Bonus Politics: थैली में बोनस, थाली में विदेशी तेल और दाल, बोनस पॉलिटिक्स के बीच फंसा भारत का किसान?

Bonus Politics: थैली में बोनस, थाली में विदेशी तेल और दाल, बोनस पॉलिटिक्स के बीच फंसा भारत का किसान?

भारत में गेहूं और धान की खरीद पर बोनस पॉलिटिक्स आज कृषि अर्थशास्त्र और चुनावी राजनीति के केंद्र में है. केंद्र सरकार द्वारा घोषित MSP के ऊपर राज्यों द्वारा द‍िए जाने वाले बोनस ने किसानों के लिए मुनाफे का एक नया गणित तैयार कर दिया है. यह नीति क्रॉप डायवर्स‍िफ‍िकेशन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है, क्योंकि किसान बोनस के लालच में दलहन और तिलहन जैसी जोखिम भरी फसलों से कतरा रहा है.

धान-गेहूं के बोनस पर स‍ियासत. धान-गेहूं के बोनस पर स‍ियासत.
ओम प्रकाश
  • New Delhi ,
  • Apr 14, 2026,
  • Updated Apr 14, 2026, 5:08 PM IST

हर साल लगभग 2 लाख करोड़ की दालें और खाद्य तेल आयात करने वाला भारत एक तरफ 'विदेशी निर्भरता' की बेड़ियां काटने का संकल्प ले रहा है, तो दूसरी तरफ 'वोटबैंक की फसल' काटने के लिए राज्य सरकारें गेहूं-धान पर बोनस की रेवड़ियां बांट रही हैं. यह विरोधाभास भारतीय कृषि को एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर ले आया है जहां केंद्र का 'आत्मनिर्भर भारत' वाला नारा राज्यों के 'बोनस पॉलिटिक्स' के शोर में दबता जा रहा है. जब खेत में अनाज के बजाय 'सियासी लाभ' बोया जा रहा हो, तो दलहन और तिलहन की आत्मनिर्भरता केवल कागजी सपना बनकर रह जाती है. सवाल यह है क‍ि राजनीति और नीति के बीच फंसे भारतीय किसान करें क्या? वो गेहूं-धान की खेती करें या दलहन-त‍िलहन की.

किसान कोई समाजसेवक नहीं हैं. इसल‍िए वो उसी फसल की खेती करेंगे ज‍िसमें उन्हें फायदा होगा. जब क‍िसान को पता है कि गेहूं और धान पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के ऊपर 100-500 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल का बोनस मिलेगा और सरकारी खरीद की गारंटी होगी, तो वह जोखिम भरी दालों या तिलहन की खेती क्यों करेगा? दलहन-तिलहन में न तो वैसी सरकारी खरीद है और न ही बाजार भाव की स्थिरता. सरकारी नीतियों ने ही किसान को 'धान-गेहूं' के चक्रव्यूह में कैद कर दिया है. 

