
बिहार में मंडी व्यवस्था खत्म की गई और उसकी जगह पैक्स सिस्टम की शुरुआत हुई. इस उम्मीद में कि किसानों की उपज की निर्बाध खरीद होगी. लेकिन पैक्स से किसानों को मायूसी ही हाथ लगी है. पैक्स ने मक्के जैसी फसल खरीदने से इनकार कर दिया जिसे कोसी बेल्ट में पीला सोना का दर्जा मिला है. बाद में इथेनॉल प्लांटों ने कुछ सहारा दिया, लेकिन अब वहां से भी मक्के को दुत्कार मिल रही है.
बिहार में कुछ ऐसा ही अंजाम गन्ने का हुआ था. जब सहकारी सिस्टम में चीनी मिलों ने गन्ने की खरीद जारी रखी तो बिहार इसके उत्पादन में टॉप राज्यों में शुमार हुआ. सहकारी सिस्टम के ध्वस्त होते ही न गन्ना बचा न चीनी मिलें. क्या बिहार में मक्के का भी कुछ ऐसा ही हश्र होने वाला है?
इथेनॉल प्लांटों में अब मक्के की खरीद कम कर दी गई है. उसके बदले चावल लिया जा रहा है. इससे किसानों को दोहरा नुकसान हुआ है क्योंकि मक्के की खरीद कम होने से किसानों की आय प्रभावित हुई है. किसानों का कहना है कि जब इथेनॉल प्लांटों में मक्के की मांग नहीं रही तो सरकार पैक्स के जरिये उसकी खरीद कराए.
मुजफ्फरपुर के बड़े मक्का किसान और कारोबारी सतीश द्विवेदी का कहना है कि सरकार ने मक्के के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तो तय कर रखा है, लेकिन पैक्स के जरिए उसकी खरीद नहीं हो रही है. उन्होंने सवाल उठाया कि जब धान और गेहूं की सरकारी खरीद संभव है, तो मक्का क्यों नहीं? इस मुद्दे को प्रखंड से लेकर जिला स्तर तक उठाया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई.
द्विवेदी का आरोप है कि पैक्स पर सरकार की ओर से कोई दबाव नहीं बनाया जा रहा है. यदि सरकार चाहे, तो मक्का की खरीद तुरंत शुरू हो सकती है, लेकिन सरकारी लापरवाही का खामियाजा सीधे किसानों को भुगतना पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि सरकार की निष्क्रियता के कारण किसान औने-पौने दामों पर मक्का बेचने को मजबूर हैं और उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है.
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि साल 2020 में सरकार ने पैक्स के माध्यम से मक्का खरीद का आश्वासन दिया था. उस समय के सहकारिता मंत्री राणा रणधीर सिंह ने कोसी-सीमांचल क्षेत्र में मक्का की सरकारी खरीद शुरू करने की घोषणा की थी, लेकिन पांच साल बीत जाने के बावजूद यह वादा कागजों से आगे नहीं बढ़ सका.
इसी तरह, मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट प्रखंड स्थित मोहम्मदपुर सूरा पैक्स के अध्यक्ष सुनील कुमार राय ने बताया कि मक्का खरीद को लेकर प्रखंड और जिला सहकारिता अधिकारियों से कई बार मांग की गई, लेकिन किसी स्तर पर सुनवाई नहीं हुई. उन्होंने कहा कि पूरे बिहार में पैक्स के जरिए मक्का खरीद की कोई ठोस व्यवस्था ही नहीं है. धान की खरीद के लिए जहां एसएफसी और चावल मिलों की स्पष्ट प्रणाली मौजूद है, वहीं मक्का के लिए अब तक कोई पैरलल सिस्टम तैयार नहीं किया गया है.
किसानों का कहना है कि मक्के की खरीद यूं ही बंद रही, या उसमें ठहराव रहा तो इसकी खेती बंद हो जाएगी. सरकार के आश्वासन पर किसानों ने मक्के का रबका बढ़ाया, इथेनॉल बनाने में मदद की. अब किसानों को सरकार का आश्वासन धोखे जैसा लग रहा है. किसानों का कहना है कि मक्के के बदले वे किसी अन्य फसल की खेती करेंगे जिसका असर अगले साल से दिखने लगेगा. जो बिहार कभी मक्के के उत्पादन में अव्वल था, वह निचले पायदान पर सरक जाएगा. बिहार में मक्के का वही हाल हो सकता है जैसा कभी गन्ने का हुआ था.
आज बिहार में जिस तरह मक्के का दबदबा है, कभी गन्ने की धमक भी ऐसी थी. लेकिन समय के साथ गन्ना गायब हो गया और साथ में चीनी मिलें भी. 1970 के दशक में चीनी मिलों के राष्ट्रीयकरण को बिहार में चीनी फैक्ट्रियों के पतन का कारण माना जाता है. इसके अलावा बिहार स्टेट शुगर कॉर्पोरेशन की नाकामी के कारण भी राज्य ने चीनी उत्पादन में अपनी शान खो दी. अब बिहार में न गन्ना बचा है, न चीनी मिलें. हालांकि सरकार इसे फिर पटरी पर लाने के लिए जोर लगा रही है. जानकारों की मानें तो यह प्रयास अच्छा है, मगर उतना आसान नहीं.
सरकार से किसानों का सवाल है कि लचर नीतियों से गन्ना तो गुम हो गया, क्या अब मक्का भी उसी राह चलेगा? अगर ऐसा है तो किसानों ने अगली बार मक्के को धक्का देने का मन बना लिया है. फिर सरकार को इथेनॉल के लिए किसी और रणनीति पर सोचना होगा.