
वर्तमान में जलवायु की असामान्य परिस्थितियों के कारण मॉनसून की समय से सक्रियता प्रभावित हो रही है, जिससे वर्षा की अनिश्चितता एवं सामान्य से कम बारिश की संभावित है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार उत्तर प्रदेश में अभी तक मानक वर्षा से 56 प्रतिशत वर्षा कम हुई है, जिससे लगभग सभी जनपद प्रभावित हुए हैं. इस स्थिति को देखते हुए कृषि विभाग द्वारा रणनीति तैयार कर किसानों को सफल फसलों के उत्पादन के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की गई है. विभाग ने किसानों से अल-निनो (El Nino) के देशव्यापी प्रभाव और विषम मॉनसून की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर इन सुझावों का पालन करने और अपनी फसलों का समय से बीमा कराने की अपील की है.
विभाग द्वारा जारी एडवाइजरी के अनुसार, धान की खेती केवल उन्हीं स्थानों पर करने का सुझाव दिया गया है जहां पानी के सुनिश्चित साधन उपलब्ध हैं. वर्षा आधारित खेती के लिए धान के स्थान पर श्री अन्न, मक्का, उर्द, मूंग, तिल और अरहर जैसी फसलों को प्राथमिकता देने के लिए कहा गया है. वहीं, धान की रोपाई वाले खेतों में एक फीट ऊंची मेड़ बनाने की सलाह दी गई है ताकि वर्षा का जल संचित हो सके और नर्सरी में पानी का ठहराव न होने देने के निर्देश दिए गए हैं. कम पानी में बेहतर उत्पादन के लिए धान की सीधी बुआई (डीएसआर) पद्धति अपनाने तथा कम दिनों में तैयार होने वाली प्रजातियों जैसे सीआर धान-100, 101, 103, आईआर-64 और एनडीआर-97 का चयन करने को कहा गया है.
रोपाई के लिए 20 से 25 दिन की पौध को दो-तीन पौधा प्रति हिल और तीन-चार सेंटीमीटर की गहराई पर लगाने का सुझाव दिया गया है. जबकि आकस्मिक फसल योजना के अंतर्गत कम जल मांग वाली और सूखा सहनशील फसलों पर विशेष बल दिया गया है. ज्वार, बाजरा, सावां, कोदो और रागी जैसी श्री अन्न फसलें केवल वर्षा के जल से अच्छा उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं और इनमें कीटों तथा रोगों का प्रकोप भी कम होता है. दलहनी फसलों में अरहर की बुआई मेड़ या रिज बनाकर करने की सलाह दी गई है ताकि वर्षा जल का सदुपयोग हो सके. कम समय में अधिक उत्पादन के लिए मूंग की मालवीय जन क्रांति, विराट, स्वाति तथा उर्द की पंत उर्द 12, 8, 9 और वल्लभ उर्द प्रजातियों को उपयुक्त बताया गया है.
इसी प्रकार तिलहनी फसलों में तिल की तरुण, प्रगति, शेखर; मूंगफली की उत्कर्ष, प्रकाश, अम्बर और सोयाबीन की पीके-472, 416 तथा पंतसोयाबीन-26 जैसी विषम परिस्थितियों के प्रति सहिष्णु प्रजातियों की खेती को किसानों के लिए लाभकारी बताया गया है. जल एवं नमी संरक्षण के संबंध में किसानों को गहरी जुताई से बचने और सूखी पत्तियों, पुआल अथवा प्लास्टिक शीट से मल्चिंग करने का सुझाव दिया गया है. मिट्टी में जैविक व कंपोस्ट खाद के साथ-साथ पूसा हाइड्रो जेल का प्रयोग करने की सलाह दी गई है, जो अपने वजन से तीन सौ गुना अधिक पानी सोखकर नमी बनाए रखता है.
उन्नत सिंचाई प्रबंधन के तहत केवल सायंकाल या रात में ही नाली अथवा बेसिन विधि से सिंचाई करने और पानी बचाकर केवल फसलों की क्रांतिक अवस्था पर ही सिंचाई करने को कहा गया है. वहीं ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई विधियों को अपनाने और मिश्रित खेती के तहत मक्का के साथ अरहर या मूंग उगाने पर जोर दिया गया है. इसके अतिरिक्त, किसानों से अनुरोध किया गया है कि वे किसी भी आकस्मिकता से बचने के लिए 31 जुलाई से पहले निर्धारित वित्तमान के मात्र दो प्रतिशत प्रीमियम पर अपनी अधिसूचित खरीफ फसलों का बीमा अवश्य करा लें.
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