कहां पर क‍ितना है बोनस  

  • रबी मार्केट‍िंग सीजन (RMS) 2026-27 के लिए गेहूं का MSP 2,585 रुपये प्रति क्विंटल तय क‍िया गया है.
  • राजस्थान में राज्य सरकार इस एमएसपी पर 150 प्रति क्विंटल का बोनस दे रही है. एमएसपी और बोनस म‍िलाकर गेहूं का दाम अब 2,735 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है.
  • मध्य प्रदेश में राज्य सरकार ने गेहूं पर 40 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस तय क‍िया है. इस तरह यहां पर गेहूं का एमएसपी 2,625 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है.
  • उत्तर प्रदेश में एमएसपी के ऊपर 20 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल की दर से फसल उतराई, छनाई और सफाई के ल‍िए म‍िलेंगे. इसका मतलब यह है क‍ि यहां गेहूं का दाम 2,605 प्रति क्विंटल होगा.
  • खरीफ विपणन सीजन (KMS) 2025-26 के ल‍िए केंद्र सरकार ने सामान्य धान का MSP 2,369 और ग्रेड-A धान का एमएसपी 2,389 प्रति क्विंटल तय किया है.
  • तेलंगाना में राज्य सरकार ने 'फाइन राइस' (बारीक धान) की किस्मों पर 500 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस दे रही है. इस तरह यहां पर ए ग्रेड के धान की कीमत 2,889 प्रति क्विंटल हो गई है. 
  • छत्तीसगढ़ में बोनस सह‍ित धान की खरीद 3,100 प्रति क्विंटल की दर से हो रही है. यहां सरकार सामान्य धान पर 731 और ग्रेड ए धान पर 711 रुपये का बोनस द‍िया जा रहा है.
  • तमिलनाडु राज्य सरकार ग्रेड-A धान पर 156 और सामान्य धान पर 131 रुपये का बोनस दे रही है. इस तरह यहां पर ग्रेड ए धान का सरकारी दाम 2,545 और सामान्य धान का 2,500 रुपये प्रत‍ि क्व‍िंटल है.
  • ओडिशा सरकार ने धान की खरीद पर 800 प्रति क्विंटल का भारी बोनस देने का ऐलान क‍िया है. यह इनपुट सब्सिडी के तौर पर द‍िया जा रहा है. यहां पर सामान्य धान की सरकारी कीमत 3,169 और ग्रेड-A धान का दाम 3,189 रुपये प्रत‍ि क्विंटल हो गया है.
  • केरल में धान पर 631 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस है. इस तरह यहां सामान्य धान का सरकारी दाम 2,369 एमएसपी और 631 रुपये का बोनस म‍िलाकर 3,000 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है.
  • बोनस के अलावा, केरल में धान के खेत मालिकों को अपनी भूमि को धान के खेत के रूप में बनाए रखने के लिए 3,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की रॉयल्टी और उर्वरक-बीज के लिए 5,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की मदद अलग से दी जाती है.

पॉल‍िसी का पंगा 

भारत में सालाना 1.5 लाख करोड़ का खाद्य तेल और करीब 47,000 करोड़ की दालें विदेशों से आ रही हैं. एक तरफ हम विदेशी मुद्रा बाहर भेज रहे हैं, दूसरी तरफ अपने ही किसानों को उन फसलों की ओर मोड़ने में नाकाम हैं, ज‍िनका आयात कर रहे हैं. हैरानी की बात यह है कि दलहन-तिलहन उगाने वाले किसानों को कई बार MSP तक नसीब नहीं होती, जबकि गेहूं-धान पर 'प्रीमियम' (बोनस) दिया जा रहा है. 

बीजेपी और बोनस 

फसलों पर बोनस की पॉल‍िट‍िक्स केवल विपक्षी शासन वाले राज्यों का मामला नहीं है. बीजेपी शासित राज्यों में भी बोनस की होड़ लगी है. केंद्र सरकार राज्यों को सलाह दे रही है कि बोनस केवल दालों और तिलहन पर दें, लेकिन चुनावी मजबूरियां राज्यों को धान-गेहूं पर टिके रहने को मजबूर करती हैं. यह 'डबल इंजन' की थ्योरी में नीतिगत पटरी के उतरने जैसा है. 

बोनस पर स‍ियासत 

गेहूं और धान की खेती पानी सोखने वाली फसलें हैं. बोनस के लालच में इन फसलों का रकबा बढ़ने से भूजल स्तर गिर रहा है. यदि यही रुझान रहा, तो आने वाले समय में हमारे पास न तो आत्मनिर्भर होने के लिए पानी बचेगा और न ही मिट्टी की उर्वरता. बहरहाल, यह कहानी अब एक और राजनीतिक मोड़ ले चुकी है, जहां केंद्र और राज्यों के बीच 'फसल और बोनस' के मुद्दे पर वाकयुद्ध छिड़ गया है. बोनस का मुद्दा हाल ही में केंद्र और तमिलनाडु सरकार के बीच एक तीखी बहस का केंद्र बन गया. जिसने कृषि नीति और सहकारी संघवाद के बीच की दरार को उजागर कर दिया है. 

स्टालिन बनाम सीतारमण

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने केंद्र पर आरोप लगाया कि वह राज्यों को धान पर बोनस बंद करने के लिए मजबूर कर रहा है. उन्होंने इसे किसानों के खिलाफ एक "विश्वासघात" बताया और कहा कि केंद्र के दबाव के बावजूद उनकी सरकार किसानों को 3,500 रुपये प्रति क्विंटल तक का भाव दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है. मुख्यमंत्री के आरोपों पर पलटवार करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे "तथ्यात्मक रूप से निराधार और राजनीति से प्रेरित" बताया. उन्होंने स्पष्ट किया कि वित्त मंत्रालय द्वारा 9 जनवरी 2026 को राज्यों को भेजा गया पत्र केवल एक 'एडवाइजरी' था, न कि कोई आदेश. केंद्र ने बोनस नीति की समीक्षा करने और गेहूं और धान पर दिए जाने वाले बोनस को बंद करने पर विचार करने का अनुरोध क‍िया था.

राज्यों का अधिकार सुरक्षित

केंद्र ने कहा है क‍ि MSP के ऊपर बोनस देना पूरी तरह से राज्य सरकारों का विशेषाधिकार है और केंद्र ने उनसे यह शक्ति नहीं छीनी है. वित्त मंत्री ने कहा कि केंद्र का सुझाव केवल राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के हित में था, ताकि किसान उन फसलों (दालें और तिलहन) की ओर मुड़ें जिनकी देश में भारी कमी है और जिन्हें हमें विदेशों से महंगे दामों पर मंगाना पड़ता है.उन्होंने स्टालिन पर 'झूठा नैरेटिव' गढ़ने का आरोप लगाया. 

मुनाफे का गणित और किसान  

जब किसान को पता है कि गेहूं-धान पर बोनस और सरकारी खरीद की गारंटी है, तो वह जोखिम भरी दालों या तिलहन की ओर नहीं जाना चाहता. सरकारी नीतियों ने ही अनजाने में किसान को इस चक्रव्यूह में बांध दिया है. कृषि का यह 'दोराहा' केवल फसल बदलने का नहीं, बल्कि मानसिकता बदलने का है. जब तक दालों और तिलहन की खेती को बोनस के जरिए धान-गेहूं के बराबर लाभदायक नहीं बनाया जाएगा, तब तक 'आत्मनिर्भर भारत' का सपना दिल्ली और राज्यों की राजधानियों के बीच चल रहे इस वाकयुद्ध की भेंट चढ़ता रहेगा.

भारतीय कृषि आज उस चौराहे पर खड़ी है जहां एक तरफ 'चुनावी जीत' का शॉर्टकट है और दूसरी तरफ 'आर्थिक आत्मनिर्भरता' का कठिन रास्ता. जब तक बोनस की राजनीति फसलों के चयन को प्रभावित करती रहेगी, तब तक भारत की थाली में दाल और तेल विदेशी ही रहेंगे. सरकार को बोनस की इस 'सियासी अफीम' का इलाज 'फसल विविधीकरण प्रोत्साहन' से करना होगा, वरना आत्मनिर्भरता का नारा केवल चुनावी रैलियों की गूंज बनकर रह जाएगा. जब तक दलहन और त‍िलहन की खेती में क‍िसानों को गेहूं और धान ज‍ितना फायदा नहीं म‍िलेगा तब तक वो फसल नहीं बदलेंगे. 

इसे भी पढ़ें: फूफा के देसी विजन से बना दुन‍िया के किचन पर राज करने वाला चावल, ये है पूसा बासमती-1121 की पूरी कहानी

इसे भी पढ़ें: छोटे होते खेत, बड़ी होती चुनौतियां...सिमटती जोत में कैसे बढ़ेगी किसानों की आय?

MORE NEWS

Read more!