अल नीनो से खरीफ फसलों को बचाएगी धान की सीधी बुवाई, ICAR वैज्ञानिकों ने दी अहम सलाह

अल नीनो से खरीफ फसलों को बचाएगी धान की सीधी बुवाई, ICAR वैज्ञानिकों ने दी अहम सलाह

अल नीनो और जलवायु परिवर्तन के कारण मॉनसून में हो रही देरी को देखते हुए ICAR पटना के वैज्ञानिकों ने किसानों को पारंपरिक रोपाई के बजाय मशीनों से धान की सीधी बुवाई करने की सलाह दी है. किसान 15 जुलाई तक इस विधि से खेती कर सकते हैं.

Direct Seeding of RiceDirect Seeding of Rice
अंक‍ित कुमार स‍िंह
  • Patna,
  • Jul 15, 2026,
  • Updated Jul 15, 2026, 4:23 PM IST

वैश्विक स्तर पर पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन से हो रही दिक्कतों से जूझ रहा है. वहीं भारत भी इससे अछूता नहीं है. लेकिन इस साल 'अल नीनो' भारतीय कृषि, विशेषकर खरीफ के मौसम के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है. हाल के समय में कहीं बहुत अधिक बारिश तो कहीं सूखे की स्थिति बनी हुई है. खरीफ सीजन की प्रमुख फसल धान की खेती भी प्रभावित हो रही है. वहीं जलवायु परिवर्तन और अल नीनो साल को ध्यान में रखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के वैज्ञानिक किसानों को पारंपरिक विधि (कदवा अथवा रोपाई) से खेती करने की जगह सीधी बुवाई से धान की खेती करने की सलाह दे रहे हैं.

इन मशीनों से करें खेती

आईसीएआर के वैज्ञानिक बताते हैं कि धान की सीधी बुवाई का उपयुक्त समय 15 से 30 जून तक माना जाता है, लेकिन मॉनसूनी वर्षा में देरी होने पर इस विधि से 15 जुलाई तक खेती की जा सकती है. सीधी बुवाई की मदद से धान की खेती के लिए किसान बिना नर्सरी और बिना कदवा किए, सीधे मशीनों से बुवाई कर सकते हैं.

फसल अवशेष होने पर हैप्पी सीडर, रोटरी डिस्क ड्रिल, डबल डिस्क कोल्टार, स्टार व्हील और साफ खेतों में जीरो टिल ड्रिल या मल्टीक्रॉप जीरो टिल ड्रिल का उपयोग कर सकते हैं. वहीं पर्याप्त नमी होने पर बीजों की बुवाई 2 से 3 सेंटीमीटर की गहराई पर करनी चाहिए.

ऐसी मिट्टी में करें सीधी बुवाई

सीधी बुवाई तकनीक के जरिए किसान बलुई-दोमट मिट्टी से लेकर भारी चिकनी मिट्टी तक में धान की खेती कर सकते हैं. इस विधि से बुवाई करने के लिए धान में 80-120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40-60 किलोग्राम फॉस्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश की जरूरत होती है, नाइट्रोजन की एक-तिहाई और फॉस्फोरस, पोटाश की संपूर्ण मात्रा बुवाई के समय ही प्रयोग करनी चाहिए.

चूंकि पोटाश मशीन के पाइप में चिपक सकता है, इसलिए म्यूरेट ऑफ पोटाश को बुवाई से पहले खेत में छिड़क दें. नाइट्रोजन की बाकी मात्रा को दो बराबर भागों में कल्ले फूटते समय और बाली निकलते समय प्रयोग करना चाहिए. अच्छी किस्में लगभग 40-50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज देती हैं.

सीधी बुवाई से अल नीनो का प्रभाव कम

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस वर्ष अल नीनो का प्रभाव अधिक देखने को मिलेगा, लेकिन अगर किसान सीधी बुवाई से धान की खेती करते हैं तो जल की 30-40 प्रतिशत तक बचत, फसल चक्र का जल्दी पूरा होना (7-12 दिनों की बचत), कम लागत, श्रम पर कम निर्भरता, पौधों की गहरी जड़ें तथा सूखा सहनशीलता जैसे लाभ देखने को  मिलते हैं.

धान की इन किस्मों का करें चयन

अगर किसान अभी भी धान की खेती सीधी बुवाई तकनीक से करना चाहते हैं तो वे कम अवधि वाली और सूखा सहनशील धान की किस्मों जैसे सहभागी धान, स्वर्ण श्रेया, स्वर्ण शक्ति, डीआरआर-42, सरयू-52, राजेंद्र भगवती, पी.आर.एस.-10, एराइज-6129, एराइज तेज, आर.एच.-257, डी.आर.एच.-2366, डी.आर.एच.-834, पी.ए.सी.-807 और स्वर्ण श्रेया का चयन कर सकते हैं.

धान की बुवाई से पहले बीज को 8 से 10 घंटे तक भिगोकर रखें. साथ ही बीज का उपचार जरूर करें. बीज दर 20-25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (मोटा आकार का दाना) और 25-30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (मध्यम आकार का दाना) की मात्रा का उपयोग करें.

खरपतवार के लिए करें यह उपाय

सीधी बुवाई तकनीक से धान की खेती करने में किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती खरपतवार का नियंत्रण है. वहीं खरपतवार नियंत्रण को लेकर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर पटना के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस विधि में खेत में लगातार पानी खड़ा न रहने के कारण खरपतवार बड़ी समस्या बनते हैं. इसके लिए बुवाई के 24-48 घंटे के भीतर (अंकुरण से पहले) पेंडिमेथालिन का 1333 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें. इसके बाद बुवाई के 25-30 दिनों पर बिस्पाइरीबैक सोडियम का 100 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें.

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