
महाराष्ट्र में कई इलाकों में कम बारिश के बीच सूखा घोषित करने की मांग तेज हो गई है. राज्य सरकार ने कहा है कि सूखे की स्थिति का आकलन तीन चरणों में किया जाएगा. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सोमवार को कहा कि किसानों की परेशानी को देखते हुए सूखा राहत से जुड़े उपाय शुरू कर दिए गए हैं. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि सूखा घोषित करना और राहत उपाय लागू करना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं. उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी NDRF के नियमों के तहत सूखे की औपचारिक घोषणा से पहले कुछ जरूरी प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं. राज्य सरकार केंद्र से सहायता मिलने का इंतजार किए बिना प्रभावित किसानों के लिए जरूरी कदम उठाएगी.
CM देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि नियमों के तहत 5 अक्टूबर के बाद फसलों को हुए नुकसान का औपचारिक सर्वे कराया जाएगा. इसके बाद केंद्र सरकार से सहायता मांगी जाएगी. इस प्रक्रिया के आधार पर सूखे की स्थिति को लेकर आगे का फैसला लिया जाएगा.
राहत एवं पुनर्वास मंत्री मकरंद जाधव पाटील ने बताया कि महाराष्ट्र में सूखा घोषित करने की प्रक्रिया में 2017 में बदलाव किया गया था. राजस्व और वन विभाग की ओर से 7 अक्टूबर 2017 को जारी शासनादेश के बाद संशोधित प्रक्रिया खरीफ 2017 से लागू है. खरीफ सीजन के लिए सूखा घोषित करने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर और रबी सीजन के लिए 31 मार्च निर्धारित है.
मंत्री मकरंद जाधव पाटील ने कहा कि सूखे की औपचारिक घोषणा से पहले भी अगर किसी गांव में पेयजल संकट पैदा होता है तो स्थानीय स्तर पर टैंकरों के जरिए पानी उपलब्ध कराया जा सकता है. सरकार की ओर से जरूरत के अनुसार पेयजल व्यवस्था की निगरानी की जा रही है.
संशोधित सूखा प्रबंधन संहिता 2016 के तहत सूखे का आकलन केवल बारिश के आंकड़ों के आधार पर नहीं किया जाता है. इसमें बारिश, वनस्पति सूचकांक, बोया गया क्षेत्र, मिट्टी में नमी और भूजल स्तर जैसे अनिवार्य और संकेतक मानकों को देखा जाता है. इसके अलावा चारे की उपलब्धता, पेयजल संकट, रोजगार की मांग और पलायन जैसे सामाजिक-आर्थिक पहलुओं को भी आकलन में शामिल किया जाता है.
मंत्री ने बताया कि पहले चरण में बारिश से जुड़े अनिवार्य मानकों की जांच की जाती है. दूसरे चरण में अन्य संकेतक मानकों के आधार पर सूखे की गंभीरता का आकलन होता है. तीसरे चरण में प्रभावित इलाकों का मैदानी सर्वे और उपलब्ध आंकड़ों का सत्यापन किया जाता है.
उन्होंने आगे बताया कि महाराष्ट्र में राज्य स्तर पर सूखा निगरानी समिति काम कर रही है, जिसकी अध्यक्षता कृषि आयुक्त करते हैं. जिला और राज्य स्तर पर भी निगरानी समितियां बनाई गई हैं. इन समितियों की रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार सूखा घोषित करने को लेकर फैसला करती है.
मंत्री मकरंद जाधव पाटील ने बताया कि मैदानी सर्वे में किसी गांव में फसल नुकसान 33 फीसदी से अधिक पाए जाने पर वह गांव सूखा घोषित किए जाने के लिए पात्र माना जाता है. सरकार अलग-अलग स्तरों पर स्थिति की निगरानी कर रही है. राहत एवं पुनर्वास मंत्री ने बताया कि कृषि मंत्री विभिन्न राजस्व मंडलों में समीक्षा बैठकें करेंगे और प्रभावित क्षेत्रों का दौरा भी करेंगे. इसके बाद उनकी ओर से सिफारिशें आगामी कैबिनेट बैठक में रखी जाएंगी.
वहीं, ग्रामीण विकास मंत्री जयकुमार गोरे ने सोलापुर की स्थिति को गंभीर बताया है. उनके मुताबिक, जिले में सामान्य से करीब 50 फीसदी कम बारिश हुई है और करीब 80 से 85 फीसदी फसलों को नुकसान पहुंचा है. उन्होंने कहा कि अगर आगे भी बारिश नहीं हुई तो फसल नुकसान का दायरा 100 फीसदी तक पहुंच सकता है.
जयकुमार गोरे ने बताया कि उजनी बांध से पानी के वितरण को लेकर अधिकारियों के साथ बैठक हुई है. इसमें पहले पेयजल की जरूरत पूरी करने और उसके बाद फसलों के लिए पानी उपलब्ध कराने को प्राथमिकता देने का फैसला किया गया. उन्होंने भविष्य की जरूरत को देखते हुए एक साल के लिए पानी सुरक्षित रखने की जरूरत भी बताई.
जयकुमार गोरे ने कहा कि सोलापुर के 68 गांव फिलहाल टैंकरों पर निर्भर हैं. उन्होंने कहा कि सूखे का दौर जारी रहने पर टैंकर से पानी पाने वाले गांवों की संख्या बढ़ सकती है. प्रशासन की ओर से पेयजल, भोजन और पशुओं के लिए पानी की व्यवस्था को लेकर भी तैयारी की जा रही है.
इधर, महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने सूखे से प्रभावित किसानों के लिए 1 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर आर्थिक मदद देने की मांग की है. उन्होंने किसानों के लिए पूर्ण कर्जमाफी की मांग भी उठाई है. सपकाल ने रविवार को बुलढाणा जिले के खेतों का दौरा कर फसलों की स्थिति का जायजा लिया.
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि राज्य के कई हिस्सों में कम बारिश के कारण फसलें सूख रही हैं, लेकिन सरकार बैठकों और चर्चाओं में समय लगा रही है. उन्होंने कहा कि संकट से जूझ रहे किसानों को तत्काल आर्थिक मदद मिलनी चाहिए.
हर्षवर्धन सपकाल ने सरकार की कर्जमाफी योजना पर भी सवाल उठाया. उन्होंने बुलढाणा के एक गांव का उदाहरण देते हुए दावा किया कि पहली सूची में केवल दो किसान और दूसरी सूची में एक किसान शामिल हुआ. इनमें एक किसान को सिर्फ 40 हजार रुपये की राशि मिली. उन्होंने सरकार से किसानों की मौजूदा स्थिति को देखते हुए तत्काल राहत देने की मांग की. (पीटीआई)