
हम और आप अक्सर प्लास्टिक की बहुत सारी चीजों का इस्तेमाल करते हैं. इस्तेमाल के बाद उसे वेस्ट मेटेरियल समझ कर कूड़ेदान में फेंक देते हैं. मगर, अब वही वेस्ट मेटेरियल यानी कचरा भविष्य का संसाधन बन रहा है. ये न केवल हमारे बेहतर पर्यावरण का भविष्य है बल्कि नई पीढ़ी के उद्यमियों के लिए भविष्य संवारने का संसाधन भी. बिहार के बक्सर जिले के इंजीनियर संजीत राय ने इसी सोच को हकीकत में बदला है.
संजीत IIT चेन्नई से मैकेनिकल इंजीनियर हैं. उन्होंने सिंगल यूज प्लास्टिक को ऐसे तैयार किया कि उसके स्लैब बनाए जा सकें. ये स्लैब लकड़ी के बेहतर विकल्प हैं जिनका उपयोग बेंच, डेस्क, अलमारी और दूसरे फर्नीचर बनाने में किया सकता है.
संजीत का यह प्रयोग सिर्फ प्लास्टिक कचरे के निपटारे तक सीमित नहीं है. इसके जरिए एक तरफ सिंगल यूज प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण को कम करने की दिशा में बढ़ा कदम है, तो दूसरी तरफ पारंपरिक लकड़ी के विकल्प भी. यह मॉडल कचरा कम करने के साथ पेड़ों पर निर्भरता भी कम करेगा और रोजगार के नए अवसर भी पैदा करने को तैयार है जो पर्यावरण के संरक्षण में भी सहायक होगा.
संजीत कहते हैं कि प्लास्टिक को केवल कचरा मानकर फेंक देना समस्या का समाधान नहीं है. उसे जमीन में गाड़ देना या जला देना भी विकल्प नहीं है. जरूरत इस बात की है कि इसे संसाधन के रूप में तैयार किया जाए. वो कहते हैं, तकनीक के जरिए इस कचरे का दोबारा उपयोग संभव है. संजीत के मुताबिक, इस पहल का उद्देश्य सिंगल यूज प्लास्टिक कचरे से निजात दिलाने के साथ पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना और लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना है.
संजीत के इस मॉडल से प्लास्टिक कचरे से उपयोगी स्लैब तैयार किए जा रहे हैं. इन स्लैब का इस्तेमाल पार्कों में बेंच लगाने, स्कूलों में डेस्क, अलमारी के साथ कई प्रकार के फर्नीचर बनाने में किया जा सकता है. संजीत का मानना है कि यह प्रयोग ‘कचरे से उपयोगी उत्पाद’ की सोच को जमीन पर उतारता है. जिस सिंगल यूज प्लास्टिक के कारण शहरों और गांवों में कचरा प्रबंधन बड़ी चुनौती बनता है, उसी प्लास्टिक को उपयोगी सामग्री में बदला जा सकता है.
इस मॉडल की शुरुआत 2022 में जिला जल एवं स्वच्छता समिति और राय इंडस्ट्रीज के सहयोग से हुई. इसके तहत प्लास्टिक कचरे को संसाधन के रूप में इस्तेमाल करते हुए विभिन्न उपयोगी उत्पाद तैयार करने की दिशा में काम किया गया. धीरे-धीरे इस मॉडल की चर्चा दूसरे जिलों तक पहुंचने लगी. अब इसका इस्तेमाल स्थानीय स्तर पर प्लास्टिक कचरे के बेहतर प्रबंधन रूप में किया जा रहा है.
संजीत बताते हैं कि इस प्रयोग को उस समय बड़ी पहचान मिली, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ के 136वें एपिसोड में प्लास्टिक कचरे से उपयोगी उत्पाद तैयार करने के इस मॉडल का जिक्र किया. इसके बाद इस प्रयोग को बिहार के एक स्थानीय र्स्टाटअप से आगे बढ़कर व्यापक स्तर पर चर्चा मिलने लगी. संजीत का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी के उल्लेख ने इस पहल को नई पहचान दी.
संजीत का कहना है कि उनका उद्देश्य सिर्फ प्लास्टिक कचरे का समाधान तलाशना नहीं है. इस पूरी प्रक्रिया में स्थानीय स्तर पर कामगारों के लिए रोजगार के अवसर को भी तैयार करना है. ताकि स्थानीय स्तर पर प्लास्टिक कचरे का संग्रह किया जा सके, उसकी प्रोसेसिंग हो और उससे तैयार उत्पादों के निर्माण की पूरी प्रक्रिया भी स्थानीय स्तर ही पूरी की जाएं.
ये मॉडल गांव और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी देगा. यही वजह है कि इस मॉडल को पर्यावरण संरक्षण, कचरा प्रबंधन और स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार तीनों को जोड़ने की कड़ी के रूप में विकसित किया जा सकता है.
संजीत बताते हैं कि बिहार में नवाचार और उद्यमिता के जरिए युवा अपनी पहचान बना रहे हैं. उनका यह प्रयोग इसी बदलती तस्वीर का एक उदाहरण है. वो कहते हैं कि बक्सर से शुरू हुई इस पहल का दायरा बढ़ रहा है. सीतामढ़ी जिला प्रशासन और राय इंडस्ट्रीज के बीच एमओयू की प्रक्रिया चल रही है. जिला प्रशासन की ओर से भी सिंगल यूज प्लास्टिक से उत्पाद तैयार करने की तैयारी है.