यूपी की गोशालाओं में भी होंगे मांगलिक कार्यक्रम, योगी आदित्यनाथ सरकार ने बनाया ये प्लान

यूपी की गोशालाओं में भी होंगे मांगलिक कार्यक्रम, योगी आदित्यनाथ सरकार ने बनाया ये प्लान

UP News: श्याम बिहारी गुप्ता के मुताबिक, इससे गोशालाओं के आसपास आर्थिक गतिविधियों के लिए भी अवसर बनेंगे. गो-पर्यटन का यह मॉडल हर जगह एक जैसा नहीं होगा. जिस क्षेत्र की जो विशेषता होगी, उसी के अनुरूप गोशाला का स्वरूप विकसित करने पर जोर रहेगा.

cm yogi योगी सरकार परंपरा और स्थानीय संस्कृति को देगी मंचcm yogi योगी सरकार परंपरा और स्थानीय संस्कृति को देगी मंच
क‍िसान तक
  • LUCKNOW,
  • Sep 22, 2026,
  • Updated Sep 22, 2026, 8:20 AM IST

आने वाले समय में गांव की गोशालाएं भी स्थानीय संस्कृति और ग्रामीण जीवन की पहचान बनेंगी। योगी सरकार का यह विजन जल्द ही मूर्त रूप लेने वाला है. गो-संरक्षण के लिए संचालित गोशालाओं को अब परंपरा, भौगोलिक परिस्थितियों और ग्रामीण जरूरतों के अनुरूप विकसित करने की तैयारी है. चयनित गोशालाओं, कान्हा हाउस और बड़े गो-संरक्षण केंद्रों को गो-पर्यटन से जोड़कर गांवों में आर्थिक गतिविधियों के नए रास्ते तलाशे जाएंगे.

गो-पर्यटन के अलग-अलग मॉडल

उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने बताया कि गोशालाओं के इस प्रस्तावित नए स्वरूप में संरक्षण के साथ पर्यटन और स्थानीय गतिविधियों को भी स्थान मिलेगा. इसका उद्देश्य किसी क्षेत्र की संस्कृति और परंपरा को वहां की गोशाला से जोड़ना है. इससे गोशाला केवल पशु संरक्षण का स्थान न रहकर ग्रामीण जीवन और स्थानीय पहचान से परिचित कराने वाला केंद्र बन सकती है. क्षेत्र के अनुरूप यहां ऐसी गतिविधियां विकसित की जा सकती हैं, जो बाहर से आने वाले लोगों को गांव की जीवनशैली, पशुपालन और स्थानीय परंपराओं से जोड़ें.

मांगलिक कार्यक्रमों के लिए भी खुलेंगे द्वार

उन्होंने बताया कि चयनित गोशालाओं में मांगलिक कार्यक्रमों के आयोजन की भी व्यवस्था विकसित किए जाने की तैयारी है. इससे गोशालाओं का उपयोग केवल दैनिक गो-संरक्षण गतिविधियों तक सीमित न रहकर सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों से भी जुड़ सकेगा. स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ऐसे स्थलों को विकसित करने की योजना है, जहां ग्रामीण परिवेश के बीच पारंपरिक कार्यक्रमों के आयोजन की सुविधा उपलब्ध हो सके.

लोक संस्कृति और परंपराएं होंगी आकर्षण

श्याम बिहारी गुप्ता के मुताबिक, इससे गोशालाओं के आसपास आर्थिक गतिविधियों के लिए भी अवसर बनेंगे. गो-पर्यटन का यह मॉडल हर जगह एक जैसा नहीं होगा. जिस क्षेत्र की जो विशेषता होगी, उसी के अनुरूप गोशाला का स्वरूप विकसित करने पर जोर रहेगा. कहीं लोक संस्कृति और परंपराएं आकर्षण का केंद्र बन सकती हैं तो कहीं स्थानीय खान-पान, कला, शिल्प या ग्रामीण जीवनशैली को गतिविधियों से जोड़ा जा सकता है. इस तरह अलग-अलग क्षेत्रों में उनकी अपनी विशेषताओं के आधार पर गो-पर्यटन के अलग-अलग मॉडल आकार ले सकते हैं.

स्थानीय लोगों के लिए खुलेंगे रोजगार के अवसर

आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने बताया कि गो-पर्यटन विकसित होने पर इसका दायरा केवल गोशाला परिसर तक सीमित नहीं रहेगा. आसपास के ग्रामीणों, स्वयं सहायता समूहों, स्थानीय कारीगरों, छोटे कारोबारियों और खान-पान से जुड़े लोगों के लिए भी इससे नए अवसर पैदा होंगे. पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने पर स्थानीय उत्पादों और सेवाओं की मांग बनने की संभावना है. हालांकि, इन अवसरों का वास्तविक स्वरूप संबंधित गोशाला और वहां विकसित की जाने वाली गतिविधियों पर निर्भर करेगा.

इस मॉडल में गांव की स्थानीय अर्थव्यवस्था को गोशाला से जोड़ने की संभावनाएं भी तलाशी जाएंगी. गोशाला के आसपास स्थानीय उत्पादों, ग्रामीण कला और पारंपरिक गतिविधियों को स्थान मिलने से गांव की विशिष्ट पहचान को सामने लाने का अवसर मिलेगा. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यटन आधारित गतिविधियों का एक नया आधार तैयार हो सकता है.

कान्हा हाउस और बड़े केंद्र भी होंगे विकसित

उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर गो-संरक्षण केंद्रों को नया स्वरूप देने की रणनीति बनाई गई है. चयनित गोशालाओं के साथ कान्हा हाउस और बड़े गो-संरक्षण केंद्रों को भी विकसित करने की तैयारी है. पूरी पहल का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि गोशालाओं को गांव की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना से जोड़ने की दिशा में देखा जा रहा है.

इससे संरक्षण की मूल भूमिका बरकरार रखते हुए उनके उपयोग का दायरा बढ़ सकता है. गांव आने वाला व्यक्ति केवल गोशाला देखने तक सीमित न रहे, बल्कि वहां की संस्कृति, परंपरा और ग्रामीण जीवन को भी अनुभव कर सके, इसी सोच के अनुरूप मॉडल विकसित किए जाने की तैयारी है.

गांव की पहचान बनेगी गोशाला

ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यटन का आकर्षण अक्सर वहां की स्थानीय पहचान में छिपा होता है. हर गांव और क्षेत्र की अपनी कहानी, परंपरा और जीवनशैली होती है. यदि इन्हें व्यवस्थित ढंग से गोशालाओं से जोड़ा जाता है तो ये केंद्र ग्रामीण पर्यटन के नए पड़ाव बन सकते हैं. आने वाले समय में चयनित गोशालाओं का यह बदला हुआ स्वरूप गांव की पहचान का हिस्सा बन सकता है.

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