जिसे समझते थे कचरा, उसी नारियल की भूसी से बन रहा लाखों का कारोबार

जिसे समझते थे कचरा, उसी नारियल की भूसी से बन रहा लाखों का कारोबार

नारियल की भूसी से निकलने वाला कॉयर रेशा अब ग्रामीण भारत में रोजगार और कारोबार का नया जरिया बन रहा है. इससे चटाई, रस्सी, हस्तशिल्प, जैव-उर्वरक और पर्यावरण अनुकूल पैकेजिंग तैयार की जा रही है. सरकारी प्रशिक्षण, तकनीकी मदद और PMEGP जैसी योजनाओं से महिलाओं और ग्रामीण उद्यमियों को अपना कारोबार शुरू करने और आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है.

नारियल की भूसी में छिपा रोजगार का खजानानारियल की भूसी में छिपा रोजगार का खजाना
क‍िसान तक
  • Noida,
  • Sep 15, 2026,
  • Updated Sep 15, 2026, 1:33 PM IST

नारियल की भूसी, जिसे अक्सर बेकार समझकर छोड़ दिया जाता है, अब ग्रामीण भारत में कमाई और रोजगार का जरिया बन रही है. नारियल से निकलने वाले रेशे यानी कॉयर से चटाई, रस्सी और हस्तशिल्प जैसे सामान तो बन ही रहे हैं, साथ ही अब इससे जैव-उर्वरक और पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग जैसे नए उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं. इससे गांवों में छोटे कारोबार बढ़ रहे हैं और महिलाओं को भी रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं.

नारियल की भूसी से शुरू हुआ कारोबार

देश के नारियल उत्पादक इलाकों में कॉयर का काम लंबे समय से होता आ रहा है. अब नई तकनीक, प्रशिक्षण और सरकारी मदद के कारण इस पारंपरिक काम को बड़े कारोबार में बदला जा रहा है. कॉयर बोर्ड और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) जैसी योजनाओं के जरिए लोगों को ट्रेनिंग, आर्थिक मदद और तकनीकी सहायता दी जा रही है. इसका फायदा उन लोगों को मिल रहा है जो कम पूंजी में अपना कारोबार शुरू करना चाहते हैं. नारियल की भूसी से निकलने वाले रेशे को अलग-अलग तरीकों से तैयार कर उसकी कीमत बढ़ाई जा रही है. इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार भी पैदा हो रहा है.

आंध्र प्रदेश की गौथमी ने 120 महिलाओं को दिया प्रशिक्षण

आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के कडियाम की अल्लम गौथमी ने कॉयर से जुड़ा अपना कारोबार शुरू कर एक मिसाल पेश की है. उन्होंने धवलेश्वरम स्थित कॉयर बोर्ड प्रशिक्षण केंद्र से प्रशिक्षण लिया. इसके बाद वर्ष 2024-25 में करीब 10 लाख रुपये की परियोजना लागत से एडिगो कॉयर प्रोडक्ट्स की शुरुआत की. इस कारोबार के लिए उन्हें 6.50 लाख रुपये का बैंक ऋण और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत सहायता मिली. उनकी इकाई में पर्यावरण के अनुकूल दरवाजे की चटाइयां, रस्सियां, सजावटी गुड़िया और कई तरह के हस्तशिल्प तैयार किए जाते हैं.

हर साल 35 लाख रुपये का कारोबार

गौथमी का कारोबार अब तेजी से आगे बढ़ रहा है. उनकी इकाई से करीब 35 लाख रुपये का सालाना कारोबार हो रहा है और लगभग 10 लाख रुपये का लाभ कमाया जा रहा है. इस इकाई में छह महिलाओं को सीधे रोजगार मिला है. गौथमी ने सिर्फ अपना कारोबार खड़ा नहीं किया, बल्कि आसपास की महिलाओं को भी कॉयर का काम सिखाया. उन्होंने करीब 120 महिलाओं को चटाई बुनने, रस्सी बनाने और कॉयर से हस्तशिल्प तैयार करने की ट्रेनिंग दी है. उनकी सफलता को देखकर आसपास के इलाकों में करीब पांच और कॉयर इकाइयां शुरू हुई हैं.

केरल में कॉयर पिथ से बन रहा जैव-उर्वरक

कॉयर से जुड़े कारोबार की दूसरी मिसाल केरल के कोझिकोड से सामने आई है. यहां पी. सुरेंद्रन ने नवंबर 2024 में संपूर्ण प्लस एग्रो फर्टिलाइजर एंटरप्राइजेज (SAFE) शुरू किया. उन्होंने कॉयर पिथ यानी नारियल के रेशे से निकलने वाले बारीक अवशेष का इस्तेमाल कर जैव-उर्वरक बनाना शुरू किया. सुरेंद्रन को कन्नूर स्थित कॉयर बोर्ड और कलावूर स्थित केंद्रीय कॉयर अनुसंधान संस्थान से प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता मिली. कॉयर पिथ से तैयार जैव-उर्वरक मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने और उसमें नमी बनाए रखने में मदद करता है. यानी जिस कॉयर अपशिष्ट की कीमत पहले बहुत कम थी, उसे अब कृषि के लिए उपयोगी उत्पाद में बदला जा रहा है.

