
पंजाब में स्थानीय प्रदूषण बढ़ने के बाद भी पराली जलाने की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं. इस महीने पहली तारीख से ही पराली जलाने की घटनाएं तेजी से बढ़ी है. यही वजह है कि पूरे राज्य में इस सीजन में पराली जलाने की घटनाएं 8 हजार के पार हो गई हैं. शनिवार को राज्य में पराली जलाने की 136 घटनाएं सामने आए. पंजाब रिमोट सेंसिंग सेंटर के मुताबिक, संगरूर जिले में सबसे अधिक पराली जलाने की 50 घटनाएं दर्ज की गईं. वहीं, फिरोजपुर में 30, बरनाला में 17 और पटियाला में 12 पराली जलाने की घटनाएं रिकॉर्ड की गईं. पराली जलाने पर जुर्माना दोगुना करने के बाद भी इन घटनाओं पर अंकुश नहीं लग पा रहा है.
हालांकि, 2022 और 2023 में 16 नवंबर को राज्य में पराली जलाने की 1,358 और 1,271 घटनाएं रिकॉर्ड की गई थीं . पंजाब में 15 सितंबर से 16 नवंबर तक पंजाब में पराली जलाने की कुल 8,000 घटनाएं हुई हैं. पिछले साल का इसी अवधि का रिकॉर्ड देखें तो इस बार पराली जलाने की घटनाओं में करीब 75 प्रतिशत कमी देखी गई है.
बता दें कि पंजाब में 15 सितंबर से 16 नवंबर तक 2022 में कुल 46,822 और 2023 में 31,932 पराली जलाने की घटनाएं दर्ज की गई थीं. इस सीजन पराली जलाने की 50 प्रतिशत घटनाएं ( करीब 4,000) 3 नवंबर 16 नवंबर के बीच दर्ज की गई हैं. पराली जलाने की घटनाओं को लेकर केंद्र सरकार ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अमल करते हुए जुर्माना डबल कर दिया है. ऐसे में हरियाणा और पंजाब समेत कुछ राज्यों में ये नियम लागू कर दिए गए हैं.
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पंजाब में साल 2023 में सीजन के दौरान कुल 36,663 पराली जलाने की घटनाएं दर्ज की गईं थीं, जबिक 2022 में 49,922, 2021 में 71,304, 2020 में 76,590, 2019 में 55,210 और 2018 में 50,590 पराली जलाने की घटनाएं रिकॉर्ड की गईं थी. इन वर्षों में संगरूर, मानसा, बठिंडा और अमृतसर समेत कई जिलों में बड़ी संख्या में ये मामले रिकॉर्ड किए गए थे.
मालूम हो कि पंजाब और हरियाणा में किसान बड़े पैमाने पर धान की खेती करते हैं. ऐसे में सितंबर के दूसरे हफ्ते से फसल कटाई के बाद पराली जलाने की घटनाएं सामने आने लगती हैं. पराली जलाने की ज्यादातर घटनाएं छोटे किसानों की ओर से सामने आती हैं, जो इसके प्रबंधन का खर्च नहीं उठा पाते. वहीं कई घटनाएं धान की कटाई और गेहूं की बिजाई के बीच कम समय मिलने के कारण होती हैं. पराली जलाने से किसानों का समय बच जाता है. हालांकि, इससे जमीन के पोषक तत्व नष्ट होते हैं और खाद की मात्रा अधिक लगने से खेती की लागत बढ़ती है. (पीटीआई)