अमेरिका–बांग्लादेश टेक्सटाइल डील से भारतीय कपास किसानों में चिंता, एक्सपर्ट बोले– दामों पर नहीं पड़ेगा असर

अमेरिका–बांग्लादेश टेक्सटाइल डील से भारतीय कपास किसानों में चिंता, एक्सपर्ट बोले– दामों पर नहीं पड़ेगा असर

अमेरिका-बांग्लादेश टेक्सटाइल डील के बाद भारतीय कपास किसानों में दाम गिरने की आशंका, लेकिन कॉटन ब्रोकर्स एसोसिएशन ने असर से किया इनकार. विदर्भ के किसानों ने बढ़ती लागत और तकनीकी पिछड़ेपन पर जताई चिंता.

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धनंजय साबले
  • Akola (Maharashtra),
  • Feb 12, 2026,
  • Updated Feb 12, 2026, 12:37 PM IST

अमेरिका और बांग्लादेश के बीच वस्त्र उद्योग (टेक्सटाइल सेक्टर) को लेकर हुए ताजा व्यापारिक करार के बाद देश भर के कपास उत्पादक किसानों में चिंता का माहौल बन गया है. खासकर विदर्भ के अकोला कॉटन बेल्ट में यह आशंका जताई जा रही है कि यदि बांग्लादेश भारतीय कपास के बजाय अमेरिकी कपास को प्राथमिकता देता है, तो देश के भीतर कपास की आवक बढ़ सकती है और इसके चलते बाजार में दाम गिरने की स्थिति बन सकती है.

बांग्लादेश भारत से सबसे अधिक कपास खरीदने वाला प्रमुख देश माना जाता है. ऐसे में वहां से मांग घटने पर इसका सीधा असर भारत के कपास बाजार और किसानों की आमदनी पर पड़ सकता है. हालांकि, इस पूरे मामले पर ऑल इंडिया कॉटन ब्रोकर्स एसोसिएशन ने किसानों को घबराने की जरूरत नहीं होने की बात कही है.

कपास के दामों पर रत्ती भर असर नहीं

एसोसिएशन के पदाधिकारी अनिल थानवी ने स्पष्ट कहा कि, “अमेरिका और बांग्लादेश के बीच हुई टेक्सटाइल डील से भारत के कपास उत्पादक किसानों या कपास के दामों पर रत्ती भर भी असर नहीं पड़ेगा. भारत में और दुनिया में इस समय कपास के सबसे बेहतर दाम मिल रहे हैं और सीसीआई (कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया) किसानों से अच्छे भाव पर खरीद कर रही है.” उन्होंने कहा कि बांग्लादेश को लेकर यह डर बेबुनियाद है कि भारतीय कपास की मांग अचानक खत्म हो जाएगी.

अनिल थानवी के अनुसार, “अमेरिका ने बांग्लादेश के टेक्सटाइल सेक्टर को भले ही 0 प्रतिशत टैरिफ की सुविधा दी हो, लेकिन इसका सीधा नुकसान भारत को नहीं होगा, क्योंकि अब भारत के लिए यूरोप समेत कई देशों में टेक्सटाइल का वैकल्पिक और मजबूत बाजार खुल चुका है, जहां 0 प्रतिशत टैरिफ पर निर्यात संभव है. इसलिए इस डील से भारत के कपास और कपड़ा उद्योग को कोई नुकसान नहीं होने वाला है.”

भारत के खिलाफ व्यापार युद्ध

दूसरी ओर, किसान नेता डॉ. निलेश पाटिल ने इस पूरे घटनाक्रम को भारत के खिलाफ एक तरह का “व्यापार युद्ध” करार दिया. उन्होंने कहा कि, “यह अमेरिका द्वारा भारत के साथ किया जा रहा व्यापारिक दबाव है. इसका सबसे ज्यादा खामियाजा व्यापारी अपनी तरफ से भाव गिराकर किसानों पर डाल सकते हैं.”