एक साल में 500 से ज्यादा ग्राहक

सुरेंद्रन का कारोबार भी तेजी से बढ़ा है. सिर्फ एक साल में उनके उत्पाद के 500 से ज्यादा ग्राहक बन गए. उनकी इकाई ने 20 टन से अधिक जैव-उर्वरक बेचा और करीब 13 लाख रुपये का कारोबार किया. वित्त वर्ष 2024-25 में उन्हें करीब 4 लाख रुपये का लाभ हुआ. इस कारोबार से पांच लोगों को रोजगार भी मिला है, जिनमें दो महिलाएं शामिल हैं. यह उदाहरण दिखाता है कि तकनीकी जानकारी और सही प्रशिक्षण के जरिए नारियल के अपशिष्ट से भी नया और टिकाऊ कारोबार खड़ा किया जा सकता है.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा कॉयर उत्पादक

नारियल का रेशा भारत के सबसे पुराने प्राकृतिक रेशों में से एक है. देश में संगठित कॉयर उत्पादन की शुरुआत वर्ष 1859 में केरल के अलाप्पुझा में पहली कॉयर फैक्ट्री की स्थापना के साथ हुई थी. इसके बाद यह उद्योग देश के कई प्रमुख नारियल उत्पादक राज्यों तक फैल गया. भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा कॉयर उत्पादक है और वैश्विक कॉयर रेशा उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से ज्यादा है. यह क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है. खास बात यह है कि कॉयर से रेशा निकालने और उसकी कताई के काम में शामिल लोगों में करीब 80 प्रतिशत महिलाएं हैं.

चटाई से लेकर पैकेजिंग तक बन रहे उत्पाद

कॉयर का इस्तेमाल अब केवल चटाई और रस्सी बनाने तक सीमित नहीं है. इससे ब्रश, सजावटी सामान, हस्तशिल्प और बागवानी से जुड़े कई उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं. इसके अलावा कॉयर से पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग तैयार करने पर भी काम हो रहा है. इसका फायदा यह है कि प्राकृतिक रेशे से बने उत्पाद प्लास्टिक के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किए जा सकते हैं. इससे कारोबार के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है.

कॉयर बोर्ड से मिल रही मदद

कॉयर बोर्ड सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय के तहत काम करने वाली संस्था है. यह कॉयर से जुड़े लोगों और कारोबारियों को प्रशिक्षण, तकनीक, रिसर्च, बाजार और निर्यात से जुड़ी मदद देता है. कॉयर विकास योजना के तहत कौशल विकास, महिलाओं को प्रशिक्षण, तकनीक में सुधार, घरेलू और विदेशी बाजार में उत्पादों को बढ़ावा देने और कामगारों के कल्याण जैसे काम किए जाते हैं. मेले, प्रदर्शनियां और शोरूम भी कॉयर उत्पाद बनाने वालों को अपने सामान को नए ग्राहकों तक पहुंचाने में मदद करते हैं.

प्लास्टिक के विकल्प पर भी हो रहा काम

कॉयर क्षेत्र में अब नए प्रयोग भी किए जा रहे हैं. केंद्रीय कॉयर अनुसंधान संस्थान ने एचडीपीई प्लास्टिक कप के विकल्प के तौर पर पर्यावरण के अनुकूल कॉयर रेल व्हील एक्सल पैकेजिंग कप विकसित किए हैं. इस तरह के प्रयोग बताते हैं कि कॉयर सिर्फ पारंपरिक ग्रामीण उद्योग नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल आधुनिक उद्योगों में भी किया जा सकता है. इससे प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के साथ प्लास्टिक पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है.

गांवों में रोजगार और महिलाओं के लिए नए अवसर

कॉयर उद्योग अब ग्रामीण भारत में रोजगार और छोटे कारोबार का मजबूत जरिया बनता जा रहा है. नारियल की भूसी से रेशा निकालने से लेकर चटाई, रस्सी, हस्तशिल्प और जैव-उर्वरक बनाने तक कई स्तरों पर लोगों को काम मिल सकता है. अल्लम गौथमी और पी. सुरेंद्रन की सफलता बताती है कि अगर ग्रामीण लोगों को प्रशिक्षण, तकनीक, पैसा और बाजार की सही मदद मिले तो स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों से भी अच्छा कारोबार खड़ा किया जा सकता है. कॉयर इसी तरह पारंपरिक काम से आगे बढ़कर ग्रामीण उद्यमिता, महिला सशक्तिकरण और टिकाऊ आजीविका का नया रास्ता बन रहा है.

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