
गुजरात में प्राकृतिक और देसी तरीके से उगाए गए आम अब किसानों के लिए कमाई का मजबूत जरिया बन रहे हैं. तापी और डांग जैसे जिलों के किसान बिना किसी रासायनिक खाद और कीटनाशक के आम की खेती कर रहे हैं और इसका नतीजा यह है कि उनके आम बाजार में अच्छे दाम पर बिक रहे हैं.
तापी जिले के वालोड़ ताल्लुका के मोरदेवी गांव के किसान अनिलभाई रमणभाई पटेल पिछले 15–20 सालों से पूरी तरह गाय आधारित प्राकृतिक खेती कर रहे हैं. उनकी 22 बीघा जमीन में करीब 4200 आम के पेड़ हैं.
अनिलभाई बताते हैं कि उनके फार्म में आज तक एक बूंद भी chemical pesticide या spray का इस्तेमाल नहीं हुआ है. उनका कहना है कि चाहे किसी भी लैब में आम की जांच करवा ली जाए, उसमें न तो carbide मिलेगा और न ही कोई रसायन.
वे खेती में गौकृपा अमृतम, पंचगव्य, करंज, आकड़ा जैसे देसी और प्राकृतिक घोलों का इस्तेमाल करते हैं. आम में फूल आने से लेकर फल पकने तक जरूरत के हिसाब से ये प्राकृतिक स्प्रे किए जाते हैं. इस पद्धति से न सिर्फ आम की क्वालिटी अच्छी होती है, बल्कि फसल भी पूरी तरह सुरक्षित रहती है.
अनिलभाई कहते हैं कि प्राकृतिक खेती का रिजल्ट बाकी खेती से बिल्कुल अलग होता है. उनका फार्म पूरी तरह Zero chemical है. यही वजह है कि उनके आम ज्यादा समय तक टिकते हैं और स्वाद भी बेहतरीन होता है. उन्होंने बताया कि सरकार और कृषि विभाग की ओर से उन्हें आम महोत्सव में स्टॉल मिला है, जहां पिछले दो दिनों से उनका पूरा आम स्टॉल अच्छी तरह बिक रहा है.
डांग जिले से आए किसान हार्दिक नरेशभाई पारेख भी प्राकृतिक तरीके से आम की खेती कर रहे हैं. हार्दिक बताते हैं कि डांग की केरी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सिंचाई का पानी नहीं दिया जाता.
डांग में आम के पेड़ों को सिर्फ बारिश का पानी ही मिलता है. खाद के तौर पर जीवामृत, घनअमृत और जैविक खाद का इस्तेमाल किया जाता है. बारिश के बाद एक बार निराई का काम किया जाता है और फिर फसल पूरी तरह कुदरती तरीके से बढ़ती है.
हार्दिक के मुताबिक, डांग की केरी को ‘बिना pH वाली केरी’ कहा जाता है. इसकी मिठास बहुत ज्यादा होती है, काटने पर इसमें रेशे पूरी तरह खाने लायक होते हैं और पानी जैसा स्वाद बिल्कुल नहीं आता.
हार्दिक पारेख बताते हैं कि प्राकृतिक खेती से आमदनी में डबल फायदा होता है. बाजार रेट से दोगुना भाव मिलता है, क्योंकि जो ग्राहक असली ऑर्गेनिक खाना चाहते हैं, वे दाम नहीं बल्कि क्वालिटी देखते हैं. उनके पास करीब 3000 ऑर्गेनिक आम के पेड़ हैं, जिनसे वे साल में 2 से 3 लाख रुपये तक की आमदनी कर लेते हैं. हाल ही में हुए गुजरात बायोपार्क एग्जीबिशन में उन्हें बहुत अच्छा रिस्पॉन्स मिला और पहले ही दिन अच्छी बिक्री हुई.
सूरत डिवीजन के जॉइंट डायरेक्टर ऑफ हॉर्टिकल्चर दिनेश पडालिया ने बताया कि यह Mango Festival Vibrant Gujarat कार्यक्रम के तहत आयोजित किया गया है. मई में आम का सीजन होने के कारण यह आयोजन किसानों के लिए बेहद फायदेमंद है.
उन्होंने बताया कि साउथ गुजरात आम के लिए मशहूर है, खासकर केसर और अल्फांसो किस्म के लिए. इस फेस्टिवल में केवल वही किसान शामिल हैं, जो बिना रसायन और कीटनाशक के प्राकृतिक खेती करते हैं.
यहां केसर, राजापुरी, अल्फांसो, लंगड़ा, दशहरी और आम्रपाली जैसी किस्में बेची जा रही हैं. आमतौर पर बाजार में रसायन वाले आम 20 किलो के 1800 रुपये से 2500 रुपये तक बिकते हैं, जबकि यहां जहर‑मुक्त आम 3000 रुपये प्रति 20 किलो तक बिक रहे हैं.
दिनेश पडालिया ने बताया कि कुल 13 स्टॉल लगाए गए हैं और करीब 40–50 किसान 1 मई से 5 मई तक अपने आम सीधे ग्राहकों को बेच रहे हैं. आदिवासी इलाकों में बिना पानी उगाए गए आम ज्यादा मीठे होते हैं, इसलिए इनकी मांग भी ज्यादा है. कुल मिलाकर, प्राकृतिक खेती और आम महोत्सव जैसे आयोजन किसानों को सही दाम दिलाने के साथ‑साथ लोगों तक जहर‑मुक्त और स्वस्थ आम पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं.