विदर्भ में सूखे का कहर: वेंटिलेटर पर कपास-सोयाबीन की फसलें, किसान बोले- अब बारिश ही आखिरी उम्मीद

विदर्भ में सूखे का कहर: वेंटिलेटर पर कपास-सोयाबीन की फसलें, किसान बोले- अब बारिश ही आखिरी उम्मीद

विदर्भ में मॉनसून के लंबे ब्रेक ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. कपास और सोयाबीन की फसलें पानी की कमी से बुरी तरह प्रभावित हैं. किसान विलास तुलसीराम ताथोड का कहना है कि हालात इतने खराब हैं कि फसलें "वेंटिलेटर" पर पहुंच चुकी हैं और जल्द बारिश नहीं हुई तो भारी नुकसान तय है.

कपास पर संकट है भारीकपास पर संकट है भारी
रवि कांत सिंह
  • New Delhi,
  • Sep 07, 2026,
  • Updated Sep 07, 2026, 1:06 PM IST

महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र इस समय गंभीर कृषि संकट के दौर से गुजर रहा है. बारिश की लंबी खींच ने खेतों की तस्वीर बदल दी है. कुछ सप्ताह पहले तक हरे-भरे दिखाई देने वाले खेत आज सूखी मिट्टी, मुरझाए पौधों और किसानों की बढ़ती चिंता का प्रतीक बन गए हैं. कपास और सोयाबीन जैसी खरीफ की प्रमुख फसलें पानी की भारी कमी से जूझ रही हैं और किसान अपनी पूरी उम्मीद आसमान की ओर लगाए बैठे हैं.

विदर्भ के किसान विलास तुलसीराम ताथोड का कहना है कि इलाके में स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है. उनके मुताबिक कपास और सोयाबीन दोनों फसलें इस समय ऐसे चरण में हैं, जहां उन्हें सबसे अधिक नमी और बारिश की जरूरत होती है, लेकिन लंबे समय से बारिश नहीं होने के कारण फसलों की हालत बेहद खराब हो गई है. ताथोड कहते हैं कि अगर आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो उत्पादन में भारी गिरावट तय है.

किसानों के पास सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं

दरअसल, विदर्भ का बड़ा हिस्सा आज भी बारिश आधारित खेती पर निर्भर है. अधिकांश किसानों के पास सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. जून और जुलाई में हुई शुरुआती बारिश के भरोसे किसानों ने बुवाई की थी. उन्होंने बीज, खाद, कीटनाशक और खेती के अन्य कार्यों पर अपनी बचत के साथ-साथ उधार का पैसा भी लगाया. किसानों को उम्मीद थी कि मॉनसून सामान्य रहेगा और फसल अच्छी होगी, लेकिन अगस्त और सितंबर में बारिश का लंबा ब्रेक पूरे कृषि चक्र पर भारी पड़ गया.

सबसे ज्यादा असर सोयाबीन की फसल पर दिखाई दे रहा है. इस समय सोयाबीन में फलियां बनने और दाना भरने की प्रक्रिया चल रही है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह फसल का सबसे संवेदनशील चरण होता है. पानी की कमी के कारण पौधों पर आए फूल झड़ रहे हैं और फलियों का विकास रुक रहा है. कई गांवों में पौधे पूरी तरह बढ़ भी नहीं पाए और समय से पहले सूखने लगे हैं. इससे उत्पादन में बड़ी गिरावट की आशंका पैदा हो गई है.

सोयाबीन और कपास की फसल प्रभावित

किसानों का कहना है कि जिन खेतों में सोयाबीन की फसल खड़ी है, वहां पौधों की ऊंचाई सामान्य से काफी कम है. फलियां छोटी रह गई हैं और उनमें दाना भरने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है. कुछ इलाकों में तो हालात ऐसे हैं कि फसल काटने और थ्रेसिंग का खर्च भी निकलना मुश्किल दिखाई दे रहा है.

वहीं दूसरी ओर विदर्भ की पहचान मानी जाने वाली कपास की फसल भी गंभीर संकट में है. पानी की लगातार कमी ने कपास की बढ़वार रोक दी है. खेतों में पौधों की पत्तियां पीली और लाल पड़ रही हैं. स्थानीय किसान इसे "लालिया" जैसी स्थिति बता रहे हैं. पौधों पर आने वाले फूल और डोडे समय से पहले झड़ रहे हैं, जबकि कई जगह छोटे आकार के डोडे समय से पहले फूटने लगे हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कपास के डोडों को पर्याप्त नमी नहीं मिलती तो उनसे निकलने वाली रुई की क्वालिटी प्रभावित होती है. इससे किसानों को बाजार में कम दाम मिलने का खतरा रहता है. उत्पादन घटने के साथ-साथ क्वालिटी में गिरावट किसानों की आय पर दोहरी मार डाल सकती है.

तेजी से सूख रहे हैं पानी के स्रोत

संकट केवल फसलों तक सीमित नहीं है. क्षेत्र के कुएं, बोरवेल और अन्य जलस्रोत भी तेजी से सूख रहे हैं. जिन किसानों के पास सीमित सिंचाई सुविधाएं हैं, वे भी पानी की कमी के कारण खेतों तक पर्याप्त सिंचाई नहीं पहुंचा पा रहे हैं. असिंचित क्षेत्रों के किसानों के पास तो फसल बचाने का कोई विकल्प ही नहीं बचा है.

किसान विलास तुलसीराम ताथोड बताते हैं कि खेतों में खड़ी फसलों को देखकर किसानों की चिंता बढ़ती जा रही है. कई परिवारों की सालभर की आय इन्हीं फसलों पर निर्भर है. यदि फसलें खराब होती हैं तो इसका असर केवल खेतों तक नहीं रहेगा, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ेगा. खेती से जुड़ी देनदारियां बढ़ेंगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बनेगा.

विदर्भ के किसान फिलहाल मौसम में बदलाव और अच्छी बारिश की उम्मीद लगाए बैठे हैं. उनका कहना है कि अभी भी यदि पर्याप्त बारिश हो जाए तो कुछ हद तक नुकसान कम किया जा सकता है. लेकिन हर गुजरते दिन के साथ यह उम्मीद कमजोर पड़ती जा रही है. ऐसे में पूरे क्षेत्र की नजरें अब मॉनसून की अगली बारिश पर टिकी हुई हैं, क्योंकि यही बारिश हजारों किसानों की मेहनत, उम्मीद और आजीविका को बचाने का आखिरी सहारा बन सकती है.

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