
उत्तर प्रदेश की मिट्टी में जैविक कार्बन की लगातार घटती मात्रा को लेकर राज्यसभा सांसद बृजलाल ने केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखा है. सांसद ने मिट्टी की बिगड़ती सेहत पर चिंता जताते हुए किसानों को हरी खाद अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने और सनई और ढैंचा के बीज समय पर उपलब्ध कराने की मांग की है.
11 अगस्त 2026 को लिखे गए पत्र में बृजलाल ने कहा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से धान और गेहूं की खेती की जाती है. इन फसलों में यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों का अधिक उपयोग होता है. इसके अलावा फसल अवशेष जलाने और गोबर खाद के कम इस्तेमाल के कारण मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो रही है.
सांसद ने पत्र में जिक्र किया कि सिद्धार्थनगर, बस्ती और संत कबीर नगर जैसे जिलों की मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा सामान्य रूप से 0.02 प्रतिशत से 0.40 प्रतिशत के बीच पाई जा रही है. उन्होंने कहा कि भारतीय मृदा मानकों के अनुसार यह स्तर कम माना जाता है, जबकि मिट्टी में जैविक कार्बन 0.5 प्रतिशत से कम नहीं होना चाहिए.
बृजलाल ने यह भी कहा कि इन क्षेत्रों की मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस, जिंक, सल्फर और आयरन जैसे पोषक तत्वों की भी कमी देखी जा रही है. ऐसे में किसानों को रबी फसल की कटाई के बाद सनई और ढैंचा जैसी फसलों की बुआई कर हरी खाद तैयार करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए.
उन्होंने बताया कि पहले ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन अधिक होने से गोबर खाद की उपलब्धता बनी रहती थी, लेकिन अब पशुपालन में कमी आने से खेतों में जैविक खाद का उपयोग भी घट गया है. इससे मिट्टी की क्वालिटी पर असर पड़ रहा है.
सांसद ने कृषि मंत्री से अनुरोध किया है कि उत्तर प्रदेश, विशेषकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में किसानों को मार्च महीने से ही सनई और ढैंचा के बीज उपलब्ध कराए जाएं. उनका कहना है कि इससे किसान समय पर हरी खाद की खेती कर सकेंगे, जिससे मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ेगी और खेती अधिक टिकाऊ बन सकेगी.
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जैविक कार्बन मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, जल धारण क्षमता बढ़ाने और फसल उत्पादन में सुधार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. ऐसे में इस मुद्दे पर उठाई गई पहल किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए अहम मानी जा रही है.
लगातार गेहूं-धान उगाने और केमिकल खाद के इस्तेमाल से हमारी मिट्टी बीमार हो रही है, जिससे खेती की लागत बढ़ रही है और मुनाफा घट रहा है. इसका सबसे सस्ता और सटीक समाधान 'ढैंचा' यानी हरी खाद है. ढैंचा कम पानी और खराब जमीन में भी आसानी से उग जाता है और मिट्टी को नाइट्रोजन व जरूरी पोषक तत्व देता है. इसे फूल आने से पहले खेत में जोतने से जमीन को 'ह्यूमस' मिलता है और मिट्टी फिर से उपजाऊ बन जाती है. कुल मिलाकर, ढैंचा अपनाकर किसान महंगी खाद का खर्चा बचा सकते हैं और अपनी जमीन की सेहत सुधार सकते हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार ढैंचा लगाने का सबसे सही समय अप्रैल से लेकर जुलाई तक का होता है. एक एकड़ खेत के लिए आपको करीब 20 से 25 किलो बीज की जरूरत पड़ती है. बुवाई से पहले खेत की हल्की जुताई कर लें और ध्यान रहे कि जमीन में थोड़ी नमी हो. बीज को जल्दी और अच्छा उगाने के लिए आप इसे एक रात पहले पानी में भिगोकर रख सकते हैं. इसे आप खेत में छिड़ककर बो सकते हैं. सबसे अच्छी बात यह है कि ढैंचा उगाने के लिए आपको यूरिया या किसी और खाद की जरूरत नहीं पड़ती, बस थोड़ा सा फास्फोरस डाल देने से फसल बहुत अच्छी और घनी तैयार हो जाती है.