
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी, डिजाइन एवं विनिर्माण संस्थान (IIITDM) जबलपुर के सस्टेनेबल एनर्जी टेक्नोलॉजी लैब ने खाद्य एवं कृषि क्षेत्र के लिए "डिजाइन एंड डेवलपमेंट ऑफ इंडिजिनस नोवेल स्मार्ट हाइब्रिड सोलर ड्रायर" विकसित किया है.यह परियोजना मध्यप्रदेश काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के सहयोग से संचालित की जा रही है.इसका उद्देश्य कृषि उत्पादों के वैज्ञानिक प्रसंस्करण के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों की आय बढ़ाना तथा खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाना है.
संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. तुषार चौधरी ने बताया कि इस स्मार्ट हाइब्रिड सोलर ड्रायर में फेज चेंज मैटेरियल (Phase Change Material-PCM) तकनीक का उपयोग किया गया है. सामान्य सोलर ड्रायर केवल सूर्य के प्रकाश रहने तक ही कार्य करते हैं, लेकिन यह नई तकनीक सूर्यास्त के बाद भी लगभग चार घंटे तक संचित ऊष्मा के माध्यम से लगातार काम करती रहती है. इससे कृषि उत्पादों की ड्राइंग प्रक्रिया अधिक प्रभावी और निर्बाध हो जाती है.
परियोजना से जुड़े शोधकर्ताओं हिमांशु पचौरी, युगल भइसारे, अमन राजपूत, अभिनव आनंद सिन्हा और राजेश चतुर्वेदी ने बताया कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्यों में किसानों को कई बार टमाटर, प्याज और अन्य शीघ्र खराब होने वाली फसलों का अच्छा दाम नहीं मिल पाता. इस स्मार्ट ड्रायर के माध्यम से इन उत्पादों को सुखाकर टमाटर पाउडर, प्याज पाउडर तथा अन्य वैल्यू एडेड उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं.इससे उत्पाद लंबे समय तक सुरक्षित रहेगा और उसका बाजार मूल्य भी कई गुना बढ़ जाएगा. उदाहरण के तौर पर ताजे टमाटर की तुलना में टमाटर पाउडर की कीमत कई गुना अधिक मिलती है.
इस स्मार्ट हाइब्रिड सोलर ड्रायर की एक और बड़ी विशेषता यह है कि इसे इंटरनेट के माध्यम से कहीं से भी संचालित किया जा सकता है. उपयोगकर्ता को केवल ड्रायर में रखे गए उत्पाद का चयन करना होगा, जिसके बाद मशीन स्वतः निर्धारित तापमान और समय के अनुसार पूरी प्रक्रिया पूरी करेगी. इससे किसानों और उद्यमियों को संचालन में आसानी मिलेगी तथा गुणवत्ता भी बेहतर बनी रहेगी.
इस तकनीक के विकास में संस्थान के बीटेक विद्यार्थियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है.शोध एवं विकास कार्य में छात्रों ने सक्रिय योगदान देकर इसे एक सफल स्वदेशी नवाचार का रूप दिया है. शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण, खाद्य संरक्षण, फूड प्रोसेसिंग उद्योग और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
विशेषज्ञों के अनुसार यदि इस तकनीक का बड़े स्तर पर विस्तार किया जाता है, तो छोटे और सीमांत किसान अपनी उपज को सीधे बेचने के बजाय वैल्यू एडेड उत्पाद तैयार कर अधिक लाभ कमा सकेंगे.इससे फसल खराब होने से होने वाले नुकसान में कमी आएगी, खाद्य अपशिष्ट घटेगा और किसानों को बेहतर बाजार मूल्य मिलने का रास्ता खुलेगा.