
मध्य प्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूंग की फसल किसानों के लिए आय का एक मजबूत स्रोत बनकर उभर रही है. प्रदेश के बड़े क्षेत्र में इसकी खेती की जाती है, जिससे किसानों को अच्छा उत्पादन मिलने के साथ उनकी आय में भी लगातार वृद्धि हो रही है. मूंग न केवल पोषण के लिहाज से महत्वपूर्ण दलहनी फसल है, बल्कि यह मिट्टी की उर्वरता सुधारने में भी सहायक मानी जाती है.
हालांकि, मूंग की फसल में कई प्रकार के कीट और रोगों का प्रकोप देखने को मिलता है, जो समय पर नियंत्रण न होने पर उत्पादन को काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं. इसे ध्यान में रखते हुए दलहन विकास निदेशालय ने किसानों के लिए विस्तृत एडवाइजरी जारी की है, जिसमें प्रमुख कीट-रोगों की पहचान और उनके नियंत्रण के उपाय बताए गए हैं.
यह एक बहुभक्षी कीट है, जो फसल की शुरुआती अवस्था में ही पत्तियों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है. इसकी सुंडी फलियों में गोल छेद कर अंदर दाने को खाती है, जबकि शरीर का कुछ हिस्सा बाहर दिखाई देता है. इससे सीधे उत्पादन पर असर पड़ता है.
तंबाकू इल्ली भी बहुभक्षी कीट है, जिसकी सुंडी पत्तियों के क्लोरोफिल को खाकर पौधे की वृद्धि रोक देती है. यह तेजी से पूरे खेत में फैलकर भारी नुकसान पहुंचा सकती है.
फली भेदक कीट कई फसलों को प्रभावित करता है, लेकिन मूंग में इसका प्रकोप अधिक देखा जाता है.
प्रोफेनोफॉस 50% EC @ 1250 मि.ली/हेक्टेयर छिड़काव
सफेद मक्खी फसल का रस चूसकर पौधों को कमजोर कर देती है और वायरस रोग फैलाने का भी काम करती है.
बीज उपचार: थायमेथॉक्झाम 70 WS @ 3 ग्राम/किग्रा बीज
खेत और मेड़ों को खरपतवार मुक्त रखें
थायमेथॉक्झाम 25 WG @ 100 ग्राम/हेक्टेयर छिड़काव
यह मूंग की सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक है, जो पत्तियों को पीला कर देती है और उत्पादन घटा देती है.
इस रोग में पत्तियों और अन्य भागों पर सफेद पाउडर जैसा दिखाई देता है. अधिक संक्रमण होने पर पत्तियां पीली होकर गिर जाती हैं और फसल समय से पहले पक जाती है, जिससे उपज घटती है.