
भारत के हालिया यूरिया आयात टेंडर में आई कीमतों में बड़ी गिरावट ने वैश्विक बाजार की दिशा बदल दी है. नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (एनएफएल) के 17 लाख टन के टेंडर में मिले भाव सरकार के अनुमान से काफी नीचे रहे हैं. कीमतों में आई इस तेज गिरावट के बाद अब सरकार जरूरत के हिसाब से तय मात्रा से ज्यादा यूरिया खरीदने की संभावना पर विचार कर रही है. एनएफएल के लिए खुले टेंडर में पश्चिमी तट के लिए सबसे कम बोली 449 डॉलर प्रति टन और पूर्वी तट के लिए 445 डॉलर प्रति टन के आसपास रही.
यह स्तर अप्रैल में हुए पिछले आयात दौर से काफी नीचे है. उस समय भारतीय पोटाश लिमिटेड के टेंडर में सरकार ने कहीं अधिक कीमतों पर यूरिया खरीद को मंजूरी दी थी. मौजूदा दरें कई पुराने वैश्विक स्तरों से भी नीचे पहुंच गई हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई हलचल शुरू हो गई है.
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों ने कहा कि सरकार खाद के लिए अब सिर्फ घोषित मात्रा तक सीमित नहीं रहना चाहती है. अगर अन्य आपूर्तिकर्ता सबसे कम बोली वाली दरों पर आपूर्ति के लिए तैयार होते हैं तो खरीद का दायरा बढ़ाया जा सकता है. अप्रैल और मई के दौरान मांग बढ़ने और कुछ क्षेत्रों में अग्रिम खरीद के चलते बिक्री तेज रही, ऐसे में आगे के रबी सीजन की जरूरतों को देखते हुए अतिरिक्त स्टॉक बनाने की रणनीति पर भी चर्चा चल रही है.
यूरिया बाजार में आई इस तेज गिरावट ने बड़े निर्यातकों की रणनीति भी प्रभावित कर दी है. हाल में निर्यात दोबारा बढ़ाने की दिशा में बढ़ रहे चीन के भीतर भी अब कम कीमतों पर बिक्री को लेकर दोबारा विचार की खबरें सामने आ रही हैं. बाजार से जुड़े लोगों का मानना है कि मौजूदा दरों पर सौदे आगे बढ़ते हैं या नहीं, इससे आने वाले दिनों में वैश्विक कीमतों का संकेत मिलेगा.
टेंडर प्रक्रिया के अनुसार, अगर सरकार तय मात्रा से अधिक खरीद करती है तो सबसे कम बोली देने वाली कंपनी को पहले अतिरिक्त आपूर्ति का अवसर दिया जाएगा. पश्चिमी तट पर अमेरोपा एशिया की बोली सबसे नीचे रही, जबकि पूर्वी तट के लिए आदित्य बिड़ला ग्लोबल ट्रेडिंग सबसे कम दर पर सामने आई. अगर ये कंपनियां अतिरिक्त मात्रा नहीं देतीं तो बाकी बोलीदाताओं को उसी दर से आपूर्ति का विकल्प दिया जा सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत कम कीमतों पर बड़ी मात्रा में खरीद करता है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय यूरिया व्यापार पर पड़ सकता है. दुनिया के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल भारत की रणनीति आगे आने वाले महीनों के लिए वैश्विक उर्वरक बाजार का रुख तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है.