
फलदार फसलों और सब्जियों को फल मक्खी से भारी नुकसान होता है. फल मक्खी अमरूद, किन्नू, नाशपाती, आड़ू, आलूबुखारा और आम में 70 प्रतिशत तक नुकसान कर सकती है. सब्जी वर्गीय फसलों घीया, तोरी, खीरा, करेला, तरबूज, खरबूजा और कद्दू वर्गीय सब्जियों में भी बहुत नुकसान पहुंचाती है. बारिश के सीजन में इसका प्रकोप और अधिक बढ़ जाता है, इसलिए किसानों को समय रहते इससे बचाव और छुटकारा के उपाय अपनाने चाहिए.
हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने फल मक्खी से फसलों और फलों को बचाने के लिए एक ट्रैप बनाया है जिसे फ्रूट फ्लाई ट्रैप नाम दिया गया है. इसके बारे में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो बलदेव राज काम्बोज ने बताया कि कीट विज्ञान विभाग द्वारा फल मक्खी ट्रैप (फ्रूट फ्लाई ट्रैप) बनाया गया है जो इस कीट से बचाव में प्रभावी है.
फल मक्खी की मादा मक्खी फलों की ऊपरी सतह के नीचे अंडे देती है और अंडे देने वाली जगह पर गहरे रंग के दबे हुए धब्बे फल की सतह पर दिखाई देते हैं. अंडों से कुछ दिनों के बाद चावल के दाने जैसे आकार वाले सफेद रंग के कीड़े पनपते हैं जोकि फल को गला देते हैं. इस कीट की मादा फलों को ऊपरी सतह के नीचे अंडे देती है और शिशु फल के अंदर रहकर फल को खाते हैं, इसलिए फल मक्खी के नियंत्रण में कीटनाशकों की भूमिका कम असरदार होती है.
फल मक्खियां फलों और सब्जियों पर अलग-अलग तरह से अटैक करती हैं. मादा मक्खी अपने अंडे देने के लिए 'ओविपॉजिटर' नाम की एक नुकीली नली से फल की त्वचा में छेद करती है. मैगट (लार्वा) के चरण में अंडों से छोटे सफेद कीड़े निकलते हैं जिन्हें 'मैगट' कहा जाता है. ये कीड़े कई दिनों तक फल के गूदे में सुरंग बनाते हुए उसे खाते हैं और बढ़ते हैं. प्यूपा के चरण में पूरी तरह से बड़े होने के बाद, मैगट फल छोड़कर मिट्टी या जमीन पर पड़ी चीजों में मक्खी बनने के लिए चले जाते हैं.
फल मक्खी 200 से 400 तरह की फसलों को निशाना बनाती हैं, जिनमें आम फलों से लेकर बगीचे की सब्जियां तक शामिल हैं- फल: सेब, आम, केले, खट्टे फल (जैसे संतरा, नींबू), आड़ू और अमरूद इनके मुख्य निशाने होते हैं. इन्हें खास तौर पर नाइटशेड (टमाटर, मिर्च) और कुकुरबिट्स (खीरा, कद्दू, स्क्वैश, खरबूजा/तरबूज) बहुत पसंद होते हैं. हालांकि वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर इसके प्रकोप को काफी कम किया जा सकता है. एकीकृत प्रबंधन अपनाने से केमिकल पर निर्भरता कम रहती है जिससे फसलों में रसायनों का अंश नहीं आता और फलों और सब्जियों की क्वालिटी अच्छी रहती है.
HAU की ओर से जारी सलाह में किसानों से कहा गया कि फल मक्खी से प्रभावित फलों को हर दिन या एक दिन छोडक़र एकत्रित कर दो फीट गहरे गड्ढे में दबा दें. गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करने से कीट की प्यूपा अवस्था नष्ट होती है और अगले मौसम में इसका प्रकोप कम होता है. उन्होंने बताया कि फल मक्खी के नियंत्रण के लिए विश्वविद्यालय में बनाया गया फ्रूट फ्लाई ट्रैप प्रभावी तकनीक है. इसे संबंधित फसल में फल बनने की अवस्था से पहले खेत में लगाया जा सकता है. ट्रैप को पेड़ की ऐसी शाखा पर लगाना चाहिए, जहां सीधी धूप कम पड़ती हो. इससे नर फल मक्खियां ट्रैप में फंसकर नष्ट हो जाती हैं और उनकी प्रजनन क्षमता घटने से कीट की संख्या नियंत्रित रहती है.
कीट विज्ञान विभाग की अध्यक्षा डॉ. सुनीता यादव ने बताया कि इस ट्रैप की कीमत 130 रुपये प्रति ट्रैप है. विभाग की ओर से किसानों को प्रति एकड़ 12 से 14 ट्रैप प्रति एकड़ लगाने की सिफारिश की गई है. ट्रैप में मौजूद सैप्टा का असर लगभग 30 दिन तक प्रभावी रहता है. इसलिए 30 से 35 दिनों के बाद इसे दोबारा चार्ज करना जरूरी है. किसानों के लिए फल मक्खी ट्रैप, कीट विज्ञान विभाग, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार में उपलब्ध है. अधिक जानकारी के लिए 1800-180-3001 (टोल फ्री), 01662-255289 और 9729300525 पर संपर्क करें.