मखाना सस्ता, चिंता महंगी: बीज और लावा के गिरते दाम से सहनी समाज पर बढ़ा कर्ज का बोझ, पढ़ें Ground Report

मखाना सस्ता, चिंता महंगी: बीज और लावा के गिरते दाम से सहनी समाज पर बढ़ा कर्ज का बोझ, पढ़ें Ground Report

दरभंगा के हरसिनपुर नौवटोलिया गांव में मखाना फोड़ने वाले सहनी समाज के परिवार बीज और लावा के दाम में अचानक आई गिरावट से परेशान हैं. कई लोगों ने ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेकर कारोबार शुरू किया था, लेकिन बीते 10-15 दिनों में मखाना बीज का भाव 25 हजार रुपये प्रति क्विंटल से गिरकर करीब 16 हजार रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गया है. मखाने के वैश्विक कारोबार के बढ़ने के बावजूद कारीगरों और किसानों की आय पर संकट गहरा गया है.

Makhana Price FallMakhana Price Fall
अंक‍ित कुमार स‍िंह
  • Patna,
  • Aug 18, 2026,
  • Updated Aug 18, 2026, 1:10 PM IST

करीब दस बाई दस के टीन के बने बरामदे में 10 वर्षीय मनीषा सहनी आईने के सामने अपने चेहरे को देख रही है. वहीं, इसके पीछे इनके घर वाले मखाना के बीज को भूनकर लावा तैयार करने का काम कर रहे हैं. जी हां, वही मखाना, जिसका इन दिनों बाजार में वैल्यू प्रति किलो ₹1200 से लेकर करीब ₹2500 किलो तक है. जिसे खाना आज के समय में किसी आम परिवार के बस की बात ना के बराबर ही है. फिर भी दरभंगा जिले के हरसिनपुर नौवटोलिया गांव के सहनी समाज के लोग चिंतित हैं और उनकी चिंता की वजह बीते करीब 10 से 15 दिनों से मखाना के बीज (गुरिया) और लावा के दाम का गिरना है. यह चिंता केवल इनकी ही नहीं बल्कि मखाना की खेती करने वाले किसानों की है.

वीरेंद्र सहनी कहते हैं कि कई ऐसे परिवार हैं, जो सूद (ब्याज) पर पैसा लेकर मखाना का कारोबार कर रहे हैं. वैसे परिवार की बस इस बात की चिंता है कि अगर इस बार दाम सही नहीं मिला तो कैसे कर्ज दिया जाएगा और आगे घर का खर्च किस तरह चलेगा. दाम गिरने की हकीकत वीरेंद्र को भी नहीं मालूम है. मखाने के बीज से लावा तैयार करने का पारंपरिक हुनर मलाह यानी सहनी समाज के लोगों के पास पीढ़ियों से चला आ रहा है.

मखाने की पहचान, उसकी क्वालिटी और उसे सही तरीके से फोड़कर लावा तैयार करने की बारीकियों का अनुभव इन लोगों को विरासत में मिला है. बावजूद इसके, मखाने के बढ़ते कारोबार का सीधा फायदा इन कारीगरों की आर्थिक स्थिति में दिखाई नहीं देता. गौरतलब हो कि मखाना बीज के बीते दो सालों के दामों पर नजर डालें तो दाम में कमी देखने को मिल रही है. लेकिन बाजार में मखाना के दाम में किसी तरह की कमी नहीं देखने को मिल रही है.

मखाना से सहनी समाज का कनेक्शन

वीरेंद्र सहनी कहते हैं कि मखाना जितना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है, वहीं इसकी खेती काफी कठिन है. मखाना की खेती अन्य फसलों की खेती जैसी नहीं है. इसकी खेती के लिए मेहनत और तकनीक दोनों की जानकारी होनी चाहिए. मखाना के अलावा आज भी परंपरागत तरीकों से ही तैयार किया जाता है. वहीं, जो मखाना के अलावा तैयार करते हैं, उन्हें फोड़िया कहा जाता है और इसकी खेती करने वाले अधिकांशतः आबादी साहनी समाज यानी कि मलाह जाति से होते हैं. इनमें से कुछ लोग इसकी खेती करते हैं, तो वहीं कुछ लोग मखाना का बीज खरीदकर लावा तैयार करते हैं. उसे बाजार में बेचते हैं. लेकिन इस बार शुरुआत में ही इसके दाम में काफी कमी देखने को मिल रही है.

कभी 40 हजार, अब 16 हजार रुपये बीज का भाव

मखाना को जीआई टैग दिलाने से लेकर वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में प्रोफेसर अनिल सिंह का काफी योगदान रहा है. वह कहते हैं कि करीब 14 से 15 सालों के दौरान आप देखेंगे तो मखाना के दाम में काफी उछाल आया और इसके पीछे कड़ी मेहनत भी की गई, तब जाकर मखाना की ऐसी स्थिति आई. लेकिन हाल-फिलहाल साल 2 सालों से इसके दामों में फिर से कमी देखने को मिल रही है. 

वह बताते हैं कि 2012 में मखाना के बीज का भाव प्रति किलो ₹20 था, यानी ₹2000 प्रति क्विंटल था. वहीं, 2015 में यह 15 हजार रुपये क्विंटल लेकर 19 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया. एकबार फिर 2022 में जब मखाना का दाम एक बार फिर ₹2000 प्रति क्विंटल हुआ, तो उस समय के उद्यान निदेशक की मदद से मखाना महोत्सव की शुरुआत हुई. इसके बाद 2023 में इसका दाम फिर ₹15 हजार प्रति क्विंटल तक पहुंचा.

