
अगर आप सोचते हैं कि धान सिर्फ सफेद चावल देने वाली एक फसल है, तो छत्तीसगढ़ का यह जैव संग्रहालय आपकी सोच पूरी तरह बदल देगा. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में देश का सबसे बड़ा जैव विविधता संग्रहालय स्थापित है, जहां अकेले 23,250 पारंपरिक धान किस्मों (जर्मप्लाज्म) का संरक्षण किया गया है. यह भारत में धान की सबसे बड़ी जर्मप्लाज्म विरासत मानी जाती है.
इस संग्रहालय का नाम देश के प्रसिद्ध धान वैज्ञानिक डॉ. आर.एल. रिछारिया के नाम पर रखा गया है.उन्होंने वर्षों तक देश के अलग-अलग राज्यों और गांवों से पारंपरिक धान की दुर्लभ प्रजातियों को खोजकर संरक्षित किया था.आज यह संग्रहालय किसानों, वैज्ञानिकों और शोधार्थियों के लिए धान की जैव विविधता का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है.
संग्रहालय में केवल धान ही नहीं, बल्कि विभिन्न फसलों की 30,875 प्रजातियों का भौतिक प्रदर्शन किया गया है. इनमें धान की 23,250, तिवरा की 1,009 तथा अलसी की 2,000 से अधिक प्रजातियों सहित अन्य फसलों के कुल 6,125 जर्मप्लाज्म भी सुरक्षित रखे गए हैं. प्रत्येक प्रजाति के विशेष गुण और वैज्ञानिक जानकारी डिजिटल माध्यम से भी प्रदर्शित की गई है.
छत्तीसगढ़ अपनी सुगंधित धान किस्मों के लिए देशभर में प्रसिद्ध है.संग्रहालय में राजा भोग, विष्णु भोग, ठाकुर भोग, शीतल भोग, मुनि भोग, इलायची, लोक्ति मांझी और केरागुल जैसी कई दुर्लभ सुगंधित किस्मों को संरक्षित किया गया है. इनमें इलायची धान का दाना इलायची के बीज जैसा दिखाई देता है, जबकि केरागुल किस्म का चावल मुंह में जाते ही घुल जाने के लिए प्रसिद्ध है.
विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अभिनव साव के अनुसार संग्रहालय में कई ऐसी धान किस्में मौजूद हैं जिनमें औषधीय गुण पाए जाते हैं। इन पर भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के सहयोग से वैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है.लाल चावल वाली किस्मों में एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं.
इस संग्रहालय में कई ऐसी धान किस्मों का जर्मप्लाज्म भी संरक्षित है जो अब खेती से लगभग विलुप्त हो चुकी हैं.
विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डॉ. विवेक कुमार त्रिपाठी ने बताया कि हर वर्ष लगभग 10,000 धान किस्मों का खेतों में परीक्षण किया जाता है ताकि उनके गुणों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जा सके.उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय ने भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के सहयोग से धान की 6 बौनी किस्में विकसित की हैं. ये किस्में बेहतर उत्पादन के साथ सुगंध और गुणवत्ता के लिए भी जानी जाती हैं.
विश्वविद्यालय ने किसानों द्वारा संरक्षित 500 से अधिक पारंपरिक फसल प्रजातियों का भारत सरकार में पंजीकरण कराया है. इन सभी प्रजातियों को भी संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है, ताकि भविष्य में नई और उन्नत किस्मों के विकास में इनका उपयोग किया जा सके.
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में लगातार महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है. स्थापना के बाद से अब तक विश्वविद्यालय 164 नई फसल प्रजातियां विकसित कर चुका है. संस्थान की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर मंगला पारीख ने बताया हाल ही में विश्वविद्यालय द्वारा विकसित 8 नई फसल किस्में भी संग्रहालय में प्रदर्शित हैं, जिनमें बौनी विष्णुभोग, बौनी सोनागाठी, छत्तीसगढ़ धान-1919, छत्तीसगढ़ तेजस्वी धान, सीजी अगेती संकर मक्का, छत्तीसगढ़ सोयाबीन-1115, सीजी करायत-1 और सीजी केप गूसबेरी-1 शामिल हैं.
विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ.गिरीश चंदेल ने बताया आर.एल. रिछारिया जैव विविधता संग्रहालय केवल धान की किस्मों का संग्रह नहीं, बल्कि भारत की कृषि विरासत, जैव विविधता और वैज्ञानिक अनुसंधान का जीवंत केंद्र है. यहां संरक्षित हजारों पारंपरिक और दुर्लभ किस्में आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन, पोषण सुरक्षा और नई उन्नत फसल किस्मों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. यही वजह है कि यह संग्रहालय कृषि वैज्ञानिकों, शोधार्थियों और किसानों के लिए किसी खजाने से कम नहीं है.