एक लाख से ज्यादा देसी किस्में सुरक्षित, सरकार बचा रही पारंपरिक बीजों की विरासत

एक लाख से ज्यादा देसी किस्में सुरक्षित, सरकार बचा रही पारंपरिक बीजों की विरासत

सरकार देशी बीजों और पारंपरिक फसलों के संरक्षण को बढ़ावा दे रही है. ICAR, NBPGR और विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों को देशी किस्मों के संरक्षण, बीज उत्पादन, प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता दी जा रही है. जानिए कैसे एक लाख से ज्यादा पारंपरिक किस्मों को सुरक्षित रखा गया है और किसानों को मखाना, मिलेट सहित स्थानीय उत्पादों से जोड़ा जा रहा है.

एक लाख से ज्यादा देशी किस्में सुरक्षितएक लाख से ज्यादा देशी किस्में सुरक्षित
क‍िसान तक
  • Noida,
  • Jul 29, 2026,
  • Updated Jul 29, 2026, 12:26 PM IST

भारत में पारंपरिक कृषि उपज और देशी बीजों को बढ़ावा देने के लिए सरकार कई योजनाओं पर काम कर रही है. इसका उद्देश्य देश की पुरानी और खास फसल किस्मों को सुरक्षित रखना, किसानों को इनका उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना और इन उत्पादों को बाजार से जोड़ना है. कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने लोकसभा में जानकारी देते हुए बताया कि सरकार देशी जर्मप्लाज्म, पारंपरिक किस्मों और स्थानीय फसलों के संरक्षण के लिए कई कदम उठा रही है.

देशी बीजों के संरक्षण का काम कर रहा ICAR

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) देशी बीजों और फसलों की किस्मों को सुरक्षित रखने का काम कर रहे हैं. इसके तहत देशभर से पारंपरिक बीजों को इकट्ठा किया जाता है, उनका अध्ययन किया जाता है और उन्हें सुरक्षित रखा जाता है.

इन बीजों में कई ऐसी पुरानी किस्में शामिल हैं जो मौसम की चुनौतियों को सहन करने और स्थानीय परिस्थितियों में बेहतर उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं. इनका इस्तेमाल भविष्य में नई और बेहतर फसल किस्में विकसित करने में किया जा सकता है.

5346 किसान किस्मों को मिला पंजीकरण

पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण (PPV&FR) अधिनियम, 2001 के तहत पारंपरिक और किसानों द्वारा विकसित किस्मों को कानूनी पहचान दी जाती है. सरकार के अनुसार, 15 जुलाई 2026 तक PPV&FR प्राधिकरण द्वारा पारंपरिक किस्मों और स्थानीय प्रजातियों से जुड़ी 5346 किसान किस्मों का पंजीकरण किया जा चुका है. इससे किसानों और समुदायों को अपनी पारंपरिक किस्मों के संरक्षण और उपयोग का अधिकार मिलता है.

राष्ट्रीय जीन कोष में सुरक्षित हैं एक लाख से ज्यादा किस्में

पारंपरिक फसलों और पौधों की विविधता को बचाने के लिए राष्ट्रीय जीन कोष बनाया गया है. इसमें देशभर की अलग-अलग फसलों की किस्मों को सुरक्षित रखा जाता है. ICAR-NBPGR के अनुसार, राष्ट्रीय जीन बैंक में अब तक 1 लाख से ज्यादा स्थानीय प्रजातियां और पारंपरिक किस्में संरक्षित की जा चुकी हैं. इससे वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को नई फसल किस्में विकसित करने में मदद मिलती है.

किसानों को मिल रहे पुरस्कार और प्रोत्साहन

सरकार पारंपरिक बीजों और फसलों को बचाने वाले किसानों और समुदायों को सम्मानित भी कर रही है. इसके लिए जीन संरक्षक पुरस्कार और मान्यता योजनाएं चलाई जा रही हैं. अब तक देशभर के किसानों और कृषक समुदायों को 45 पादप जीनोम संरक्षक सामुदायिक पुरस्कार, 69 पादप जीनोम संरक्षक कृषक पुरस्कार और 88 पादप जीनोम संरक्षक कृषक मान्यता दी जा चुकी है.

