
राजस्थान विधानसभा के सरकारी आंकड़ों ने खेतों में छिड़के जा रहे जिस 'सफेदपोश जहर' का पर्दाफाश किया है, वह कोई सामान्य मामला नहीं, बल्कि भारतीय किसानों का एक सोचा-समझा संस्थागत कत्लेआम है, जहां महज दो साल में 535 अन्नदाताओं की सांसें कीटनाशकों ने छीन लीं. लेकिन चौंकिए मत! लाशों पर मुनाफे की यह खूनी फसल हमारे खेतों में दशकों से लहलहा रही है. केरल के कासरगोड में एंडोसल्फान के हवाई छिड़काव ने पीढ़ियों को अपंग और मानसिक रूप से विक्षिप्त बनाकर जिस त्रासदी की पटकथा लिखी, और साल 2017 में महाराष्ट्र के यवतमाल में विषैले रसायनों को सूंघने से तड़प-तड़प कर मरे 20 से अधिक कपास किसानों की चीखें आज भी हमारी सोई हुई नियामक व्यवस्था को मुंह चिढ़ा रही हैं. इतिहास के इन काले पन्नों के बावजूद, आज भी देश के बाजारों में बिना किसी एंटीडोट (काट) वाला 'पैराक्वाट डाइक्लोराइड' और दुनिया भर में लाखों मुकदमों व कैंसर के आरोपों से घिरा 'ग्लाइफोसेट' धड़ल्ले से बेचा जा रहा है.
कीटनाशक बेचने वाली कंपनियां तिजोरियां भर रही हैं और देश का पेट भरने वाला किसान खेतों में दम तोड़ रहा है. आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा पैराक्वाट पर लगाया गया 60 दिनों का हालिया बैन यह साबित करने के लिए काफी है कि पानी अब सिर से ऊपर आ चुका है. बड़ा सवाल यह है कि जब दुनिया के 74 देश पैराक्वाट डाइक्लोराइड को बेहद खतरनाक मानकर कूड़ेदान में फेंक चुके हैं, तब देशव्यापी चिंताओं के बावजूद भारत की मिट्टी में हर साल सैकड़ों मीट्रिक टन यह जहर क्यों उड़ेला जा रहा है? आखिर 'मौत' के इन सौदागरों के आगे हमारी सरकारें इतनी बेबस क्यों हैं?
कीटनाशकों का यह जानलेवा प्रभाव सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी पैर पसार रहा है. आज बाजार में कई ऐसे खतरनाक केमिकल धड़ल्ले से बिक रहे हैं, जिनसे कंपनियां तो मालामाल हो रही हैं, लेकिन इनके अंधाधुंध इस्तेमाल से किसान और कंज्यूमर दोनों की सेहत दांव पर लगी हुई है. बहरहाल, मानव स्वास्थ्य के लिए पैराक्वाट डाइक्लोराइड के खतरे की गंभीरता को देखते हुए आंध्र प्रदेश सरकार ने इस पर 60 दिन के लिए रोक लगा दी है. आंध्र प्रदेश से पहले तेलंगाना, ओडिशा और केरल भी इस घातक केमिकल पर थोड़े-थोड़े वक्त के लिए रोक लगा चुके हैं. चूंकि राज्य सरकारें केवल एक निश्चित अवधि के लिए ही ऐसा अस्थायी बैन लगा सकती हैं, इसलिए अब केंद्र सरकार से पूरे देश में इस पर स्थायी बैन लगाने की मांग तेज हो गई है.
किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने हाल ही में ‘पैराक्वाट डाइक्लोराइड’ के खिलाफ पत्र लिखकर राजस्थान में इस पर बैन लगाने की मांग की है. जाट ने कहा कि कृषि का मकसद लोगों को सेहतमंद भोजन उपलब्ध करवाना है, न कि उसमें ज़हरीले केमिकल डालना. खेती में खतरनाक केमिकल डालने के बाद उसका सीधा असर हमारे भोजन पर पड़ता है. मुख्यमंत्री के नाम दिए गए ज्ञापन में कहा गया है कि पैराक्वाट डाइक्लोराइड एक बेहद विषैला केमिकल है. इसके संपर्क में आने से फेफड़े, किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है. किसान महापंचायत ने इसे मानव जीवन के लिए घातक बताते हुए इसके उपयोग पर तुरंत रोक लगाने की मांग उठाई है. उन्होंने सवाल उठाया कि जो केमिकल दुनिया के 70 से अधिक देशों में बैन है, वह भारत में कैसे चल सकता है?
