
अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते मध्य प्रदेश से बासमती चावल का एक्सपोर्ट ठप हो गया है. 4 लाख टन बासमती चावल अभी रास्ते में फंसा हुआ है. चावल निर्यात रुकने और नई मांग न होने की वजह से घरेलू बाजार में बासमती चावल के दामों में प्रति क्विंटल 1000 रुपये तक की कमी देखी जा रही है. मध्य एशिया में जारी लड़ाई का सीधा असर भारत के बासमती चावल कारोबार पर पड़ रहा है. बीते दो दिनों से एक्सपोर्ट पूरी तरह ठप होने के कारण डिमांड में भारी कमी आई है. ईरान समेत खाड़ी देशों में बासमती सेला 1509, 1121, सुगंधा और शरबती जैसे चावलों की भारी मांग रहती है, लेकिन मौजूदा लड़ाई के चलते चावल के कंसाइनमेंट समुद्र या पोर्ट में फंस गए हैं.
मध्य प्रदेश के रायसेन जिले से बासमती चावल का विदेश में भारी निर्यात होता है. ईरान में जारी युद्ध का असर अब भारत के बासमती चावल कारोबार पर साफ दिखाई देने लगा है. मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में स्थित अपर्णा फूड मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष सचिन वर्मा ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय हालातों के चलते बासमती चावल के एक्सपोर्ट पर टैक्स बढ़ गया है, जिससे निर्यात कारोबार पूरी तरह प्रभावित हो रहा है.
सचिन वर्मा ने बताया कि भारत से बड़ी मात्रा में बासमती चावल ईरान सहित कई देशों में एक्सपोर्ट किया जाता है, लेकिन युद्ध और समुद्री रास्तों में अनिश्चितता के कारण व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. खासतौर पर लाल सागर रूट पर बनी अस्थिर स्थिति के चलते शिपिंग लाइनों में भी भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. शिपिंग कंपनियां 2000 से 2500 डॉलर प्रति घंटा के रेट से चार्ज कर रही हैं जिससे फ्रेट बहुत महंगा हो गया है.
पहले जहां एक कंटेनर का शिपिंग खर्च लगभग 2000 डॉलर था, वहीं अब यह बढ़कर करीब 9000 डॉलर प्रति कंटेनर तक पहुंच गया है. सभी खर्च को जोड़ दें तो 8-10 रुपये प्रति किलो चावल पर अतिरिक्त खर्च आ रहा है जो एक्सपोर्टर्स को देना पड़ रहा है. सचिन वर्मा ने कहा कि इतना खर्च करने के बाद भी शिपिंग कंपनियां माल को असली जगह पर नहीं पहुंचा रही हैं बल्कि कहीं और डंप कर रही हैं. इससे बाजार में भय का माहौल है. जब तक युद्ध चलेगा तब तक मध्य पूर्व में चावल एक्सपोर्ट में समस्या आती रहेगी.
निर्यात रुकने से लगातार बढ़ती लागत और टैक्स के कारण एक्सपोर्ट कारोबार लगभग ठप होने की कगार पर पहुंच गया है. व्यापारियों का कहना है कि यदि जल्द हालात सामान्य नहीं हुए तो बासमती चावल उद्योग से जुड़े किसानों, मिलर्स और व्यापारियों को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है. फिलहाल अंतरराष्ट्रीय हालातों पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं.(राजेश रजक का इनपुट)