
धान की खेती में बिना सोचे-समझे खाद डालना न सिर्फ पैसों की बर्बादी है, बल्कि इससे हमारी जमीन की सेहत भी खराब हो रही है. अकेले यूरिया की बात करें तो इसकी कुल खपत का बड़ा हिस्सा सिर्फ धान में इस्तेमाल होता है. इससे किसानों की लागत तो बढ़ ही रही है. साथ ही खेतों का उपजाऊपन भी कम हो रहा है. इसके अलावा, इन केमिकल खादों के लिए हमें दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है. यही वजह है कि कृषि वैज्ञानिक सलाह दे रहे हैं कि किसान एक खास नीति अपनाएं, जिससे केमिकल खादों का इस्तेमाल कम हो और फसलों की पैदावार भी बेहतर मिले.
हर खेत की मिट्टी की उर्वरता अलग होती है. इसलिए पैदावार बढ़ाने का सबसे पहला उसूल यह है कि आप अपनी मिट्टी की जांच जरूर करवाएं. सॉइल टेस्ट से यह साफ हो जाता है कि जमीन में किस पोषक तत्व की कितनी कमी है. अगर जांच रिपोर्ट में जरूरी तत्व कम पाए जाते हैं तो आम सिफारिश से 25% ज्यादा खाद देने की जरूरत होती है. वहीं, अगर मिट्टी पहले से ही उपजाऊ है तो खाद की मात्रा में 25% तक की कमी की जा सकती है. इस तरीके को अपनाकर किसान न सिर्फ अपनी लागत बचा सकते हैं, बल्कि मिट्टी को भी बीमार होने से बचा सकते हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार, धान के पौधों की बेहतर बढ़त और तंदुरुस्ती के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश (N, P, K) का एक तय संतुलन होना बेहद जरूरी है. मध्यम उपजाऊ मिट्टी के लिए आमतौर पर प्रति हेक्टेयर 105 किलो नाइट्रोजन, 30 किलो फास्फोरस और 30 किलो पोटाश की सलाह दी जाती है.
इसे खाद के रूप में देखा जाए तो तकरीबन 225 किलो यूरिया, 67.5 किलो डीएपी (DAP) या 187.5 किलो सिंगल सुपर फास्फेट (SSP) और 50 किलो म्युरेट ऑफ पोटाश (MOP) प्रति हेक्टेयर बनता है.
मगर ध्यान रहे, अगर आप अपने खेत में डीएपी का इस्तेमाल कर रहे हैं तो यूरिया की कुल मात्रा में से 25 किलो कम कर देना चाहिए. इस तय पैमाने से खाद देने पर फसल को सही वक्त पर पूरा पोषण मिलता है, जिससे दानों में गजब की चमक और वजन आता है.
सिर्फ केमिकल खादों के भरोसे रहकर हम लंबे समय तक अच्छी पैदावार की उम्मीद नहीं कर सकते. इसके लिए हमें केमिकल और जैविक खादों के मिले-जुले नुस्खे को अपनाना होगा. खरीफ के मौसम में तेज धूप और नमी की वजह से जैविक खादें मिट्टी में बहुत जल्दी घुल जाती हैं और पौधों को फायदा पहुंचाती हैं.
अगर आप धान की रोपाई से पहले खेत में 15 टन अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद डालते हैं तो इससे सीधे तौर पर प्रति हेक्टेयर 87 किलो यूरिया की बचत होती है. इसी तरह, रोपाई से एक हफ्ता पहले 6 से 8 हफ्ते पुरानी ढैंचा, सनई या लोबिया जैसी हरी खाद को मिट्टी में पलटने से 137 किलो यूरिया की बड़ी बचत की जा सकती है. चीनी मिलों से मिलने वाला प्रेसमड भी 15 टन प्रति हेक्टेयर की दर से डालने पर 137 किलो यूरिया का खर्च बचा देता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि अक्सर देखा गया है कि किसान धान की पत्तियों का रंग हल्का होते ही बिना सोचे-समझे यूरिया डाल देते हैं. इस आदत को बदलने के लिए 'लीफ कलर चार्ट (LCC) एक बेहद सस्ता और जादुई औजार साबित हो सकता है. यह प्लास्टिक का एक चार्ट होता है, जिसमें हरे रंग की अलग-अलग पट्टियां बनी होती हैं.
धान की रोपाई के 14 दिन बाद से हर हफ्ते खेत के अलग-अलग पौधों की ऊपर वाली खुली पत्तियों का मिलान इस चार्ट से छांव में करना चाहिए. अगर 10 में से 6 या उससे ज्यादा पत्तियों का रंग 'शेड नंबर 4' से हल्का दिखाई दे, तभी खेत में 62.5 किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से यूरिया डालना चाहिए. जैसे ही धान की फसल में बालियां निकलना या फूल आना शुरू हो जाए, इस चार्ट का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए और उसके बाद यूरिया का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करना चाहिए.
फसल की अधिक पैदावार के लिए सूक्ष्म तत्वों का भी अपना एक बड़ा रोल होता है, जिनमें धान के लिए जिंक और लोहा सबसे अहम हैं. मिट्टी की जांच में अगर जिंक की कमी पाई जाए तो रोपाई के वक्त ही 21.5% जिंक वाली जिंक सल्फेट खाद 62.5 किलो प्रति हेक्टेयर या 33% जिंक वाली खाद 37.5 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में छिड़कनी चाहिए. इसके उलट, अगर धान में लोहे की कमी दिखे, तो जमीन में लोहा डालने का कोई फायदा नहीं होता.
इसके लिए 1% फेरस सल्फेट के घोल का पत्तों पर हर हफ्ते 3 से 4 बार छिड़काव करना सबसे ज्यादा असरदार तरीका है. खाद से पूरा फायदा हासिल करने के लिए फास्फोरस और पोटाश को हमेशा रोपाई से ठीक पहले जमीन में मिला देना चाहिए. लेकिन यूरिया को कभी भी एक बार में पूरा नहीं डालना चाहिए, बल्कि इसे तीन बराबर किस्तों में बांटकर देना चाहिए. पहली किस्त रोपाई के वक्त, दूसरी किस्त 3 हफ्ते बाद और आखिरी तीसरी किस्त रोपाई के 6 हफ्ते बाद देनी चाहिए. इस तरकीब से खाद बर्बाद नहीं होती और सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचती है.