एक ऐसा केमिकल, जिसकी महज कुछ बूंदें भी इंसानी जीवन के लिए काल बन सकती हैं और जिसका दुनिया में कोई एंटीडोट (काट) नहीं है, उसका भारत के खेतों में खुलेआम छिड़काव अपने आप में कई सवाल खड़े करता है. बड़ा सवाल यह है कि जब दुनिया के 74 देश इसे बेहद खतरनाक मानकर बैन कर चुके हैं, तब देशव्यापी चिंताओं के बावजूद भारत के खेतों में हर साल 100 मीट्रिक टन से अधिक मात्रा में यह जहर क्यों उड़ेला जा रहा है? आखिर इतना खतरनाक केमिकल अब तक पूरे भारत में बैन क्यों नहीं हुआ? क्या हमारे देश में लोगों की सेहत की कोई कीमत नहीं है?
पैराक्वाट डाइक्लोराइड की अत्यधिक विषाक्तता और मानव जीवन के लिए इसके जानलेवा खतरों को देखते हुए ही दुनिया के कई विकसित और विकासशील देश इस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा चुके हैं. ऐसे देशों में फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्वीडन, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, चीन, स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, मलेशिया, वियतनाम, ताइवान, ब्राजील, श्रीलंका, चिली और पेरू आदि शामिल हैं. लेकिन भारत में आज भी इस घातक केमिकल का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. आंध्र प्रदेश सरकार ने जब से किसानों और आम जनमानस की सुरक्षा के लिए इस पर कड़ा बैन लगाया है, तब से कृषि-केमिकल बनाने वाले उद्योगों की लॉबी के बीच तगड़ी बेचैनी है. मुनाफाखोरी की इसी छटपटाहट में यह उद्योग संगठन अब अपनी पूरी राजनीतिक व आर्थिक ताकत झोंककर इस जोड़-तोड़ में जुट गए हैं कि आंध्र प्रदेश का यह साहसिक फैसला कोई और राज्य न दोहरा सके, ताकि जनता की सेहत को दांव पर लगाकर चलने वाला उनका यह कारोबार बेखौफ चलता रहे.
भारतीय कृषि में पैराक्वाट के टिके रहने की एक वजह इसका तुरंत असरदार होना है. मजदूरों की कमी और बढ़ती दिहाड़ी के बीच, किसानों को यह केमिकल एक 'सस्ता शॉर्टकट' लगता है जो कुछ ही घंटों में खरपतवार को सुखा देता है. विकसित देशों के विपरीत, भारत में अधिकांश खेतिहर मजदूर बिना मास्क, चश्मे या दस्ताने पहने इसका छिड़काव करते हैं. उन्हें इसके न्यूरोलॉजिकल खतरों (जैसे पार्किंसंस रोग या हाथ-पैर कांपना) की कोई जानकारी नहीं होती.
भारत में इस 'जहर' को रोकने के लिए लंबे समय से कानूनी लड़ाई चल रही है. सरकार ने देश में चल रहे 99 खतरनाक कीटनाशकों की समीक्षा के लिए डॉ. अनुपम वर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी. इस कमेटी ने पैराक्वाट को पूरी तरह बैन करने के बजाय इसे "कड़े नियंत्रण, बेहतर पैकेजिंग और केवल प्रशिक्षित लोगों द्वारा इस्तेमाल" करने की सिफारिश की थी, जिसे पर्यावरणविदों ने नाकाफी बताया. इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में पर्यावरणविदों और जनहित कार्यकर्ताओं की एक याचिका लंबित है. जिसमें पैराक्वाट डाइक्लोराइड सहित मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले 99 खतरनाक कीटनाशकों और हर्बीसाइड्स पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है.
यही नहीं, कृषि वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के एक विशेषज्ञ पैनल ने सर्वसम्मति से केंद्र सरकार को पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर देशव्यापी पूर्ण प्रतिबंध लगाने की सिफारिश सौंपी है. पैनल ने इसके सीधे संबंध को घातक पॉइजनिंग, किडनी फेलियर, फेफड़ों की गंभीर बीमारी और पार्किंसंस रोग से जोड़ा है. इसके बावजूद सरकार ने अब तक इस पर रोक नहीं लगाई है. आखिर क्यों, क्या भारत के नागरिकों के जान की कोई कीमत नहीं है?
