
भारत में फलों के कुल रकबे में आम का हिस्सा सबसे बड़ा है. एक तरफ जहां पैदावार बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर नए किस्म के विनाशकारी कीट किसानों के लिए चुनौती बन रहे हैं. पिछले कुछ सालों से रेड बैंडेड कैटरपिलर नाम का एक छोटा सा कीड़ा आम की पैदावार के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है. बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल जैसे राज्यों में इस कीट का हमला इतना जबरदस्त है कि कहीं-कहीं 80 से 90 फीसदी फसल बर्बाद हो रही है. दरअसल, बदलते मौसम, बेवक्त की बारिश और हवा में बढ़ती नमी ने इस दुश्मन कीट के फलने-फूलने के लिए मुफीद माहौल तैयार कर दिया है.
जब आम का फल मटर या मार्बल के दाने जैसा छोटा होता है, तब यह कीट सबसे ज़्यादा हमला करता है. डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, पूसा- समस्तीपुर, पौध सुरक्षा विभाग के हेड डॉ. एस. के. सिंह ने बताया कि अगर किसान वक्त रहते चौकन्ने नहीं हुए तो पूरी साल की मेहनत मिट्टी में मिल सकती है. इसलिए बागों की निगरानी करना और सही समय पर इसका इलाज करना आज के दौर में बेहद जरूरी हो गया है.
रेड बैंडेड बोरर कीट को पहचानने के लिए आपको अपनी पारखी नजर का इस्तेमाल करना होगा. इस कीट की मादा पतंगा आम के डंठल पर छोटे-छोटे अंडे देती है, जो शुरू में सफेद और बाद में गहरे लाल हो जाते हैं. जब इनसे लार्वा (इल्ली) बाहर निकलता है तो उसके शरीर पर लाल और सफेद रंग की धारियां साफ दिखाई देती हैं. इसी वजह से इसे 'रेड बैंडेड' कहा जाता है.
यह शातिर रेड बैंडेड बोरर कीट फल के अंदर घुसकर गुठली और गूदे को खाना शुरू कर देता है. अगर आपको पेड़ों के नीचे समय से पहले गिरे हुए फल दिखें या फलों पर बारीक छेद और अंदर से सड़न की बदबू आए तो समझ लीजिए कि आपके बाग पर इस दुश्मन का हमला हो चुका है. इसकी एक ही सीजन में 3 से 4 पीढ़ियां तैयार हो जाती हैं, जो तबाही मचाने के लिए काफी हैं.
डॉ. एस. के. सिंह के मुताबिक, इस कीट से निपटने का सबसे बेहतरीन और सस्ता तरीका है 'साफ-सफाई'. जैसे ही आपको जमीन पर गिरे हुए संक्रमित फल दिखें, उन्हें फौरन इकट्ठा करके जमीन में गहरा दबा दें या जला दें, ताकि रेड बैंडेड बोरर कीट का जीवन चक्र (Life Cycle) टूट जाए. बाग में हवा का बेहतर संचार होना चाहिए, इसलिए सूखी टहनियों और फालतू झाड़ियों को हटा दें.
अगर मुमकिन हो, तो छोटे फलों पर पेपर या पॉली बैग चढ़ा दें यह तरीका भले ही मेहनत वाला है लेकिन फसल को 100 फीसदी महफूज रखता है. इसके अलावा, कुदरती दोस्तों जैसे शिकारी कीटों और नीम आधारित दवाओं जैसे एजाडिरैक्टिन का इस्तेमाल करें. ये जैविक उपाय न सिर्फ पर्यावरण के लिए बेहतर हैं, बल्कि आम की मिठास और सेहत को भी बरकरार रखते हैं.
डॉ. एस. के. सिंह के अनुसार, जब कीट का हमला बढ़ जाए तो सिर्फ देसी नुस्खे काम नहीं आते, वहां आधुनिक कीटनाशकों का सहारा लेना जरूरी हो जाता है. कृषि वैज्ञानिकों की राय है कि जब आम का फल मटर के दाने के बराबर हो तब पहला छिड़काव जरूर करें. इसके लिए 'क्लोरेंट्रानिलिप्रोल' 0.4 मिली प्रति लीटर या 'इमामेक्टिन बेंजोएट' 0.4 ग्राम प्रति लीटरजैसी असरदार दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है.
छिड़काव हमेशा शाम के वक्त करें, ताकि दवा का असर ज्यादा समय तक रहे और पूरे पेड़ पर बराबर मात्रा में पहुंचे. जरूरत पड़ने पर 12 से 15 दिनों के बाद दोबारा छिड़काव करना चाहिए. याद रखें, बेतरतीब दवा डालने से बेहतर है कि किसी माहिर या नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह के बाद ही कीटनाशकों का चयन करें.
रेड बैंडेड बोरर एक गंभीर चुनौती जरूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं. इसकी रोकथाम के लिए 'एकीकृत कीट प्रबंधन' (IPM) यानी सफाई, जैविक और रासायनिक तरीकों का सही तालमेल ही सबसे कारगर हथियार है. इसलिए चाहिए कि वे मौसम के मिजाज पर नजर रखें, क्योंकि बादलों वाला मौसम और उमस इस कीट की ताकत बढ़ा देते हैं.
सतर्कता ही सुरक्षा है. अगर हम वक्त पर पहचान कर लें और सही दवाओं का चुनाव करें तो आम की पैदावार और उसकी बाजार में कीमत, दोनों को बचाया जा सकता है. अपनी मेहनत की फसल को इस "लाल धारी वाले दुश्मन" से बचाने के लिए आज ही कमर कस लें और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर अपने बाग को खुशहाल बनाएं.