
आज के दौर में भारत के किसानों के लिए केले की खेती मोटी कमाई कराने वाली एक शानदार नकदी फसल (कैश क्रॉप) बनकर उभरी है. लेकिन बदलती जलवायु सिंचाई के गलत तरीकों और मिट्टी की बिगड़ती सेहत ने अब किसानों की चिंता बढ़ा दी है. इस वक्त सबसे बड़ी मुसीबत मिट्टी में बढ़ता नमक यानी लवणता (सैलिनिटी) बन रही है, जो धीरे-धीरे एक "साइलेंट किलर" की तरह खेतों को बर्बाद कर रही है. खासकर उन इलाकों में जहां खेतों से पानी निकलने का सही रास्ता नहीं है या जहां सिंचाई के लिए खारे पानी का इस्तेमाल होता है, वहां केले के पौधों की पत्तियां किनारों से जलने और झुलसने लगती हैं.
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा बिहार के प्लांट पैथोलॉजी विभाग के हेड डॉ. एस.के. सिंह का कहना है कि यह पत्तियों का झुलसना कोई आम बीमारी नहीं, बल्कि मिट्टी के भीतर छिपे "नमक के जहर" की एक गंभीर चेतावनी है. अगर वक्त रहते इस परेशानी को नहीं पहचाना गया, तो केले की पैदावार, उसकी क्वालिटी और किसानों की जेब पर बहुत बुरा असर पड़ेगा.
खेतों में नमक बढ़ने की सबसे बड़ी वजह यह है कि जमीन के नीचे का पानी लगातार नीचे जा रहा है, जिससे मजबूरन किसानों को खारे पानी से सिंचाई करनी पड़ रही है. इसके साथ ही, जरूरत से ज्यादा केमिकल फर्टिलाइजर्स का अंधाधुंध इस्तेमाल, खेत में पानी का जमा होना और गोबर की खाद जैसे जैविक पदार्थों की कमी इस आग में घी का काम कर रही है.
वैज्ञानिक भाषा में समझें तो जब मिट्टी में सोडियम और क्लोराइड जैसे हानिकारक तत्वों की तादाद बहुत बढ़ जाती है, तो पौधों की जड़ें पानी को सोखना बंद कर देती हैं. इस अजीबोगरीब हालत को वैज्ञानिक "फिजियोलॉजिकल ड्राउट" यानी शारीरिक सूखा कहते हैं. इसका मतलब यह है कि खेत में पानी तो मौजूद रहता है, लेकिन इसके बावजूद पौधा प्यासा रह जाता है और सूखे जैसी मार झेलता है. नतीजा यह होता है कि पौधों की बढ़ने की रफ्तार रुक जाती है, पत्तियां पीली पड़कर झुलस जाती हैं और बाजार में बिकने वाले केले छोटे और कमजोर रह जाते हैं.
इस 'धीमे जहर' से अपनी फसल को बचाने के लिए सबसे जरूरी कदम है समय पर लक्षणों को पहचानना और मिट्टी की जांच करवाना. अगर आपके खेत में पत्तियों के किनारे सूख रहे हैं, नई पत्तियां छोटी आ रही हैं, या फिर धूप निकलने पर जमीन की ऊपरी सतह पर सफेद रंग की नमक की परत दिखाई दे रही है, तो समझ जाइये कि मामला गंभीर है.
कृषि विशेषज्ञों की यह पक्की सलाह है कि केला उगाने वाले किसानों को हर दो से तीन साल में अपने खेत की मिट्टी की जांच जरूर करानी चाहिए. इससे मिट्टी के पीएच (pH) और उसकी इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी (EC) यानी विद्युत चालकता का सही-सही अंदाजा हो जाता है. अगर मिट्टी का EC लेवल 4 से ज्यादा आता है, तो यह खतरे का निशान है. ऐसी हालत में बिना वैज्ञानिकों की सलाह के कोई भी रासायनिक खाद डालना खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा.
मिट्टी के इस खारेपन के इलाज के लिए 'जिप्सम' एक वरदान और सबसे असरदार दवा साबित हुआ है. जिप्सम में मौजूद कैल्शियम, मिट्टी में बैठे नुकसानदेह सोडियम को खदेड़ बाहर करता है और जमीन को फिर से उपजाऊ बनाता है. इसके इस्तेमाल से मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, पानी आसानी से जमीन के अंदर जाता है और जड़ों को खुलकर सांस लेने का मौका मिलता है.
डॉ एस. के सिंह के मुताबिक, किसानों को खेत तैयार करते समय 1 से 2 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से जिप्सम का इस्तेमाल करना चाहिए. इसके साथ ही, मिट्टी की ताकत लौटाने के लिए ऑर्गेनिक फार्मिंग का सहारा लेना बेहद जरूरी है. वर्मी कंपोस्ट या गोबर की अच्छी सड़ी हुई खाद, हरी खाद और 'ह्यूमिक एसिड' का इस्तेमाल करने से जमीन में छुपे हुए सूक्ष्मजीव दोबारा एक्टिव हो जाते हैं, जिससे पौधों की तनाव झेलने की ताकत दोगुनी हो जाती है.
इस समस्या का परमानेंट इलाज केवल दवाओं से नहीं, बल्कि पानी के सही बंदोबस्त से ही मुमकिन है. लवणता को काबू में रखने के लिए सबसे पहले खेतों में पानी को जमा होने से रोकना होगा. किसानों को पारंपरिक खुले पानी के बजाय 'ड्रिप इरिगेशन और 'मल्चिंग' की तकनीक को अपनाना चाहिए. ड्रिप सिस्टम से पानी सीधा पौधे की जड़ों तक बूंद-बूंद पहुंचता है, जिससे न सिर्फ पानी की भारी बचत होती है बल्कि जमीन की सतह पर नमक भी जमा नहीं हो पाता.
आज के दौर में जब ग्लोबल वार्मिंग, भयंकर गर्मी और बेमौसम बारिश ने खेती को और मुश्किल बना दिया है, तब ट्राइकोडर्मा और स्यूडोमोनास जैसे फायदेमंद बैक्टीरिया का इस्तेमाल मिट्टी की सेहत के लिए बेहद जरूरी हो गया है. आखिर में, हमें यह याद रखना होगा कि स्वस्थ मिट्टी ही खुशहाल किसान और टिकाऊ खेती की असली बुनियाद है.