
देश में अनाज की रिकॉर्ड तोड़ पैदावार यकीनन हमेशा खुश करती है, लेकिन इस चमकते सिक्के का दूसरा पहलू बेहद डरावना और चिंताजनक है. अगर गुजरे एक दशक के आंकड़ों पर बारीक नजर डालें, तो भारत के कृषि इतिहास में पिछले 10 साल उत्पादन के मामले में सबसे बेहतरीन रहे हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान देश के अनाज उत्पादन में अब तक की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक छलांग दर्ज की गई है. जहां साल 2015-16 में देश का कुल अनाज उत्पादन महज 251.54 मिलियन टन था, वहीं यह अब 106 मिलियन टन से भी ज्यादा की शानदार बढ़ोतरी के साथ 357.73 मिलियन टन के ऑल-टाइम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है.
अगर प्रतिशत के हिसाब से इसका पूरा हिसाब-किताब देखें, तो पिछले 10 सालों में भारत के अनाज उत्पादन में लगभग 42.14% का जबरदस्त इजाफा हुआ है. राहत की बात यह है कि सिर्फ गेहूं-धान ही नहीं, बल्कि दालों और तिलहन (तेल के बीजों) के मामले में भी हम पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और आत्मनिर्भर हुए हैं, जिससे देश की गरीब से गरीब थाली में भी पोषण की सुरक्षा अब पहले से कहीं अधिक पक्की हो गई है.
लेकिन इस रिकॉर्डतोड़ उछाल का जो दूसरा रुख है, वो रूह कंपाने वाला है. एक तरफ जहां खेतों में फसलों की पैदावार रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ी है, वहीं दूसरी तरफ खेतों में रासायनिक खादों (केमिकल फर्टिलाइजर) की खपत भी बहुत तेजी से और बेलगाम होकर बढ़ी है. सरकारी आंकड़ों की गवाही खुद चीख-चीख कर कह रही है कि साल 2015-16 में देश में कुल 530 लाख मीट्रिक टन रासायनिक खादों का इस्तेमाल हुआ था, जो साल 2024-25 में बढ़कर सीधे 707 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया है.
इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि पिछले 10 सालों में देश में केमिकल फर्टिलाइजर का उपयोग लगभग 33.4% तक बढ़ चुका है. अनाज की पैदावार बढ़ाने की अंधी होड़ में खेतों में इन, केमिकल उर्वरको का बोझ लगातार असहनीय होता जा रहा है. आज हम ज्यादा मुनाफे के लालच में मिट्टी में जितनी ज्यादा खाद झोंक रहे हैं, उसकी कुदरती ताकत उतनी ही खोखली होती जा रही है और यह पूरा सिलसिला एक खतरनाक और अंतहीन चक्रव्यूह की तरह बढ़ता जा रहा है.
यह चौंकाने वाले और बेपर्दा करते आंकड़े आज हमारे पूरे कृषि महकमे और सिस्टम के सामने एक बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न और संकट खड़ा करते हैं. पिछले करीब दस सालों से सरकार लगातार बड़े-बड़े मंचों से केमकिल खेती को कम करने और जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने का ढिंढोरा पीट रही है और करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं. सरकार का मुख्य मकसद और दावा हमेशा से यह रहा है कि खेतों में रसायनों का उपयोग कम किया जा सके और दम तोड़ती मिट्टी की सेहत को सुधारा जाए. लेकिन इसके बावजूद जमीनी और कड़वी हकीकत यह है कि सरकार का रासायनिक-मुक्त, प्राकृतिक और जैविक खेती का हसीन नारा धरातल पर कहीं दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा है.
हकीकत के मैदान में किसान आज भी फसलों की ज्यादा से ज्यादा पैदावार बटोरने और अपनी फसल को कीड़ों से बचाने के लिए रासायनिक खादों और यूरिया की बोरियों पर ही सबसे ज्यादानिर्भर हैं, क्योंकि उन्हें पारंपरिक और रेंगते हुए जैविक तरीकों से तुरंत कोई बड़ा फायदा नजर नहीं आता है.
इस रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन के पीछे एक और कड़वा सच यह भी है कि इसके लिए हमारे सीधे-साधे किसानों को खेती में बहुत अधिक पैसा पानी की तरह बहाना पड़ रहा है, जिससे उनकी लागत लगातार बढ़ रही है. एक कड़वी हकीकत यह भी है कि भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता देश है, लेकिन जब बात इसके उत्पादन की आती है, तो हम दुनिया में तीसरे नंबर पर खिसक जाते हैं. उत्पादन और खपत के बीच का यही फासला हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है.
आज के दौर में खाड़ी देशों में चल रहे जंग के खौफनाक हालातों, इससे पैदा हुए कच्चे माल के संकट और विदेशी निर्भरता के भारी आर्थिक बोझ को देखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी किसानों से इन रसायनों का इस्तेमाल आधा करने और हर हाल में 'प्राकृतिक खेती' की तरफ कदम बढ़ाने की पुरजोर अपील की है. यह बात इसलिए भी गंभीर है क्योंकि भारत इन रासायनिक खादों की किल्लत को पूरा करने के लिए आज भी काफी हद तक विदेशों से होने वाले इम्पोर्ट पर निर्भर है, जिससे देश का खजाना बाहर चला जाता है.
जब पिछले 10 सालों से सरकार लगातार अपील कर रही है, तो फिर यह खपत घटने के बजाय बढ़ती क्यों जा रही है? हमें पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ खेती की लागत को कम करने और मिट्टी को जहर-मुक्त बनाने के लिए प्राकृतिक खेती के इस मिशन को कागजी फाइलों से बाहर निकालकर हकीकत में खेतों तक पहुंचाना होगा, वरना आने वाली नस्लें हमें कभी माफ नहीं करेंगी.