
आजकल हम सब देख रहे हैं कि गेहूं और धान के चक्कर में हमारी जमीन की उपजाऊ शक्ति लगातार कम होती जा रही है. पहले के समय में किसान साल में एक बार दाल वाली फसल जरूर लगाता था, जिससे मिट्टी की सेहत बनी रहती थी. लेकिन आज हम साल में 3-4 फसलें लेने की कोशिश तो करते हैं, पर बदले में जमीन को सिर्फ यूरिया और डीएपी जैसे कड़वे केमिकल ही दे रहे हैं. इसका नतीजा यह है कि हमारी मिट्टी बीमार हो गई है और खेती की लागत आसमान छू रही है. किसान भाई दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन महंगे रासायनिक खादों में चला जाता है. अब समय आ गया है कि हम अपनी जमीन को कुछ वापस देना शुरू करें. इसके लिए 'ढैंचा' यानी हरी खाद से बेहतर और सस्ता कोई रास्ता नहीं है. ढैंचा न केवल मिट्टी की कमजोरी दूर करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ जमीन को बचाकर भी रखता है. इसलिए हमें यह समझना होगा कि बिना मिट्टी की सेहत सुधारे हम लंबे समय तक अच्छी पैदावार नहीं ले सकते.
आसान भाषा में कहें तो हरी खाद का मतलब है ऐसी पत्तेदार फसलें उगाना जो जल्दी बढ़ती हैं और जिन्हें फूल आने से पहले ही खेत में जोतकर मिट्टी में दबा दिया जाता है. जब ये पौधे मिट्टी में गलते हैं, तो ये खाद का काम करते हैं , विशेषज्ञों के अनुसार हरी खाद के लिए ढैंचा सबसे बेस्ट माना जाता है. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे बहुत कम पानी चाहिए और यह खराब से खराब जमीन में भी आसानी से उग जाता है. जहाँ बाकी फसलें मर जाती हैं, वहाँ ढैंचा डटकर खड़ा रहता है. यह मिट्टी को वो सब कुछ देता है जिसकी उसे जरूरत है- जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश. ढैंचा की जड़ें जमीन के अंदर जाकर उसे हवादार बनाती हैं और मिट्टी में 'ह्यूमस' यानी जैविक पदार्थ बढ़ाती हैं. इसे लगाने के बाद आपको गोबर की खाद के लिए पशुओं पर भी निर्भर नहीं रहना पड़ता, क्योंकि यह खुद एक बेहतरीन खाद है.
विशेषज्ञों के अनुसार ढैंचा लगाने का सबसे सही समय अप्रैल से लेकर जुलाई तक का होता है. एक एकड़ खेत के लिए आपको करीब 20 से 25 किलो बीज की जरूरत पड़ती है. बुवाई से पहले खेत की हल्की जुताई कर लें और ध्यान रहे कि जमीन में थोड़ी नमी हो. बीज को जल्दी और अच्छा उगाने के लिए आप इसे एक रात पहले पानी में भिगोकर रख सकते हैं. इसे आप खेत में छिड़ककर बो सकते हैं. सबसे अच्छी बात यह है कि ढैंचा उगाने के लिए आपको यूरिया या किसी और खाद की जरूरत नहीं पड़ती, बस थोड़ा सा फास्फोरस डाल देने से फसल बहुत अच्छी और घनी तैयार हो जाती है.
ढैंचा की फसल बहुत तेजी से बढ़ती है और लगभग 45 से 50 दिनों में यह करीब 3 फीट ऊंची हो जाती है. जब इसमें फूल आने शुरू हों, बस उसी समय इसे खेत में जोत देना चाहिए. खड़ी फसल पर हैरो या कल्टीवेटर चलाकर इसे मिट्टी में मिला दें और खेत में पानी भर दें. पानी मिलने से ढैंचा के पौधे जल्दी सड़ जाते हैं और मिट्टी में पूरी तरह घुल जाते हैं. इस पूरे काम में बीज और जुताई मिलाकर मुश्किल से 1500 रुपये प्रति एकड़ का खर्चा आता है, लेकिन इससे मिलने वाली खाद की कीमत बाजार में हजारों रुपये होती है. ढैंचा की एक ही फसल से आपके खेत को 35 से 40 किलो तक की कीमती नाइट्रोजन मुफ्त में मिल जाती है.
विशेषज्ञो के अनुसार ढैंचा को मिट्टी में दबाने के बाद धान या कोई और फसल लगाते हैं, तो आप खुद फर्क देखेंगे. फसल का रंग गहरा हरा होगा, बीमारियांकम लगेंगी और पैदावार में जबरदस्त बढ़ोतरी होगी. आजकल की भीषण गर्मी में जब मिट्टी की ताकत जलने लगती है, तब ढैंचा उसे ठंडा और उपजाऊ बनाए रखता है. यह न केवल आज की फसल के लिए अच्छा है, बल्कि आने वाले कई सालों तक जमीन को उपजाऊ रखता है. तो देर किस बात की? रासायनिक खादों के जहरीले चक्कर से बाहर निकलें, ढैंचा अपनाएं और कम खर्चे में ज्यादा मुनाफा कमाएं.
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