पारंपरिक बीजों के उत्पादन के लिए मिल रही आर्थिक मदद

किसानों को पारंपरिक फसलों के बीज उपलब्ध कराने और इनके उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन (NFSNM) के तहत एक विशेष पहल शुरू की गई है. इस योजना के तहत पारंपरिक किस्मों के बीज उत्पादन, किसानों को बीज वितरण, प्रशिक्षण और बीज बैंक बनाने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है. इससे किसानों को अच्छे गुणवत्ता वाले देशी बीज आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे.

मखाना, लीची और मिलेट जैसे उत्पादों को मिल रहा बढ़ावा

सरकार पारंपरिक कृषि उत्पादों को बाजार से जोड़ने के लिए भी काम कर रही है. प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) के तहत एक जिला एक उत्पाद (ODOP) योजना के जरिए स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा दिया जा रहा है. इसके तहत मखाना, शाही लीची, जर्दालू आम जैसे पारंपरिक उत्पादों को पहचान दी जा रही है. इन उत्पादों की प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बिक्री के लिए किसानों और छोटे उद्योगों को सहायता दी जाती है.

GI टैग से बढ़ रही पारंपरिक उत्पादों की पहचान

देश के कई पारंपरिक कृषि उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) के माध्यम से पहचान और सुरक्षा दी जा रही है. GI टैग मिलने से किसी खास क्षेत्र में पैदा होने वाले उत्पादों की अलग पहचान बनती है और किसानों को बेहतर बाजार मिलने में मदद मिलती है.

मिलेट यानी श्री अन्न पर सरकार का विशेष फोकस

अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष 2023 के बाद सरकार ने मोटे अनाज यानी श्री अन्न को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया है. हैदराबाद स्थित ICAR-भारतीय मिलेट्स शोध संस्थान (IIMR) को मिलेट्स से जुड़े शोध और विकास के लिए वैश्विक उत्कृष्टता केंद्र बनाया गया है.

इसके अलावा मिलेट आधारित उत्पादों की प्रोसेसिंग और कारोबार को बढ़ावा देने के लिए खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की योजनाओं के तहत भी सहायता दी जा रही है.

देशी फसलों को बेहतर बनाने के लिए शोध जारी

सरकार देशी फसलों की गुणवत्ता सुधारने और उन्हें अधिक उपयोगी बनाने के लिए कई शोध परियोजनाएं चला रही है. ICAR-IARI, ICAR, DBT और DST के सहयोग से गेहूं, चावल, मक्का, तिल, मसूर, खीरा और टमाटर जैसी फसलों की देशी किस्मों पर शोध किया जा रहा है.

इन शोधों का उद्देश्य ऐसी फसल किस्में तैयार करना है जो ज्यादा उत्पादन दें, जलवायु परिवर्तन को सहन कर सकें और रोगों से बचाव कर सकें.

देशी किस्मों से विकसित हुईं नई फसलें

ICAR-IARI के शोध से पारंपरिक बासमती चावल की किस्मों में सुधार किया गया है. इससे विकसित हुई पूसा बासमती किस्मों का भारत के बासमती चावल निर्यात में बड़ा योगदान है.

इसी तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध पारंपरिक किस्म कालानमक धान को बेहतर बनाने के लिए पूसा नरेंद्र KN1 और पूसा CRD KN2 जैसी नई किस्में विकसित की गई हैं.

सामुदायिक बीज बैंक से बचाई जा रही पुरानी किस्में

देशभर में सामुदायिक बीज बैंकों के जरिए भी पारंपरिक किस्मों को सुरक्षित रखने का काम किया जा रहा है. विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से लगभग 50 सामुदायिक बीज बैंक बनाए गए हैं, जहां 25 से अधिक फसलों की हजारों पारंपरिक किस्मों को संरक्षित किया जा रहा है.

इसके अलावा देशी उत्पादों की पोषण गुणवत्ता की पहचान कर उन्हें बाजार से जोड़ने की कोशिश भी की जा रही है.

सरकार का लक्ष्य पारंपरिक खेती को मजबूत बनाना

सरकार का कहना है कि पारंपरिक बीज और कृषि उत्पाद देश की कृषि विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. इन्हें सुरक्षित रखने से न केवल जैव विविधता बचाई जा सकती है, बल्कि किसानों को नए बाजार और बेहतर आय के अवसर भी मिल सकते हैं. लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, सरकार शोध, बीज संरक्षण, किसानों को सहायता और स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग के जरिए पारंपरिक कृषि को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है.

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