा है. अब उनकी पहचान सिर्फ एक किसान के तौर पर नहीं, बल्कि महिला पोल्ट्री उद्यमी के रूप में भी बन रही है.