
छत्तीसगढ़ के धमधा क्षेत्र में बागवानी किसानों पर बढ़ते खर्च और बाजार में गिरती मांग का दोहरा संकट मंडरा रहा है. किसान मानते हैं कि हजारों किलोमीटर दूर चल रहे वैश्विक तनाव और युद्ध का असर अब सीधे उनके खेतों तक पहुंच चुका है. धमधा के किसानों का कहना है कि डीजल की कीमतों में उछाल, खेती में लगने वाले माल की महंगाई, खादों की कमी, बिजली की अनियमित आपूर्ति और बाजार में अनिश्चितता ने खेती की लागत को 40 से 50 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है.
खेतों में खड़े करेला और पपीता किसानों की परेशानी साफ बयान करते हैं. किसानों के मुताबिक ड्रिप इरिगेशन सिस्टम, मल्चिंग शीट और प्लास्टिक पाइप जैसे जरूरी सामान की कीमतों में भी भारी इजाफा हुआ है.
एक किसान ने बताया, “हर चीज महंगी हो गई है—डीजल, प्लास्टिक, सिंचाई का खर्च. अब सबसे बड़ी चिंता यह है कि जो पैसा लगाया है, वह वापस मिलेगा या नहीं.” बागवानी की आधुनिक खेती में ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग तकनीक बेहद जरूरी होती है, लेकिन इनसे जुड़े उत्पाद पेट्रोकेमिकल से बनते हैं, जिनकी लागत बढ़ने से किसानों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं.
समस्या सिर्फ लागत तक सीमित नहीं है. किसानों का कहना है कि इस बार उनकी फसल समय पर बाजार तक नहीं पहुंच पाई. परिवहन खर्च बढ़ने और बाजार में मांग घटने के कारण खरीदारों ने पर्याप्त मात्रा में खरीद नहीं की. इसके चलते बड़ी मात्रा में पपीता खेतों में ही रह गया, जो समय के साथ खराब हो गया. जो फसल कभी मुनाफे का जरिया थी, वही अब घाटे का कारण बन गई है. किसानों को मजबूरन खराब फसल को खेत से हटाकर नुकसान उठाना पड़ रहा है.
एक अन्य किसान ने कहा, “पहले हम देशभर में अपनी उपज भेजते थे, लेकिन अब मांग की कमी की वजह से सप्लाई रुक गई है.” किसानों की परेशानी यहीं खत्म नहीं होती. उनका आरोप है कि खादों की सप्लाई सीमित हो गई है, जिससे जरूरी समय पर खाद मिलना मुश्किल हो गया है. कई किसान मानते हैं कि वैश्विक आपूर्ति बाधित होने से यह स्थिति बनी है.
बिजली की अनियमित आपूर्ति ने भी हालत और खराब कर दी है. किसानों को अब सिंचाई के लिए डीजल पंपसेट पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे लागत और बढ़ गई है. किसान मधुसूदन राणा बताते हैं, “पहले खेती में डीजल का खर्च काफी कम था, अब ट्रैक्टर और पंपसेट दोनों का खर्च तेजी से बढ़ गया है. जो पहले 15 हजार में होता था, अब 25 से 30 हजार तक पहुंच गया है.”
किसानों के अनुसार, डीजल खर्च में भारी वृद्धि हो चुकी है और नियमित सिंचाई वाली फसलों में इसे कम करना संभव नहीं है. हालांकि सबसे बड़ा डर बाजार को लेकर है. किसानों का कहना है कि भारी निवेश के बाद भी उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिलेगा या नहीं, यह निश्चित नहीं है.
किसान शेरसिंह कहते हैं, “हमें डर है कि कहीं फिर से फसल फेंकने की नौबत न आ जाए. हमें किसी तरह की कीमत की गारंटी मिलनी चाहिए.” फसल बर्बादी की पुरानी यादें अभी भी किसानों के मन में ताजा हैं. कई किसान कहते हैं कि अगर बाजार में कीमत गिरती है, तो उनकी महीनों की मेहनत कुछ दिनों में खत्म हो सकती है.
इस पूरे मामले में राज्य के कृषि मंत्री राम विचार नेताम से भी प्रतिक्रिया ली गई है, ताकि यह जाना जा सके कि सरकार किसानों की इस समस्या के समाधान के लिए क्या कदम उठा रही है. धमधा के किसानों के लिए यह संकट किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई समस्याओं के मेल से पैदा हुआ है—महंगाई, संसाधनों की कमी, बिजली संकट और बाजार में अनिश्चितता.
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार और बाजार के तंत्र मिलकर इन किसानों को इस बढ़ते संकट से उबार पाएंगे.(सुमी राजाप्पन की रिपोर्ट)