एक कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि पैराक्वाट डाइक्लोराइड का कोई एंटीडोट (विषनाशक) न होने का मुख्य कारण इसका कोशिकीय स्तर पर होने वाला 'रीडॉक्स साइक्लिंग' तंत्र है, जो शरीर के भीतर एक कभी न रुकने वाली विनाशकारी रासायनिक चेन रिएक्शन शुरू कर देता है. एक बार शरीर के अंदर जाने के बाद, यह किसी एक अंग को निशाना बनाने के बजाय सीधे कोशिकाओं के ऊर्जा घर पर हमला करता है.
पैराक्वाट शरीर में मौजूद ऑक्सीजन और कोशिकाओं की ऊर्जा का उपयोग करके सुपरऑक्साइड फ्री रेडिकल्स बनाता है. इस प्रक्रिया में पैराक्वाट खुद नष्ट नहीं होता. वह बार-बार पुनर्जीवित होता रहता है और लगातार नए फ्री रेडिकल्स बनाता जाता है. जब तक शरीर में ऑक्सीजन और कोशिकाओं की ऊर्जा रहेगी, यह विनाशकारी चक्र चलता रहता है.
आमतौर पर किसी भी मरीज को सांस की तकलीफ होने पर ऑक्सीजन दी जाती है, लेकिन पैराक्वाट के मामले में मरीज को बाहर से ऑक्सीजन देना जहर की ताकत को और बढ़ा देता है. पैराक्वाट ऑक्सीजन के साथ मिलकर और ज्यादा तेजी से फेफड़ों की कोशिकाओं को जलाना शुरू कर देता है. इस विरोधाभास के कारण डॉक्टर मरीज को वेंटिलेटर या ऑक्सीजन पर भी नहीं रख पाते.
यह जहर किसी एक रिसेप्टर या एंजाइम को ब्लॉक नहीं करता (जैसे सांप का जहर या अन्य कीटनाशक करते हैं, जिनका एंटीडोट मुमकिन है), बल्कि यह सीधे कोशिकाओं की बाहरी झिल्ली को फाड़ देता है. इसके कारण कुछ ही घंटों में फेफड़े, किडनी और लिवर काम करना बंद कर देते हैं.
इस पूरे संकट की सबसे कड़वी हकीकत यह है कि इन मल्टीनेशनल कंपनियों ने भारत के ग्रामीण बाजारों में अपने जानलेवा केमिकल को बेचकर अरबों रुपये का मुनाफा तो कमाया, लेकिन कभी भी इसके सुरक्षित इस्तेमाल को लेकर किसानों को न तो जागरूक किया और न ही उन्हें ट्रेंड किया. कंपनियां जानती हैं कि 'पैराक्वाट डाइक्लोराइड' और 'ग्लाइफोसेट' जैसे केमिकल छिड़कते समय पूरे शरीर को ढकने वाले प्रोटेक्टिव सूट, विशेष दस्ताने और मास्क पहनना अनिवार्य है, क्योंकि इसके साइड इफेक्ट हैं. इसके बावजूद, मुनाफे की अंधी दौड़ में अंधी हो चुकी ये कंपनियां सीधे-साधे किसानों के हाथों में यह जहर सिर्फ एक आकर्षक डिब्बे और भ्रामक विज्ञापनों के भरोसे सौंप देती हैं. बोतलों पर लिखे सुरक्षा निर्देश बेहद छोटे होते हैं. कंपनियों की इसी लापरवाही का नतीजा है कि किसान अनजाने में मौत को अपने खेतों में ही आमंत्रित कर रहा है.
ये भी पढ़ें: मुनाफा कंपनियों का, मेडल वैज्ञानिकों के, फिर कैसे ICU में पहुंचे किसानों के खेत और बर्बाद हुई सेहत?
ये भी पढ़ें: गेहूं पर 34 बार हुआ कीटनाशक का छिड़काव, 150 करोड़ रुपये खर्च...पशुओं के खाने लायक भी नहीं बचा