इसी बीच, विदर्भ के अकोला जिले के कॉटन बेल्ट के प्रगतिशील कपास उत्पादक किसान दिलीप ठाकरे ने जमीनी हकीकत सामने रखते हुए कहा कि इस डील को लेकर किसानों में डर जरूर पैदा हुआ है. दिलीप ठाकरे के मुताबिक, “बांग्लादेश भारत से सबसे ज्यादा कपास खरीदता है. यदि वहां से कपास जाना कम हुआ, तो इसका सीधा असर विदर्भ और अन्य कपास उत्पादक इलाकों पर पड़ेगा. किसान पहले से ही लागत के बोझ में दबा हुआ है.”

उन्होंने सरकार से मांग की कि कपास उत्पादन बढ़ाने और लागत घटाने के लिए नई तकनीक तत्काल उपलब्ध कराई जाए. दिलीप ठाकरे ने आगे कहा कि, “पिछले करीब 25 वर्षों से कपास की नई टेक्नोलॉजी और बीजों में कोई बड़ा अपडेट नहीं हुआ है. आज भी किसान BG-2 जैसे पुराने बीजों पर निर्भर है. सरकार को गुलाबी बोंड अली (पिंक बॉलवर्म) से बचाव वाले नए बीज तुरंत उपलब्ध कराने चाहिए, ताकि लागत कम हो और उत्पादन बढ़ सके.”

खेती में पिछड़ापन भी बड़ी चिंता

दिलीप ठाकरे ने केवल दाम गिरने की आशंका ही नहीं, बल्कि विदर्भ की खेती की एक गंभीर सच्चाई भी उजागर की. उन्होंने कहा कि, “जहां देश और दुनिया के दूसरे सेक्टर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और आधुनिक तकनीक के साथ काम कर रहे हैं, वहीं विदर्भ का किसान आज भी बैल-जोड़ी के सहारे खेतों में बुवाई करता दिखाई देता है.”

उनके अनुसार, “दूसरे देशों में किसान एक ही दिन में हजारों हेक्टेयर जमीन पर अत्याधुनिक यांत्रिक मशीनों से बुवाई कर लेते हैं, जबकि विदर्भ, महाराष्ट्र और देश के कई कपास उत्पादक इलाकों में आज भी किसान दिन भर में सिर्फ 2 से 3 एकड़ जमीन पर ही बुवाई कर पाता है.” उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, “जब खेती में यांत्रिकीकरण ही नहीं है, तो भारत का किसान वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आखिर कैसे टिक पाएगा? केवल मेहनत के भरोसे आज के दौर में खेती को आगे ले जाना संभव नहीं है.”

विदर्भ में कपास का होगा बुरा हाल

दिलीप ठाकरे ने साफ कहा कि बुवाई से लेकर तुड़ाई तक आधुनिक मशीनें, नई तकनीक और ठोस सरकारी सहायता उपलब्ध कराए बिना न तो कपास उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और न ही किसानों की लागत घटाई जा सकती है. उनका यह भी कहना है कि यदि समय रहते सरकार ने खेती में व्यापक यांत्रिकीकरण को बढ़ावा नहीं दिया, तो आने वाले वर्षों में विदर्भ जैसे प्रमुख कपास पट्टों में खेती से किसानों का मोहभंग होना तय है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि लागत और जोखिम इसी तरह बढ़ते रहे, तो आने वाले खरीफ सीजन में बड़ी संख्या में किसान कपास की बुवाई से पीछे हट सकते हैं, जिससे अगले वर्ष कपास क्षेत्र में गिरावट आ सकती है.

कुल मिलाकर, जहां ऑल इंडिया कॉटन ब्रोकर्स एसोसिएशन अमेरिका-बांग्लादेश डील से कपास के दाम गिरने की आशंका को खारिज कर रहा है, वहीं विदर्भ के किसान और किसान नेता मानते हैं कि असली खतरा बाजार में संभावित दबाव, बढ़ती लागत और खेती में तकनीकी पिछड़ेपन का है, जिसे नजरअंदाज करना आने वाले सीजन में कपास खेती के लिए घातक साबित हो सकता है.

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