
पहाड़ी राज्यों में गेहूं की उत्पादकता बढ़ाने और किसानों को बेहतर उत्पादन दिलाने के लिए आईसीएआर-वीवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (VPKAS), अल्मोड़ा ने गेहूं की कई उन्नत किस्मों को अपनाने की सलाह दी है. संस्थान के अनुसार VL-953, VL-967, VL-2015 और VL-2028 किस्में उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जैविक और असिंचित खेती के लिए उपयुक्त हैं.
इन किस्मों की खास बात यह है कि इनमें पीला और भूरा रतुआ रोग के प्रति उच्च प्रतिरोध क्षमता पाई जाती है. साथ ही अच्छी क्वालिटी वाले दाने, बेहतर प्रोटीन मात्रा और संतोषजनक उपज किसानों को अधिक लाभ दिला सकती है.
VL-953 उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सिंचित और असिंचित दोनों परिस्थितियों में उपयुक्त मानी जाती है. इसके पौधों की ऊंचाई 85-90 सेंटीमीटर तक होती है और फसल 160-170 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी औसत उपज 30-33 क्विंटल प्रति हेक्टेयर जबकि मैदानी क्षेत्रों में 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है.
VL-967 के दाने शरबती रंग के, मध्यम मोटे और अंडाकार होते हैं. इसकी प्रोटीन मात्रा 9.78 से 10.07 प्रतिशत तक दर्ज की गई है. पौधों की ऊंचाई 75-78 सेंटीमीटर रहती है और यह किस्म 160-170 दिनों में तैयार हो जाती है. इसकी औसत पैदावार 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.
VL-2015 के दाने सुनहरे हल्के पीले रंग के होते हैं. इस किस्म में प्रोटीन की मात्रा 10.7 से 11.2 प्रतिशत तक पाई जाती है. पौधों की ऊंचाई 75-80 सेंटीमीटर और पकने की अवधि 165-170 दिन है. इसकी औसत उपज 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मिल सकती है. यह किस्म पीले और भूरे रतुआ रोग के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी है.
VL-2028 को विशेष रूप से जैविक असिंचित खेती के लिए उपयुक्त माना गया है. इसकी प्रोटीन मात्रा 10.34 से 12.32 प्रतिशत तक रहती है. पौधों की ऊंचाई 75-80 सेंटीमीटर और परिपक्वता अवधि 168-174 दिन है. औसतन 22-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देने वाली यह किस्म भी पीले और भूरे रतुआ रोग के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी है.
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि रबी सीजन में पर्वतीय क्षेत्रों के किसान यदि अपने क्षेत्र और खेती की परिस्थितियों के अनुसार इन उन्नत किस्मों का चयन करें, तो न केवल उत्पादन बढ़ा सकते हैं बल्कि रोगों से होने वाले नुकसान को भी कम कर सकते हैं. बीज और तकनीकी जानकारी के लिए किसान विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा से संपर्क कर सकते हैं.