
रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय की सीड हब-दलहन परियोजना के अंतर्गत जालौन जिले के ग्राम हरदुआ में कृषक सहभागिता मॉडल पर ग्रीष्मकालीन मूंग बीज उत्पादन का सफल मॉडल विकसित किया जा रहा है. विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक मार्गदर्शन में किसान बड़े पैमाने पर उन्नत एवं रोग प्रतिरोधी मूंग की खेती कर बेहतर उत्पादन और लाभ प्राप्त कर रहे हैं.
किसानों ने बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा उपलब्ध कराई गई मूंग की उन्नत एवं MYMV रोग प्रतिरोधी प्रजाति ‘विराट’ (IPM-205-7) किसानों के लिए बेहद लाभकारी साबित हो रही है. यह किस्म मात्र 55 से 60 दिनों में तैयार हो जाती है और औसतन 12 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दे रही है. कुछ किसानों ने 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया है.
मूंग की इस किस्म को उगाने वाले किसानों के अनुसार इस वर्ष फसल में तीन सिंचाई और तीन बार कीटनाशकों का प्रयोग किया गया. लगभग 25 से 30 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की लागत में किसानों को करीब 1 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है. यही कारण है कि ग्रीष्मकालीन मूंग किसानों के लिए फायदे का सौदा बनती जा रही है.
किसानों ने बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा पिछले 3-4 वर्षों से गुणवत्तायुक्त बीज उपलब्ध कराए जाने के कारण जिले में बड़े पैमाने पर मूंग की खेती शुरू हुई है. अब अधिकतर किसान विश्वविद्यालय से बीज प्राप्त कर आधुनिक तकनीक के साथ खेती कर रहे हैं, जिससे उत्पादन और आय दोनों में बढ़ोतरी हो रही है.
विशेषज्ञों का मानना है कि कम अवधि, कम लागत और अधिक लाभ के कारण ग्रीष्मकालीन मूंग किसानों की आय बढ़ाने वाली प्रमुख फसल बनती जा रही है। विश्वविद्यालय के तकनीकी सहयोग और गुणवत्तायुक्त बीज उपलब्धता के चलते जालौन क्षेत्र में विकसित यह मॉडल अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन रहा है।
विश्वविद्यालय द्वारा इस क्षेत्र में 5 हेक्टेयर में कृषक भागीदारी मॉडल पर ग्रीष्मकालीन मूंग बीज उत्पादन कराया जा रहा है. वहीं पूरे जालौन जिले में लगभग 10 हेक्टेयर क्षेत्र में मूंग बीज उत्पादन का कार्य किया जा रहा है.विश्वविद्यालय ने इस वर्ष यहां से 150 क्विंटल गुणवत्तायुक्त बीज उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया है.
इसी क्रम में विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अशोक कुमार सिंह ने निदेशक शोध डॉ. S.K. चतुर्वेदी एवं कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. आर.के. सिंह के साथ खेतों का भ्रमण कर किसानों से संवाद किया और फसल की स्थिति का जायजा लिया. इस दौरान किसानों ने विश्वविद्यालय द्वारा दिए जा रहे तकनीकी मार्गदर्शन की सराहना की.