
किसी भी साहीवाल, गिर, थारपारकर और जर्सी आदि नस्ल के बछड़े-बछड़िया कितने रुपये तक के बिक सकते हैं. वो भी तब जब उनकी उम्र 4 से 5 महीने की हो. इस सवाल के जवाब में किसी भी पशुपालक का जवाब 10 हजार रुपये से ज्यादा नहीं होगा. जवाब को गलत भी नहीं कह सकते हैं. क्योंकि होता ही ये कि खासतौर से देसी नस्ल की गाय के बच्चे 5 से 10 हजार रुपये तक के ही बिकते हैं. लेकिन उत्तराखंड के पशुपालक इस मामले में रिकॉर्ड बना रहे हैं. 4 से 5 महीने की उम्र वाले बछड़े-बछड़िया वहां दो लाख रुपये से ज्यादा की कीमत पर बेचे जा रहे हैं. ऐसे बछड़े बिक भी हाथों-हाथ रहे हैं.
और ये सब मुमकिन हो रहा है शेयरिंग मॉडल की मदद से. उत्तराखंड सरकार का देहरादून में संचालित कलसी ब्रीडिंग फार्म इस मामले में पशुपालकों की मदद कर रहा है. इसके लिए सेंटर में एम्ब्रियो ट्रांसफर टेक्नोलॉजी अपनाई जा रही है. जिसके चलते गायों की नस्ल में सुधार किया जा रहा है. कलसी फार्म की इस सुविधा का फायदा दूसरे राज्य भी उठा रहे हैं.
एम्ब्रियो ट्रांसफर टेक्नोलॉजी से पैदा हो रहे बछड़ों से पशुपालक लाखों रुपये तक कमा रहे हैं. इस टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा फायदा ये है कि इससे गायों की नस्ल में सुधार आता है और प्योर नस्ल के बछड़े मिल जाते हैं. यही वजह है कि राज्य सरकार के सीमन स्टेशन भी पशुपालकों से इन बछड़ों को खरीद रहे हैं. जैसे देहरादून के पास पशोली गांव में एक पशुपालक के घर एम्ब्रियो ट्रांसफर टेक्नोलॉजी की मदद से पैदा हुआ अच्छी नस्ल का जर्सी नर बछड़ा था.
इस बछड़े की क्वालिटी को देखते हुए हिमाचल सरकार के सीमेन स्टेशन ने इसे 2.35 लाख रुपये कीमत देकर खरीद लिया. अब वो इसका सीमन अपने यहां नस्ल सुधार में करेंगे. इसी तरह से उत्तराखंड के ही सितारगंज में एक पशुपालक ने एम्ब्रियो से पैदा हुए दो जर्सी नर बछड़े एक प्राइवेट सीमेन स्टेशन को 60-60 हजार रुपये में बेचे हैं. एक और पशुपालक ने एम्ब्रियो ट्रांसफर से पैदा हुई अपनी 4 मादा बछड़ियां 3.20 लाख रुपये में बेच दीं. देहरादून में थारपारकर नस्ल के दो बछड़े 4 लाख रुपये में बेचे गए हैं.
आईवीएफ लैब के इंचार्ज डॉ. अजयपाल सिंह असवाल ने किसान तक को बताया कि हमारा शेयरिंग मॉडल गायों की नस्ल सुधार में तो अहम रोल निभा ही रहा है, साथ में पशुपालकों की इनकम भी बढ़ा रहा है. इस मॉडल के तहत होता ये है कि एम्ब्रियो बनाने के लिए पशुपालकों की साहीवाल, गिर, बद्री, थारपारकर और जर्सी आदि नस्ल की गायों को सेरोगेट मदद के तौर पर लिया जाता है.
फिर हमारे लैब में तैयार एम्ब्रियो ट्रांसफर कर दिया जाता है. इस तरह पैदा होने वालीं 80 फीसद बछिया पशुपालकों को दे दी जाती हैं, वहीं 20 फीसद हम ब्रीडिंग सेंटर पर रखते हैं. ये बछियां एम्ब्रियो बनाने के काम आती हैं. जो नर बछड़े होते हैं तो उन्हें सेंटर पर रखकर ब्रीडर बुल के तौर पर तैयार किया जाता है. इस दौरान किसी भी तरह से पैसों का कोई लेन-देन नहीं होता है.
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