'CR धान 501' से बढ़ेगी पैदावार, बाढ़ प्रभावित इलाकों के लिए नई हाई-यील्ड किस्म जारी

'CR धान 501' से बढ़ेगी पैदावार, बाढ़ प्रभावित इलाकों के लिए नई हाई-यील्ड किस्म जारी

कटक स्थित सीआरआरआई ने जल-जमाव और कम गहरे पानी वाले क्षेत्रों के लिए उच्च उपज देने वाली धान की नई किस्म 'सीआर धान 501' जारी की है. वहीं पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड में धान की फसल में SRBSDV (बौना वायरस) की पहचान होने के बाद वैज्ञानिकों ने किसानों के लिए बचाव और प्रबंधन संबंधी सलाह भी जारी की है.

CR Dhan 501 CRRI CuttackCR Dhan 501 CRRI Cuttack
क‍िसान तक
  • New Delhi,
  • Aug 17, 2026,
  • Updated Aug 17, 2026, 2:05 PM IST

सेंट्रल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRRI), कटक ने मध्यम या कम गहरे पानी वाले इलाकों के लिए अधिक पैदावार देने वाली धान की एक किस्म तैयार की है. 'CR धान 501' नाम की इस किस्म को सेंट्रल वैरायटीज रिलीज कमेटी ने असम और उत्तर प्रदेश के लिए जारी किया है. सिर्फ 155 दिन की अवधि वाली इस किस्म की औसत पैदावार 4.0 टन प्रति हेक्टेयर होने का अनुमान है. CRRI ने ओडिशा में खेती के लिए इसी तरह के माहौल के हिसाब से 11 और किस्में जारी की हैं, जिनकी पैदावार क्षमता 3.0 से 4.5 टन प्रति हेक्टेयर के बीच है. इनमें से 2005 में जारी 'वर्षाधान' एक लोकप्रिय किस्म है, जिसकी पैदावार क्षमता 4.0 टन प्रति हेक्टेयर है. CRRI ने देश के अलग-अलग हिस्सों में मध्यम या कम गहरे पानी वाले इलाकों के लिए धान की उपयुक्त किस्मों की पहचान भी की है.

हमारे देश में धान की खेती वाले लगभग 30 लाख (3.0 मिलियन) हेक्टेयर इलाके में जल-जमाव की समस्या है, जो अधिकतर तटीय इलाकों में है. अचानक बाढ़ और जल-जमाव की वजह से बार-बार पानी में डूबने का खतरा रहता है, जिससे बेहतर प्रबंधन के बावजूद इकोसिस्टम पर अच्छा असर नहीं पड़ता. इन इलाकों में फसल उगाने के मौसम के दौरान काफी समय तक 25-30 सेमी की गहराई तक पानी जमा रहता है.

जल जमाव से फसल में बीमारियों का खतरा

फसल बढ़ने के शुरुआती दौर में जल-जमाव से कल्ले (tillers) कम निकलते हैं और पौधों के मरने की संभावना बढ़ जाती है. जल-जमाव वाले इलाकों में पानी की निकासी ठीक न होने से जहरीले पदार्थ (जैसे आयरन टॉक्सिसिटी, सल्फाइड इंजरी आदि) जमा हो जाते हैं और कीटों और बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

CRRI, कटक के डायरेक्टर डॉ. टी.के. आध्या ने कहा, "चूंकि जल-जमाव वाली स्थितियों में फसल का प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है, इसलिए धान के उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाने का एकमात्र विकल्प किस्मों में सुधार करना ही है." इस तरह के माहौल में पानी जमा होने की समस्या से निपटने के लिए किस्मों में कुछ खास गुण होने चाहिए, जैसे 115-130 सेमी की ऊंचाई, मजबूत तना (culm), सीधी पत्तियां, पौधे की शुरुआती अवस्था में सूखे को सहने की क्षमता, कम लंबाई बढ़ने के साथ पानी में डूबने को सहने की क्षमता (बिना तना लंबा हुए) और मजबूत बीज डोरमेंसी (seed dormancy). 

उन्होंने आगे कहा, "इसलिए, कम खाद वाले लेकिन अधिक क्षमता वाले इन इलाकों से ज्यादा उत्पादकता हासिल करना देश की, खासकर पूर्वी क्षेत्र की, तत्काल जरूरत है." 

धान में बौना वायरस ने बढ़ाई किसानों की परेशानी

पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड में वैज्ञानिक अध्ययनों में जांचे गए सैंपल में 'सदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस' (SRBSDV) की पहचान हुई है. इससे धान की रुकी हुई बढ़त और SRBSDV के बीच संबंध का शुरुआती संकेत मिला. हालांकि, खेत में इसके फैलने की पुष्टि के लिए नियंत्रित स्थितियों में SRBSDV के वाहक के तौर पर 'व्हाइट बैक्ड प्लांटहॉपर' (WBPH) की भूमिका की जांच की जा रही है.

बचाव के लिए कृषि सलाह जारी

  • खेत की मेड़ों को साफ रखें और खेत के आस-पास खरपतवार हटा दें.
  • शुरुआती दौर में, संक्रमित पौधों की सही पहचान करें और उन्हें हटा दें.
  • अगर संक्रमण की दर 5-20% के बीच है, तो बीमार टिलर्स (कल्ले) को हटाकर उनकी जगह स्वस्थ टिलर्स लगा दें.
  • किसानों को धान की फसल में 'व्हाइट बैक्ड प्लांटहॉपर' (WBPH) की मौजूदगी पर लगातार नजर रखनी चाहिए. खेत में कुछ पौधों को थोड़ा झुकाकर और उनके निचले हिस्से पर हर हफ्ते 2-3 बार थपथपाकर देखें. अगर WBPH के निम्फ (बच्चे) या वयस्क मौजूद होंगे, तो वे पानी पर तैरते हुए दिख सकते हैं.
  • WBPH दिखने पर, इनमें से किसी एक का छिड़काव करें- Pexalon 10 SC (ट्राइफ्लुमेजोपाइरिम) @ 235 मिली/हेक्टेयर या Osheen/Token 20 SG (डिनोटेफुरन) @ 200 ग्राम/हेक्टेयर या Chess 50 WG (पाइमेट्रोज़िन) @ 300 ग्राम/हेक्टेयर. बेहतर नतीजों के लिए छिड़काव पौधों के निचले हिस्से की तरफ करें.

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