Maize farming : मक्के का बढ़ता रूतबा, एक दशक में जीता किसानों का विश्वास

Maize farming : मक्के का बढ़ता रूतबा, एक दशक में जीता किसानों का विश्वास

बदलते मौसम और कम पानी की टेंशन के बीच मक्का आज हमारे किसानों के लिए सबसे बड़ा सहारा बनकर उभरा है. पिछले एक दशक में मक्के की पैदावार दोगुनी से भी ज्यादा हो चुकी है, जिसने पारंपरिक धान-गेहूं के चक्र से इतर किसानों को एक बंपर कमाई का पक्का विकल्प दिया है.कम लागत और हर सीजन में शानदार मुनाफे की वजह से यह फसल आज पोल्ट्री फीड से लेकर एथेनॉल बनाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियों की पहली पसंद बन चुकी है. मुश्किल हालात में पैदावार औऱ मांग की गारंटी देकर मक्के ने आज देश के किसानों की तकदीर और उनका भरोसा दोनों बदल दिया है

मक्के पर किसानों का बढ़ा भरोसामक्के पर किसानों का बढ़ा भरोसा
जेपी स‍िंह
  • नई दिल्ली,
  • Jul 03, 2026,
  • Updated Jul 03, 2026, 12:28 PM IST

भारत में खेती-किसानी का नज़ारा बहुत तेज़ी से बदल रहा है. सालों से हमारे देश में धान और गेहूं को ही सबसे मुख्य फसल माना जाता रहा है, लेकिनअब मक्का एक कामयाबी की नई कहानी लिख रहा है. आज मक्का सिर्फ इंसानों के खाने या पॉपकॉर्न तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की औद्योगिक तरक्की, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और देश के किसानों की 'माली हालत' को दुरुस्त करने का सबसे भरोसेमंद और पक्का जरिया बन चुका है.

अंतरराष्ट्रीय बाजार  लगातार होते उतार-चढ़ाव और घरेलू स्तर पर बढ़ती हुई चौतरफा औद्योगिक मांग के बीच भारतीय कृषि के समूचे परिदृश्य में मक्के की हैसियत, साख और रूतबा आने वाले सालों में और भी ज्यादा मजबूत होने वाला है, जो इस बात का साफ संकेत है कि भारतीय खेती अब सिर्फ पेट भरने के पारंपरिक ढर्रे से बाहर निकलकर एक बेहद मुनाफेदार व्यापारिक मॉडल की तरफ मजबूती से कदम बढ़ा चुकी है.

धान-गेहूं से आगे निकला मक्का

अगर हम आंकड़ों और ग्रोथ रेट पर नज़र डालें, तो मक्के की तरक्की सचमुच हैरान करने वाली है. साल 2016-17 के मुकाबले 2025-26 में जहां चावल  का कुल उत्पादन 38 फीसदी की बढ़त के साथ 154.02 मिलियन टन पर पहुंच गया, वहीं गेहूं ने भी 22 प्रतिशत से अधिक की शानदार ग्रोथ दर्ज की और इसका उत्पादन 120.66 मिलियन टन अनुमानित है.धान और गेहूं की यह वृद्धि देश की खाद्य सुरक्षा के लिए बेहतरीन है, लेकिन इन दोनों के मुकाबले मक्के का प्रदर्शन सबसे चौंकाने वाला रहा है.मक्के का उत्पादन 25.90 मिलियन टन से दोगुने से भी ज्यादा बढ़कर 55.09 मिलियन टन के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है.यानी पिछले एक दशक में मक्के में 112 प्रतिशत से ज्यादा का जबरदस्त ग्रोथ हुआ है,जो धान 38% और गेहूं 22% की रफ्तार से कहीं ज्यादा तेज है. .

