Mustard Production: पैदावार में 70 फीसदी बढ़ोतरी संभव, परती जमीन बदल सकती है सरसों की खेती की तस्वीर

Mustard Production: पैदावार में 70 फीसदी बढ़ोतरी संभव, परती जमीन बदल सकती है सरसों की खेती की तस्वीर

छत्तीसगढ़ में सरसों की खेती को लेकर बड़ी संभावना सामने आई है. विशेषज्ञ ने कहा कि धान की परती जमीन में अगर सरसों बोई जाए तो पैदावार में 70 फीसदी तक बढ़ोतरी हो सकती है. इससे किसानों की आमदनी और देश की खाद्य तेल सुरक्षा दोनों को मजबूती मिल सकती है.

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क‍िसान तक
  • Noida,
  • Feb 13, 2026,
  • Updated Feb 13, 2026, 1:44 PM IST

सरसों की खेती को लेकर एक बड़ी और उम्मीद जगाने वाली खबर सामने आई है. अगर ऐसा हुआ तो भारत को तिलहन के क्षेत्र में आत्‍मनिर्भरता हासिल करने में बड़ी मदद साबित होगी. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद- भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIRMR) के पूर्व निदेशक पी के राय ने कहा कि सही योजना और फोकस के साथ छत्‍तीसगढ़ जैसे राज्‍या में सरसों की पैदावार 70 फीसदी तक बढ़ाकर देश में इसका उत्‍पादन बढ़ाया जा सकता है. छत्तीसगढ़ जैसे गैर-पारंपरिक राज्यों में अभी उत्पादकता बेहद कम है, वहां संभावनाएं कहीं ज्यादा हैं.

बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, राय ने कहा कि छत्तीसगढ़ में बड़ी मात्रा में मौजूद धान की परती जमीन को अगर रबी सीजन में सरसों की खेती से जोड़ा जाए तो न सिर्फ उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि किसानों की आमदनी और देश की खाद्य तेल सुरक्षा भी मजबूत होगी. पी के राय वर्तमान में राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान (National Institute of Biotic Stress Management) के निदेशक हैं.

परती धान के खेत बन सकते हैं अवसर

उन्‍होंने बताया कि छत्तीसगढ़ का कुल खेती क्षेत्र करीब 4.78 मिलियन हेक्टेयर है, लेकिन इसमें से केवल 23 फीसदी जमीन ही सिंचित है. राज्य में लगभग 3.9 मिलियन हेक्टेयर में धान की खेती होती है, जो ज्यादातर बारिश आधारित है. यही वजह है कि धान की कटाई के बाद करीब आधा क्षेत्र रबी सीजन में खाली रह जाता है.

किसानों के खेत खाली छोड़ने के पीछे कई कारण हैं. सिंचाई की कमी, मॉनसून के बाद मिट्टी में नमी का तेजी से खत्म होना, निचले इलाकों में जलभराव, लंबी अवधि वाली धान किस्मों के कारण देर से कटाई, छुट्टा पशुओं का डर और तकनीकी जानकारी का अभाव, ये सभी बड़ी बाधाएं हैं.

सरसों क्यों है सबसे बेहतर विकल्प?

दरअसल, धान की परती जमीन के लिए सरसों सबसे उपयुक्त रबी फसल है. इसकी पानी की जरूरत कम होती है और यह सीमित नमी में भी अच्छी पैदावार दे सकती है. सरसों की अधिकांश किस्में 90 से 120 दिनों में तैयार हो जाती हैं, जिससे यह धान की कटाई और गर्मी शुरू होने के बीच आसानी से फिट हो जाती है. साथ ही यह हल्के सूखे और तापमान में उतार-चढ़ाव को भी सहन कर लेती है.

उत्पादन में दोगुने से ज्यादा की गुंजाइश

फिलहाल छत्तीसगढ़ में सरसों का रकबा सिर्फ 31 हजार हेक्टेयर के आसपास है और उत्पादन करीब 17 हजार टन ही है. यहां औसत उत्पादकता 5-6 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जबकि इसे 11-12 क्विंटल तक ले जाया जा सकता है. तुलना करें तो 2024-25 में देश का औसत सरसों उत्पादन 14.63 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रहा है.

रिसर्च में मिले उत्साहजनक नतीजे

बीते तीन वर्षों में किए गए बहु-स्थान परीक्षणों में सरसों की किस्म DRMR-150-35 ने खासा भरोसा जगाया है. यह किस्म 95 से 110 दिनों में तैयार हो जाती है और धान कटाई के बाद बोने के लिए उपयुक्त पाई गई है. परीक्षणों के दौरान प्रमुख कीट और रोगों का प्रकोप नहीं देखा गया, केवल एफिड्स की समस्या सामने आई, जिससे इसकी जैविक तनाव सहन क्षमता भी साबित हुई है. इसके अलावा, सरसों को चना जैसी फसलों के साथ मिश्रित खेती में भी अपनाया जा सकता है.

राष्ट्रीय स्तर पर अहम है यह पहल

देश में 2024-25 में सरसों का कुल उत्पादन घटकर 12.67 मिलियन टन रह गया था, जो इससे पहले 13.26 मिलियन टन था. हालांकि चालू सीजन में रकबे में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है. ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सरसों की खेती को बढ़ावा देना न केवल उत्पादन बढ़ाने का रास्ता खोल सकता है, बल्कि आयात पर निर्भरता घटाने में भी अहम भूमिका निभा सकता है.

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