वहीं, 2024 में यही मखाना का भाव ₹40000 प्रति क्विंटल तक पहुंच गया था, जो अब तक का सबसे अधिक दाम रहा. लेकिन ठीक इसके अगले साल यानी कि 2025 के आसपास मखाना के बीज का भाव ₹25000 के आसपास पहुंचा. वहीं, हाल के समय यह 16000 रुपये क्विंटल या इससे थोड़ा अधिक भाव पर बिक रहा है. और यह इसलिए हो रहा है क्योंकि अब मखाना को लेकर जिस रफ्तार से काम होनी चाहिए, उसमें कमी आई है. काम करने वाले को काम नहीं करने दिया जा रहा है. कुछ हालात मेरा भी इसी तरह का है.

दाम गिरने की ये है वजह 

बीते 10 से 15 दिनों पहले जहां मखाना के बीज का भाव ₹25000 प्रति क्विंटल के आसपास था, वहीं इसके भाव में करीब आठ से ₹10000 प्रति क्विंटल गिरावट देखने को मिल रही है. वहीं, मखाने के बीज से लेकर लावा का दाम गिरने को लेकर प्रोफेसर अनिल सिंह कहते हैं कि अमेरिका-ईरान-इजरायल के बीच चल रहे युद्ध की वजह से ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट बंद कर दिया गया था, जिसकी वजह से मखाना के कारोबार पर भी असर पड़ा था. काफी मात्रा में मखाना नहीं जा पाया. उसके बाद नया मखाना आना शुरू हो गया. इसकी वजह से दाम में गिरावट आई है. हालांकि अभी पुराना और नया मखाना मिलाकर भेजा जा रहा है. अगर आने वाले दिनों में अगर इन देशों के बीच स्थिति बढ़िया बनती है तो दाम में उछाल आएगा. वरना और गिरावट होने की आशंका है.

मखाना उद्यमी विकास कुमार कहते हैं कि दाम कम होने का कारण उन्हें नहीं पता चल पा रहा है. मखाना की फसल निकल रही है खेतों से, लेकिन बाजार तक उपलब्ध नहीं हो पा रही है. वहीं, दाम में गिरावट को लेकर वह कहते हैं कि मुझे भी इसका पता नहीं चल पा रहा है, आखिर ऐसा क्यों हो रहा है. हालांकि, वे होर्मुज बंद होने को एक कारण बताते हैं. वे कहते हैं कि अगर पुराना और नया मखाना मिलकर विदेश भेजा जा रहा है तो यह ठीक नहीं है. इसकी वजह से आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार पर मखाना को लेकर मुसीबत बढ़ सकती है.

ब्याज पर पैसा, मजबूर सहनी समाज

दरभंगा जिले के हरसिनपुर नौवटोलिया गांव करीब 5 से 6 सौ से अधिक सहनी समाज के लोग फोड़िया का काम कर रहे हैं. फोड़िया का काम कर रही मीना कहती हैं कि रात के 2 बजे से रात के 10 बजे तक मखाना के बीज को भूनकर लावा तैयार करते हैं. वह जिस जगह पर लावा तैयार कर रही हैं, उसको उन्होंने करीब ₹20000 पर 6 महीने के लिए किराए पर ले रखा है. वह कहती हैं कि जितनी मेहनत है, उसके अनुसार हमें दाम नहीं मिलता. वह अपने घर के एक सदस्य का हाथ दिखाते हुए कहती हैं कि गर्म कड़ाही से बीज हाथों में दिया जाता है. उसके बाद बीज पर चोट की जाता है, तब जाकर लावा तैयार होता है और इस प्रक्रिया में हाथ पूरी तरह से जल जाता है. बाजार में भले ही मखाना का दाम हजारों में बिक रहा हो, लेकिन हमें दाम तो सैकड़ों में ही मिलता है.

वहीं, रुना कुमारी ने 4 से 5% ब्याज पर 10 लाख रुपये कर्ज लेकर मखाने का बीज खरीदा है, जिसे लावा तैयार कर बाजार में बेचा जाएगा. रुना कहती हैं कि इसका दाम तभी निकलेगा, जब बाजार बढ़िया हो और हमें दाम अच्छा मिले, लेकिन अभी स्थिति वैसी नहीं है. जब बाजार में दाम बढ़िया रहता है तो कर्ज के बावजूद कमाई हो जाती है, लेकिन जब बाजार गिरता है तो यह कर्ज चुकाना भी मुश्किल हो जाता है. 

मखाना के दाम में भी आई कमी

वीरेंद्र सहनी कहते हैं कि 10 से 12 दिन पहले जहां मिक्स मखाना (लावा) 10 किलो 7000 से लेकर 7200 रुपये के आसपास बिक रहा था, वहीं 5700 से लेकर 5800 रुपये के बीच आ गया है. करीब 40 किलो मखाने के बीज से लगभग 12 से 13 किलो तक लावा तैयार होता है. लेकिन बीज खरीदने, किराया, ईंधन और दूसरे खर्चों के बाद मुनाफे का हिस्सा काफी कम रह जाता है. यही वजह है कि बाजार में मखाना 2000 से 3000 रुपये किलो तक बिकने के बावजूद उसे तैयार करने वाले परिवारों की आर्थिक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है.

192 करोड़ के आसपास मखाने का कारोबार

बिहार में मखाने की खेती मुख्य रूप से मिथिलांचल और सीमांचल के करीब 11 से अधिक जिलों में लगभग 35 से 40 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है. बीते कुछ वर्षों में बिहार से मखाने के निर्यात में वृद्धि हुई है. साल 2025-26 के दौरान 7264.89 मीट्रिक टन मखाना विदेश भेजा गया था, जो करीब 192.96 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ था. यह बिहार के कृषि निर्यात और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है.

MORE NEWS

Read more!