
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने साल 2026 के लिए चेतावनी दी है कि इस बार दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सामान्य से कम रह सकता है और कुल बारिश औसत से करीब 10 फीसदी घट सकती है. इसके साथ ही प्रशांत महासागर में 'अल नीनो' के एक्टिव होने से देश में सूखा पड़ने, मॉनसून में देरी होने और बीच-बीच में लंबा सूखा दौर खिंचने का खतरा बहुत बढ़ जाता है. हालांकि सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय बीज रिजर्व और बांधों में पानी के बेहतर स्तर जो आम दिनों से करीब 127 फीसदी ज्यादा है, इसके दम पर इमरजेंसी प्लान लागू कर दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर चुनौती फिर भी बड़ी है.
ऐसे में किसानों को घबराने के बजाय 'सक्रिय होकर पहले से तैयारी रखने का तरीका अपनाना होगा ताकि उनकी पैदावार पर कोई आंच न आए. अल नीनो भले ही एक बड़ी प्राकृतिक मुसीबत है, लेकिन आज की नई तकनीक के दौर में इससे निपटना नामुमकिन नहीं है. बस किसानों को पुरानी आदतों पर टिके रहने के बजाय मौसम विभाग के सैटेलाइट वाले साप्ताहिक अनुमानों और अपने इलाके के कृषि विज्ञान केंद्र के अलर्ट को मोबाइल पर देखकर उसी हिसाब से अपनी रोज की खेती का फैसला लेना होगा.
कम बारिश और अल नीनो के कारण बढ़ने वाले तापमान का हमारी मुख्य खरीफ फसलों पर सीधा और घातक प्रहार पड़ता है. विशेषज्ञो के अनुसार जहां पानी की अत्यधिक मांग वाली धान जैसी फसल में मॉनसून की देरी से नर्सरी और रोपाई चक्र प्रभावित होता है, वहीं गन्ना और कपास में निरंतर नमी की कमी से गन्ने की लंबाई, रस की मात्रा और कपास के फूलों और गूलर के समय से पहले गिरने की समस्या आती है.
इसके साथ ही, मिट्टी की नमी खत्म होने से दलहन और तिलहन के बीजों का अंकुरण बाधित होता है, शुष्क और गर्म मौसम के कारण फसलों पर एफिड्स, सफेद मक्खी और थ्रिप्स जैसे रस चूसने वाले हानिकारक कीटों का हमला कई गुना बढ़ जाता है, जिससे पौधे अपनी आंतरिक रोग-प्रतिरोधक क्षमता खो देते हैं.
चूंकि धान भारतीय कृषि की जीवनरेखा है और इसमें सबसे ज्यादा पानी लगता है, इसलिए अल नीनो के संकट से निपटने के लिए धान प्रबंधन में बड़े बदलाव करने होंगे. अल नीनो के संकट से निपटने के लिए धान प्रबंधन में बड़े बदलाव करने होंगे, जिसके तहत सबसे पहले पारंपरिक लंबी 140-150 दिन की अवधि वाली किस्मों की जगह कम समय में पकने वाली और सूखा-सहनशील उन्नत किस्मों को चुनना चाहिए जो कम पानी में भी बेहतर पैदावार देती हैं.
इसके साथ ही, यदि मॉनसून में बहुत ज्यादा देरी हो, तो पारंपरिक रोपाई के बजाय धान की सीधी बुवाई (DSR - Direct Seeded Rice) तकनीक अपनाएं, जिससे नर्सरी तैयार करने और पानी भरने की जरूरत नहीं पड़ती और लगभग 25% से 30% पानी की बचत होती है. वहीं, अगर रोपाई ही करनी हो, तो कम पानी में मजबूत पौधे तैयार करने के लिए नर्सरी को 'मैट नर्सरी' या 'श्री विधि' से तैयार करें और ध्यान रखें कि रोपाई के समय पौधों की उम्र 21-25 दिन से अधिक न हो.
मॉनसून आने से पहले और बुवाई के शुरुआती दिनों में किसानों को कुछ जरूरी कदम उठाने चाहिए ताकि फसलों की नींव मजबूत रहे. इसके लिए सबसे पहले गर्मी में खेतों की गहरी जुताई करें जिससे मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता बढ़े, और खेतों के चारों तरफ मजबूत मेड़बंदी करें ताकि बारिश का एक-एक कतरा खेत में ही रुका रहे. साथ ही, बुवाई से पहले खेत की मिट्टी में अच्छी मात्रा में गोबर की खाद, कम्पोस्ट या वर्मीकम्पोस्ट जरूर मिलाएं, क्योंकि ऐसी जैविक खाद वाली मिट्टी में पानी को लंबे समय तक रोक कर रखने की गजब की ताकत होती है.
इसके अलावा फसल विविधीकरण के तहत फसलें बदलकर बोने की तैयारी रखें. यानी अगर पानी की ज्यादा कमी होने का डर हो, तो धान की जिद छोड़कर उसकी जगह कम पानी में होने वाली फसलें जैसे बाजरा, रागी, मक्का, उड़द या मूंग लगाने की योजना बनाएं. जोखिम को कम करने के लिए खेत के कम से कम आधे हिस्से में इंटरक्राप यानी एक साथ दो फसलें उगाने का तरीका अपनाएं.
अगर मॉनसून के बीच में बारिश रुक जाए या बुवाई के बाद लंबा सूखा दौर आए, तो खड़ी फसल को बचाने के लिए किसानों को कुछ खास वैज्ञानिक तरीके अपनाने चाहिए. इसके लिए सबसे पहले जहां भी संभव हो ड्रिप या स्प्रिंकलर सिंचाई का इस्तेमाल करें जो सीधे जड़ों तक पानी पहुंचाती हैं, और कतारों के बीच सूखी घास, पुआल या प्लास्टिक बिछाकर (मल्चिंग) करें. मिट्टी की नमी को उड़ने से बचाएं और ध्यान रखें कि सूखे के समय सीधे तौर पर खेत में भारी मात्रा में सूखा यूरिया बिल्कुल न डालें क्योंकि पानी की कमी में यह फसल को जला सकता है. इसके अलावा, गर्म मौसम में कीटों का हमला होते ही देर न करें. रस चूसने वाले कीटों के लिए और छेदक कीटों के लिए वैज्ञानिक सलाह से सही मात्रा में छिड़काव करके अपनी खड़ी फसल को बर्बाद होने से बचाएं.
अल नीनो भले ही एक बड़ी प्राकृतिक चुनौती है, लेकिन आज की आधुनिक तकनीक के दौर में यह अजेय नहीं है. किसानों को केवल पारंपरिक आदतों पर निर्भर न रहकर मौसम विज्ञान विभाग के उपग्रह आधारित साप्ताहिक पूर्वानुमानों और स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्रों के अलर्ट को अपनी दैनिक खेती का हिस्सा बनाना होगा.
फसलों में विविधता लाना, उन्नत फसल संरक्षण समाधानों को अपनाना और कुशल सिंचाई प्रणालियों में निवेश करना अब सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारी जरूरत बन चुका है. बदलते पर्यावरण के अनुसार खुद को ढालकर और वैज्ञानिक साधनों को अपनाकर हम अल नीनो जैसी हर चुनौती को मात देकर अपनी फसलों को सुरक्षित रख सकते हैं.