
अप्रैल महीने में गेहूं की कटाई शुरू होते ही किसानों के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है पराली प्रबंधन की. फसल कटने के बाद खेतों में बची पराली को हटाना कई किसानों के लिए मुश्किल काम बन जाता है. ऐसे में हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश में गेहूं की सबसे ज्यादा पराली जलाई जा रही है. दरअसल, अक्सर किसान जल्दी अगली फसल बोने के लिए पराली में आग लगा देते हैं, ताकि खेत तुरंत साफ हो जाए. यह तरीका आसान जरूर लगता है, लेकिन इसके नुकसान बहुत बड़े हैं. पराली जलाने से हवा प्रदूषित होती है और आसपास के लोगों की सेहत पर असर पड़ता है और सबसे ज्यादा नुकसान खेत की मिट्टी को होता है. ऐसे में अगर आप इस नुकसान से बचना चाहते हैं तो पराली को जलाने के बजाय इसके सही उपयोग से मिट्टी की सेहत सुधार सकते हैं. आइए जानते हैं कैसे.
किसानों को पराली जलाने के बजाय उसका सही प्रबंधन करना चाहिए, ताकि खेत की मिट्टी भी सुरक्षित रहे और पर्यावरण को भी नुकसान न पहुंचे. इसके लिए किसान आधुनिक कृषि मशीनों जैसे सुपर सीडर मशीन का उपयोग कर सकते हैं. इस मशीन की मदद से पराली को खेत में ही काटकर मिट्टी में आसानी से मिलाया जा सकता है. इसके बाद पराली धीरे-धीरे सड़कर जैविक खाद में बदल जाती है. यह खाद मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ाने, नमी बनाए रखने और फसल की पैदावार सुधारने में काफी मददगार होती है. इस तरह किसान बिना पराली जलाए खेत तैयार कर सकते हैं और कम खर्च में मिट्टी की सेहत भी सुधार सकते हैं.
गेहूं की फसल के बाद बची पराली को बेकार समझ कर जलाने की जरूरत नहीं है. इसका कई उपयोगी तरीकों से इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे किसानों को फायदा भी होगा और खेत की सेहत भी सुधरेगी. पराली का सबसे अच्छा उपयोग पशुओं के चारे के रूप में किया जा सकता है. इसके अलावा इसे मशरूम की खेती में भी इस्तेमाल किया जाता है. साथ ही खेतों में मल्चिंग के लिए भी पराली बेहद फायदेमंद है. इसे फसल के आसपास बिछाने से मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है, खरपतवार कम उगते हैं और तेज धूप से जमीन की सुरक्षा होती है. समय के साथ यही पराली सड़कर जैविक खाद में बदल जाती है, जिससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ती है.
पराली को खेत में जलाने के बजाय उसे कंपोस्ट खाद में बदलना किसानों के लिए बेहद फायदेमंद तरीका है. फसल कटाई के बाद बची पराली को इकट्ठा करके सड़ाया जाए तो इससे अच्छी क्वालिटी वाली जैविक खाद तैयार की जा सकती है. इस खाद के इस्तेमाल से मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर होता है और जमीन की उर्वरक क्षमता बढ़ती है. साथ ही मिट्टी की जलधारण क्षमता भी मजबूत होती है, जिससे खेत में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और फसल को फायदा मिलता है. पराली से बनी कंपोस्ट खाद का उपयोग करने से रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होती है. इससे किसानों को बाजार से महंगी खाद खरीदने पर होने वाला खर्च भी बचेगा. ऐसे में अगर किसान पराली जलाने के बजाय उससे खाद बनाएं, तो इससे पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा और खेती भी ज्यादा लाभदायक बनेगी.