Seed Potato: फिर परेशानी में पंजाब के 'आलू बीज' तैयार करने वाले किसान, बार-बार क्‍यों आता है संकट?

Seed Potato: फिर परेशानी में पंजाब के 'आलू बीज' तैयार करने वाले किसान, बार-बार क्‍यों आता है संकट?

Potato Seed Farmers Crisis: पंजाब के दोआबा क्षेत्र में एक बार फिर बीज आलू किसानों पर संकट मंडरा रहा है. भारी उत्पादन के बावजूद दाम गिरने से किसान लागत भी नहीं निकाल पा रहे हैं. जब देश में बीज की जरूरत स्थिर है तो हर कुछ साल में यह संकट क्यों लौट आता है?

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क‍िसान तक
  • नोएडा,
  • Feb 26, 2026,
  • Updated Feb 26, 2026, 1:22 PM IST

पंजाब के दोआबा इलाके में इन दिनों खेतों के किनारे पड़ी आलू की ढेरियां किसी अच्छी फसल की नहीं, बल्कि गहराते संकट की कहानी बयां कर रही हैं. देश का सीड पोटैटो बाउल कहलाने वाला यह इलाका एक बार फिर भारी दाम गिरावट की चपेट में है, जहां मेहनत, लागत और वैज्ञानिक खेती सब कुछ बाजार की बेरुखी के आगे बेअसर नजर आ रहा है. जालंधर के मालसियां गांव के किसान निर्मल सिंह के लिए यह सीजन किसी झटके से कम नहीं है. 

'खेती से पहले घाटा हो रहा फिक्‍स'

इंडियन एक्‍सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 24 एकड़ में खेती करने वाले किसान निर्मल बताते हैं कि तीन फसलों के चक्र में सिर्फ जमीन का ठेका ही प्रति फसल 18 से 20 हजार रुपये प्रति एकड़ पड़ता है. ऊपर से बीज, खाद, दवा और मजदूरी मिलाकर आलू की लागत 9 से 10 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है, जबकि मंडी में भाव 3 से 6 रुपये किलो के बीच सिमट गया है. ऐसी हालत में लागत निकलना तो दूर, घाटा तय हो जाता है.

दोआबा क्षेत्र में आते हैं ये जिले

दोआबा क्षेत्र में जालंधर, कपूरथला, होशियारपुर और एसबीएस नगर शामिल हैं, इसे देश का सबसे बड़ा प्रमाणित बीज आलू क्षेत्र माना जाता है. यहां पैदा होने वाले कुल आलू का करीब 60 से 65 फीसदी हिस्सा बीज के तौर पर देश के अलग-अलग राज्यों में जाता है. पंजाब में हर साल लगभग 33 लाख टन आलू उत्पादन होता है, जिसमें से करीब 20 लाख टन बीज के मानक पर खरा उतरता है.

हर तीन-चार साल में दोहराता है संकट

कागजों में देखें तो यहां कभी बीज आलू की अधिकता होनी ही नहीं चाहिए. देश में लगभग 56 लाख एकड़ में आलू की खेती होती है और वैज्ञानिक तौर पर हर तीसरे साल बीज बदलने की सलाह दी जाती है. इस हिसाब से हर साल 18 से 20 लाख एकड़ क्षेत्र को नए बीज की जरूरत पड़ती है, जो पंजाब के उत्पादन के आसपास ही बैठता है. फिर भी हर तीन-चार साल में दोआबा के किसान दामों की मार क्यों झेलते हैं, यही सबसे बड़ा सवाल है.

बीज आलू उत्पादन को लेकर ये आरोप

किसानों का आरोप है कि असली समस्या बीज आलू उत्पादन के बेतरतीब विस्तार से पैदा हो रही है. हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में बीज आलू की खेती तेजी से बढ़ी है. जब उत्पादन ज्यादा हो जाता है तो सामान्य टेबल आलू को ही सस्ते दामों पर बीज बताकर बाजार में उतार दिया जाता है. इससे पंजाब के प्रमाणित बीज की मांग अचानक गिर जाती है.

किसान परमवीर सिंह ने कहा कि ‘बीज आलू’ आम तौर पर टेबल आलू से दो से तीन गुना दाम पर बिकता है. लेकिन, जब व्यापारी सस्ते विकल्प सामने रखते हैं तो किसान क्‍वाल‍िटी से समझौता करने को मजबूर हो जाते हैं. कई राज्यों में किसान तीन साल के बजाय चार-पांच साल तक वही बीज दोहराते रहते हैं, जिससे मांग का प्राकृतिक चक्र ही टूट जाता है.

आसान नहीं है 'आलू बीज' की खेती

बीज आलू की खेती साधारण काम नहीं है. इसमें डिहॉल्मिंग जैसी तकनीक अपनाई जाती है, ताकि आलू तय आकार में रहे और रोग मुक्त रहे. फसल का एक हिस्सा दिसंबर में छोटे टेबल आलू के तौर पर निकाला जाता है, कुछ हिस्सा मार्च में बड़े आलू के रूप में और बाकी को छांटकर बीज के लिए भंडारित किया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में अतिरिक्त श्रम और खर्च लगता है.

किसान अजैब सिंह कहते हैं कि जब बीज आलू को टेबल आलू के दाम पर बेचना पड़ता है तो सारी मेहनत बेकार चली जाती है. कई बार मजदूरी देने तक के पैसे नहीं बचते. पंजाब में आलू का रकबा अब करीब 1.25 लाख हेक्टेयर तक पहुंच चुका है. उत्पादन मजबूत है, लेकिन बाजार की अस्थिरता किसानों का पीछा नहीं छोड़ रही है. 

जागरूकता और सख्‍त निगरानी की जरूरत

किसानों का कहना है कि समाधान जागरूकता और सख्त निगरानी में है. अगर देशभर में बीज बदलने के नियम का सही पालन हो और प्रमाणित बीज और टेबल आलू के बीच साफ अंतर रखा जाए तो इस तरह की बार-बार आने वाली मंदी से बचा जा सकता है. किसान यह भी तर्क देते हैं कि दोआबा की मिट्टी और तापमान वायरस-फ्री बीज आलू के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते हैं, लेकिन इस पहचान को कभी औपचारिक दर्जा नहीं मिला. जीआई टैग जैसी पहल न होने से इस क्षेत्र की विशिष्टता भी बाजार में कमजोर पड़ जाती है.

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