
भारत में लीची सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि बागवानों की 'किस्मत' है. खासकर बिहार की 'शाही लीची' ने तो सात समंदर पार अपनी धाक जमाई है. लेकिन याद रखिए, अप्रैल का आखिरी हफ्ता और मई की शुरुआत—ये वो वक्त है जब लीची की फसल सबसे ज्यादा 'सेंसिटिव' यानी नाज़ुक मोड़ पर होती है. आजकल मौसम का मिजाज यानी क्लाइमेट चेंज बड़ी तेजी से बदल रहा है. कभी बेतहाशा गर्मी तो कभी अचानक उमस. डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर के पौध सुरक्षा विभाग के हेड डॉ. एस.के. सिंह का साफ कहना है कि अगर इन चंद दिनों में किसानों ने थोड़ी सी भी लापरवाही बरती, तो साल भर की पूरी मेहनत मिट्टी में मिल सकती है.
अप्रैल के आखिरी हफ्ते से लेकर मई के शुरुआती 15 दिन फसल के लिए बेहद नाज़ुक हैं. इस दौरान अगर हमने मौसम की बेरुखी और बढ़ते हुए पारे पर काबू नहीं पाया, तो फलों की मिठास और बागवानों की कमाई दोनों पर पानी फिर सकता है. इसलिए इस वक्त में वैज्ञानिक तौर-तरीकों को अपनाएं, ताकि बाजार में अपनी उपज की तगड़ी कीमत मिले. इन दिनों अपनी नजरें बाग पर जमाए रखें.
डॉ. एस.के. सिंह का कहना है कि लीची के बागों में इस वक्त 'फल छेदक' कीट यानी बोरर सबसे बड़ा दुश्मन बनकर उभरता है. यह छोटा सा कीड़ा चुपके से फल के अंदर घुसकर उसे अंदर ही अंदर खोखला कर देता है, जिससे फल की क्वालिटी और खूबसूरती दोनों मटियामेट हो जाती हैं. इससे बचने का सबसे बेहतरीन तरीका 'इलाज से पहले सावधानी' है.
जैसे ही फल लौंग के बराबर हो जाएं, फौरन थियाक्लोप्रिड या इमिडाक्लोप्रिड जैसी दवाओं का छिड़काव करें. ध्यान रहे कि दवा के घोल में 'स्टिकर' जरूर मिलाएं ताकि छिड़काव के बाद दवा फलों पर जमी रहे. साथ ही, बाग की सफाई का खास ख्याल रखें. जो फल गिर चुके हों उन्हें फौरन जमीन में दफन कर दें ताकि कीड़ों का खानदान आगे न बढ़ सके.
डॉ. एस.के. सिंह ने बताया कि जब पारा 40 डिग्री के पार जाने लगे, तो लीची के फल गर्मी बर्दाश्त नहीं कर पाते और फटने लगते हैं. फल की त्वचा को फटने से बचाने के लिए 'बोरॉन' का इस्तेमाल किसी करिश्मे से कम नहीं है. नमी बनाए रखने के लिए हर हफ्ते हल्की सिंचाई करते रहें और पेड़ों के नीचे सूखी घास की परत यानी मल्चिंग बिछा दें ताकि मिट्टी की ठंडक बरकरार रहे.
अगर मुमकिन हो, तो बाग में 'फव्वारा सिंचाई' यानी स्प्रिंकलर का इंतजाम करें. दोपहर की तीखी धूप में अगर आप कुछ घंटे फव्वारे चलाएंगे, तो बाग का तापमान बाहर के मुकाबले 5 डिग्री तक कम हो जाएगा. यह 'माइक्रो क्लाइमेट' आपके फलों को झुलसने से बचाएगा और उनकी रंगत को निखारेगा.
पेड़ों को सही 'खुराक' देना ही उनकी सेहत और फलों की मिठास का असली राज है. 15 साल से बड़े पेड़ों को डीएपी, यूरिया और पोटाश की एक पूरी डोज देनी चाहिए. खाद डालते वक्त एक बात का खास ख्याल रखें कि इसे हमेशा तने से करीब 2 मीटर दूर एक घेरा बनाकर डालें, न कि तने के बिल्कुल पास.
इसके साथ ही सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी की जान बढ़ाती है. आज के नए दौर में किसान भाई अब ड्रोन और स्मार्ट सेंसर जैसी नई टेक्नोलॉजी का भी रुख कर रहे हैं. इन आधुनिक तरीकों से न सिर्फ खाद और दवाओं का छिड़काव बराबर होता है, बल्कि मेहनत और वक्त की भी बड़ी बचत होती है.
डॉ. एस.के. सिंह ने बताया कि किसान सिर्फ लाल रंग देखकर जल्दबाजी में फसल तोड़ लेते हैं, जो बाजार में कम दाम मिलने की सबसे बड़ी वजह है. लीची की तुड़ाई तभी करें जब उसमें पूरी तरह मिठास भर जाए और फल का उभार पूरा हो जाए. तुड़ाई हमेशा सुबह के ठंडे वक्त में या शाम ढलने पर करें, ताकि फल की ताजगी बनी रहे.
फलों को हमेशा गुच्छों के साथ तोड़ें. इससे उनकी 'शेल्फ लाइफ' यानी टिकने की ताकत बढ़ जाती है. शाही लीची को मिला 'जीआई टैग' आपके लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों के दरवाजे खोल चुका है. अगर हम बेहतर ग्रेडिंग और अच्छी पैकेजिंग पर ध्यान दें, तो हमारी लीची दुबई से लेकर लंदन तक अपनी मिठास का लोहा मनवाएगी.