
हरियाणा में पिछले छह वर्षों में कपास की 50 प्रतिशत से ज्यादा खेती खत्म हो गई है. वहीं, रकबा अभी भी लगातार घट रहा है, जिसके बाद अब जाकर राज्य सरकार की नींद खुली है. राज्य में 2019-20 में जहां करीब 8 लाख हेक्टेयर में कपास की बुवाई होती थी, वहीं 2024-25 में यह घटकर लगभग 3.9 लाख हेक्टेयर तक सिमट गया है. इस गिरावट को देखते हुए राज्य सरकार अब किसानों को दोबारा कपास की खेती की ओर आकर्षित करने के लिए विशेष पहल शुरू कर रही है. कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने कपास को बढ़ावा देने के लिए “प्रमोशन फॉर कॉटन कल्टीवेशन इन हरियाणा (PCCH)” नाम से एक अलग विंग तैयार किया है.
इस पहल का उद्देश्य राज्य में कपास उत्पादन को फिर से मजबूत करना और किसानों को इस फसल के प्रति भरोसा दिलाना है. 'दि ट्रिब्यून' की रिपोर्ट के इस अभियान के तहत सात प्रमुख कपास उत्पादक जिलों - सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, भिवानी, चरखी दादरी, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ पर विशेष ध्यान दिया जाएगा. इनमें सिरसा, फतेहाबाद और हिसार को हरियाणा का पारंपरिक कपास बेल्ट माना जाता है, जहां पहले बड़े पैमाने पर खेती होती थी.
कपास की खेती में गिरावट का सबसे बड़ा कारण पिछले कुछ वर्षों में बार-बार हुए कीट हमले और फसल नुकसान रहे हैं. इससे परेशान होकर कई किसानों ने धान जैसी अन्य फसलों की ओर रुख कर लिया. इस बदलाव से कुछ इलाकों में सिंचाई संसाधनों पर भी अतिरिक्त दबाव बढ़ा है.
रिपोर्ट के मुताबिक, नई योजना के तहत हर जिले में दो एकड़ के डेमो प्लॉट विकसित किए जाएंगे. इन फार्मों की निगरानी कृषि विभाग और चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक संयुक्त रूप से करेंगे. इन प्लॉट्स पर खेती की पूरी प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से दिखाया जाएगा, जिससे किसानों को व्यवहारिक प्रशिक्षण (प्रैक्टिकल ट्रेनिंग) मिल सके.
डेमो फार्म में जमीन की तैयारी, बुवाई, सिंचाई, कीटनाशक का उपयोग और कटाई तक हर चरण का रिकॉर्ड रखा जाएगा. इससे किसानों को आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके समझने में आसानी होगी और वे बेहतर उत्पादन के लिए सही तकनीक अपना सकेंगे.
पीसीसीएच के राज्य समन्वयक डॉ. अरुण कुमार यादव के अनुसार किसानों को खाद और कीटनाशक के सही उपयोग के साथ-साथ रोग और हानिकारक कीटों की पहचान भी सिखाई जाएगी. अधिकारियों द्वारा पूरी फसल प्रक्रिया पर नजर रखी जाएगी, ताकि किसान मौके पर ही सीख सकें और अपनी खेती में सुधार कर सकें.
इस पहल की खास बात यह है कि आसपास के किसान इन डेमो प्लॉट्स का दौरा कर सकेंगे और विशेषज्ञों व प्रगतिशील किसानों से सीधे जानकारी ले सकेंगे. इससे कपास की खेती को लेकर भरोसा बढ़ेगा और उम्मीद है कि आने वाले समय में इसका रकबा फिर से बढ़ सकेगा.