पराली को बना दिया सोना! राजेश आर्य बना रहे भूसा, लौटा रहे अतिरिक्त गेहूं, संरक्षित कर रहे पर्यावरण

पराली को बना दिया सोना! राजेश आर्य बना रहे भूसा, लौटा रहे अतिरिक्त गेहूं, संरक्षित कर रहे पर्यावरण

मंदसौर के किसान राजेश आर्य ने 1.50 लाख रुपये के अनुदान से स्ट्रॉ रीपर खरीदकर नरवाई को कमाई का साधन बना दिया है. वे फसल अवशेषों से भूसा तैयार कर किसानों की मदद कर रहे हैं, अतिरिक्त गेहूं लौटाते हैं और नरवाई जलाने की समस्या का पर्यावरण अनुकूल समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं.

धर्मेंद्र सिंह
  • Bhopal ,
  • Jun 08, 2026,
  • Updated Jun 08, 2026, 8:42 AM IST

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के मल्हारगढ़ विकासखंड के ग्राम कनघट्टी के प्रगतिशील किसान राजेश आर्य ने खेती में नवाचार और कृषि यंत्रीकरण का ऐसा मॉडल विकसित किया है, जो किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रहा है.गेहूं कटाई के बाद खेतों में बचने वाली नरवाई, जिसे अधिकांश किसान समस्या मानते हैं, राजेश आर्य ने उसे आय और रोजगार का साधन बना दिया है.

कृषि अभियांत्रिकी विभाग की ई-कृषि यंत्र अनुदान योजना के तहत लगभग 1.50 लाख रुपये का अनुदान प्राप्त कर उन्होंने स्ट्रॉ रीपर कृषि यंत्र खरीदा. इस यंत्र की मदद से वे खेतों में बचे फसल अवशेषों को भूसे में परिवर्तित कर रहे हैं. इससे न केवल उनकी अतिरिक्त आय हो रही है, बल्कि क्षेत्र के किसानों को भी नरवाई प्रबंधन की बड़ी समस्या से राहत मिल रही है.

समस्या से समाधान तक का सफर

गेहूं की कटाई के बाद खेतों में बड़ी मात्रा में नरवाई बच जाती है. समय पर अगली फसल की तैयारी के लिए किसान अक्सर इसे जलाने को मजबूर हो जाते हैं. इससे वायु प्रदूषण बढ़ता है, मिट्टी के उपयोगी सूक्ष्म जीव नष्ट होते हैं और भूमि की उर्वरता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.

राजेश आर्य ने इस समस्या का समाधान स्ट्रॉ रीपर के माध्यम से खोजा. अब वे खेतों में बची नरवाई को एकत्र कर उसे भूसे में बदल रहे हैं.इससे खेत आसानी से साफ हो जाते हैं और किसानों को नरवाई जलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती.

किसानों के लिए शुरू की अनूठी पहल

राजेश आर्य अपने गांव कनघट्टी और आसपास के क्षेत्रों के किसानों के खेतों में हार्वेस्टर से कटाई के बाद बचे फसल अवशेषों को साफ करने का कार्य करते हैं. स्ट्रॉ रीपर मशीन नरवाई को काटकर और एकत्रित कर उसे भूसे के रूप में तैयार करती है.

इस पहल की सबसे खास बात यह है कि एक ट्रॉली भूसा तैयार करने के दौरान लगभग 10 से 15 किलोग्राम गेहूं भी एकत्रित हो जाता है. राजेश आर्य यह गेहूं संबंधित किसान को वापस लौटा देते हैं, जिससे किसानों को अतिरिक्त लाभ मिलता है और उनके प्रति विश्वास भी बढ़ा है.

किसानों को मिल रहे कई लाभ

राजेश आर्य के इस मॉडल से क्षेत्र के किसानों को अनेक फायदे मिल रहे हैं—

  • खेतों से फसल अवशेष हटाने की समस्या का समाधान
  • भूसा तैयार होने से पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता
  • भूसा बेचकर अतिरिक्त आय अर्जित करने का अवसर
  • भूसा तैयार करने के दौरान बचे गेहूं की पुनः प्राप्ति
  • नरवाई जलाने की आवश्यकता समाप्त
  • मिट्टी की उर्वरता और मृदा स्वास्थ्य में सुधार
  • वायु प्रदूषण और पर्यावरणीय नुकसान में कमी.

 

गौशालाओं और पशुपालकों को मिल रहा चारा

स्ट्रॉ रीपर से तैयार किया गया भूसा स्थानीय गौशालाओं और पशुपालकों तक पहुंच रहा है.इससे पशुपालकों को गुणवत्तापूर्ण चारा उपलब्ध हो रहा है, जबकि भूसे की बिक्री से राजेश आर्य को अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है.यह मॉडल कृषि और पशुपालन दोनों क्षेत्रों के लिए लाभकारी साबित हो रहा है.एक ओर किसानों के खेत साफ हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पशुपालकों की चारे की आवश्यकता भी पूरी हो रही है.

कृषि यंत्रीकरण का सफल उदाहरण

राजेश आर्य की सफलता यह दर्शाती है कि आधुनिक कृषि यंत्रों और सरकारी योजनाओं का सही उपयोग खेती को अधिक लाभकारी बना सकता है.कृषि यंत्रीकरण से जहां श्रम और लागत में कमी आती है, वहीं पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है.

उनकी पहल यह साबित करती है कि यदि किसान नई तकनीकों को अपनाएं और सरकारी योजनाओं का लाभ लें, तो खेती में अतिरिक्त आय के नए स्रोत विकसित किए जा सकते हैं.

अन्य किसानों के लिए प्रेरणा

राजेश आर्य की कहानी केवल एक किसान की सफलता नहीं, बल्कि "समस्या से समाधान" की ऐसी मिसाल है जो पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा बन सकती है. जहां अधिकांश किसान नरवाई को बोझ समझते हैं, वहीं उन्होंने उसे कमाई और पर्यावरण संरक्षण के अवसर में बदल दिया है.उनका यह मॉडल बताता है कि खेती में नवाचार, आधुनिक तकनीक और सकारात्मक सोच के माध्यम से न केवल आय बढ़ाई जा सकती है, बल्कि खेती को टिकाऊ और पर्यावरण हितैषी भी बनाया जा सकता है.

 

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