बदलते मौसम और कम बारिश का तोड़

मक्के की खेती की एक और बड़ी खूबी यह है कि अब यह सिर्फ किसी एक मौसम की मोहताज नहीं रह गई है. जहां धान का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा आज भी खरीफ  के सीजन पर निर्भर करता है, वहीं मक्का हर मौसम में कामयाब हो रहा है. हालांकि हमारे यहां खरीफ सीजन में मक्के का सबसे ज्यादा उत्पादन 30.51 मिलियन टन होता है, लेकिन अब सर्दियों और गर्मी के मौसम में भी इसकी खेती का दायरा बहुत तेजी से फैल रहा है.रबी सीजन में ही मक्के की पैदावार बढ़कर 20.03 मिलियन टन तक पहुंच गई है. सिंचाई के बेहतर इंतजामों और नई तकनीकों की बदौलत किसान अब सालभर इसकी खेती कर पा रहे हैं. इससे न केवल किसानों की  की कमाई में सुधार हो रहा है, बल्कि देश के बड़े उद्योगों को भी सालभर कच्चे माल की सप्लाई का पूरा भरोसा मिल रहा है.

धान-गेहूं के मुकाबले क्यों बेहतर है मक्का?

आज के बदलते हालात में,जब क्लाइमेट चेंज ,कम बारिश और मौसम के उतार-चढ़ाव ने खेती को संकट में डाल दिया है, मक्के की खेती धान और गेहूं के मुकाबले एक वरदान साबित हो रही है. धान उगाने के लिए बेतहाशा पानी की जरूरत होती है और सूखे की स्थिति में यह फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाती है, वहीं गेहूं भी मार्च-अप्रैल में अचानक बढ़ने वाली असमय गर्मीको बर्दाश्त नहीं कर पाता और इसका उत्पादन गिर जाता है.

इन दोनों के मुकाबले मक्का एक बेहद सख्त फसल है. यह कम पानी और सूखे जैसी कठिन परिस्थितियों को भी आसानी से झेल लेती है. कम बारिश में भी मक्के की फसल किसानों को निराश नहीं करती, जिससे मौसम की बेरुखी और कुदरती मार के बीच किसानों का जोखिम  बेहद कम हो जाता है. यही वजह है कि आज के बदलते पर्यावरण में मक्का सबसे सुरक्षित विकल्प बनकर उभरा है.

विदेशी बाजारों में मक्का की बढ़ी साख

भारत के मक्के की सबसे बड़ी और अनोखी खासियत यह है कि हमारे देश में पूरी तरह से 'नॉन-जीएमओ' क्का उगाया जाता है. जहाँ दुनिया के बड़े उत्पादक देश जैसे अमेरिका और ब्राजील ज्यादातर जीएमओ मक्के की खेती करते हैं,वहीं भारत ने खुद को एक बिल्कुल अलग और प्रीमियम मार्केट सेगमेंट में स्थापित किया है.भारत अपने मक्के का तकरीबन 90% हिस्सा अपने पड़ोसी देशों जैसे नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका और वियतनाम को एक्सपोर्ट करता है.इन बाजारों में हमारे गैर-जीएमओ मक्के की बहुत भारी मांग है, जिसकी वजह से भारतीय मक्के को दुनिया के दूसरे बड़े देशों से सीधा मुकाबला नहीं करना पड़ता और इसे आसानी से अच्छे खरीदार मिल जाते हैं.

मक्के का सुनहरा भविष्य

आने वाले वक्त में मक्के की मांग और इसके सुनहरे भविष्य की सबसे बड़ी वजह देश का बायोफ्यूल प्रोग्राम और पोल्ट्री सेक्टर है. भारत सरकार पेट्रोल में मिलाने के लिए इथेनॉल बनाने पर बहुत ज्यादा जोर दे रही है. इस साल कंपनियों ने जरूरत से 69% ज्यादा इथेनॉल देने का ऑफर दिया है, जिसमें मक्के का बहुत बड़ा रोल है. इसके साथ ही स्टार्च और पशु आहार मुर्गियों का दाना बनाने वाले उद्योगों में भी इसकी मांग दिन-ब-दिन आसमान छू रही है.हालांकि घरेलू उद्योगों में ज्यादा इस्तेमाल होने की वजह से इसकी कीमतों में थोड़ी बहुत तेजी आ सकती है,लेकिन इससे देश के करोड़ों किसानों की माली हालत सुधरेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नया जीवन मिलेगा.

 

 

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